Friday, October 3, 2008

स्टडी- बागवानी बच्चों को रखे प्रसन्न


जिस प्रकार से ड्राइंग रूम और रसोई की खिड़की पर रखे खूबसूरत पौधे घर के सौंदर्य में चार चांद लगाते है। उसी प्रकार से पेड़-पौधों के बीच समय गुजारने वाले बच्चों के व्यक्तित्व में चार-चांद लग जाते है अर्थात वे हमेशा प्रसन्न रहते है। यह कहना है ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का। वैज्ञानिकों का कहना है कि गमलों में फूलों के बीज डालने के बाद उनसे निकले अंकुर बच्चों ही नहीं बड़ों को भी उत्साहित करते है।
बागवानी के काम में भाग लेने से बच्चा अभिभावकों के साथ अपना भावनात्मक सामंजस्य भी स्थापित करता है। इससे बच्चे की शारीरिक गतिविधियों में भी वृद्धि होती है। जब आप अपने लॉन में सुबह-शाम पौधों को पानी देती है और आपके बच्चे इस काम में आपकी सहायता करते है, तो एक प्रकार से उनकी एक्सरसाइज भी हो जाती है। रंग-बिरंगे फूलों पर इतराती तितलियां और भंवरे आपके बच्चे को अपने पीछे-पीछे भागने के लिए उकसाते है। इससे उनकी जॉगिंग हो जाती है।
अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि बागवानी के जरिये बच्चे सीधे तौर पर प्रकृति के साथ अपना संबंध जोड़ते है। इससे बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति संतुष्ट होती है। साथ ही उनमें जोश और उत्साह का संचार होता है। प्रकृति के विषय में उन्हे आश्चर्यजनक जानकारी मिलती है। रंग-बिरंगे और किस्म-किस्म के फूल बच्चों को प्रकृति में फैली विविधता से परिचय कराते है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को बागवानी का व्यवहारिक ज्ञान देने के लिए उन्हे शुरुआती दौर से ही सिखाएं। विभिन्न रंग-बिरंगी पुस्तकों से उन्हे मौसमी और पूरे साल हरे-भरे रहने वाले पौधों की जानकारी दें। बचपन में प्रकृति से इस प्रकार का सीधा संबंध उन्हे आगे के जीवन में भी उपयोगी सिद्ध होगा। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति के साथ रूबरू होने से बच्चों में धैर्य की भावना विकसित होती है, जो जीवन में सफलता के लिए निहायत जरूरी है। पौधों का धीरे-धीरे बढ़ना, समय के साथ उनका पुष्पित होना और उनमें फल आना यह सब बच्चे को धैर्य सिखाते है।

सूचना के अधिकार ने दिलाया पानी


सूचना के अधिकार कानून ने शुरू में ही अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। अब वह समाज के निचले तबके के लोगों के सिर पर भी चढ़कर बोलने लगा है। सूचना के अधिकार कानून ने इस बार अपनी सफलता की कहानी उड़ीसा में लिखी है। वहां की सुदूर ग्रामीण अंचलों की निरक्षर महिलाओं ने इस अधिकार का इस्तेमाल कर अपने लिए पीने के पानी का जुगाड़ कर लिया। अब उनकी जिंदगी में जल का अभाव नहीं होगा। प्यास बुझाने के लिए पानी भी होगा। इससे देश के दूसरे हिस्से भी प्रेरणा ले सकेंगे।
बात पिपली-कोणार्क राजमार्ग के पास स्थित बानाखंडी जैसे गांवों की है। यहां पर शुद्ध पेयजल की आपूर्ति और सड़क का अभाव था। यहां के लोग घरेलू कार्य के लिए बरसात में वर्षा के पानी पर निर्भर थे, तो गर्मी में उन्हें पानी लाने के लिए हर रोज करीब दो किमी पैदल जाना पड़ता था। लेकिन जो नहीं जा सकते थे, उन्हें पास के गंदे तालाब के पानी से काम चलाना पड़ता था। महिलाओं के बीच कार्यरत भाबेनी मलिक का कहना है कि इस पानी का उपयोग मवेशियों को धोने के लिए भी होता था।
इन्हीं परिस्थितियों में यहां की महिलाओं ने सूचना के अधिकार के तहत 100 से ज्यादा आवेदन भेजे। अधिकतर मामलों में उनके प्रश्नों का जवाब नहीं मिलता था। लेकिन उनके बार-बार के सवाल से स्थानीय प्रशासन को मजबूर होकर उन्हें पेयजल और सड़क की व्यवस्था करनी पड़ी। सामाजिक कार्यकर्ता एन ए अंसारी बताते हैं कि एकमात्र ग्रामीण सड़क का काम पूरा हो चुका है और पेयजल आपूर्ति का काम शुरू हो गया है।
दिलचस्प बात है कि बहरान गांव की महिलाएं पल्लिसभा [गांव के निर्वाचित प्रतिनिधियों की सभा] के बारे में नहीं जानती थीं। जब उन्हें इसके बारे में जानकारी हुई, तो वे ब्लाक आफिस से न केवल पल्लिसभा की बैठक अपने गांव में बुलाने की मांग करने लगीं, बल्कि उसमें अपनी भागीदारी की मांग भी सुनिश्चित करने में लग गई। इसी से उन्हें पता चला कि ग्राम पंचायतें ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए जिम्मेदार हैं। सड़क निर्माण कार्य पूरा होने के बाद उन्होंने पेयजल के लिए मुहिम चला दी। इस प्रक्रिया में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी ने अहम भूमिका निभाई। स्थानीय ब्लाक आफिस को भी अपनी सक्रियता दिखानी पड़ी।

मूंगफली व चाय-फैन, रामलीला में गजब चैन

हल्की-हल्की ठंड, आग जलती हांडी के नीचे से निकली मूंगफली या पॉपकॉर्न, गर्मागर्म टिक्की या फिर ठंडी-ठंडी कुल्फी खाते हुए रामलीला के रोचक और मोहक प्रसंगों का अवलोकन.। यह सबकुछ गुजरे जमाने की याद दिलाता है। हालांकि आप वही जमाना फिर से जीना चाहते हैं तो सुभाष मैदान में होने वाली श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला देखने जा सकते हैं।
पिछले छह दशक से हो रही इस रामलीला का अलग ही माहौल है। मुसलिम बहुल इलाके में होने वाली ये रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक तो है ही, पुरानी दिल्ली की संस्कृति से रूबरू होने का मौका भी देती है। चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच आयोजित की जाने वाली रामलीला में प्रवेश भी पूरी जांच के बाद ही मिलता है।
परिसर में प्रवेश के बाद लगने लगता है मानो हम रामलीला देखने नहीं, पुरानी दिल्ली की सैर करने आए हैं। मंच पर मुरादाबाद के कलाकारों की बेहतरीन प्रस्तुति देखने को मिलती है। एक ओर प्याऊ बने हुए हैं, जहां लोग सुविधानुसार बॉक्स में बैठकर रामलीला देखते हैं। किसी बॉक्स में एसी लगा है तो किसी में कूलर और कई बॉक्स तो बालकनी-सा मजा देते हैं।
रामलीला का सबसे बड़ा आकर्षण है जनक बाजार। यहां एक ओर कूरेमल मोहनलाल की करीब दो सौ तरह की कुल्फियां उपलब्ध हैं, वहीं पुरानी दिल्ली का स्वाद लिए हर प्रकार की चाट पापड़ी, टिक्की और चटपटे व्यंजन भी अपनी ओर खींचते हैं। इसके अलावा, पाव-भाजी, छोले-भठूरे, नान, रूमाली रोटी भी खाने के शौकीनों के मन भाती है। गर्मागर्म चाय और साथ में मट्ठी या फैन खाना चाहें तो उसकी भी व्यवस्था है यहां। मूंगफली, पॉपकॉर्न, बनारसी पान और चुस्की की रेहड़ियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं।
कमेटी के प्रचार मंत्री रवि जैन बताते हैं कि सुभाष ग्राउंड में 1958 से चली आ रही रामलीला में देशी-विदेशी दर्शक खासी तादाद में आते हैं। अमूमन हर वर्ष प्रधानमंत्री भी शामिल होते रहे हैं। इस बार भी 9 अक्टूबर को दशहरे के दिन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लीला अवलोकन के लिए आने की स्वीकृति दी है, जबकि 10 अक्टूबर को भरत मिलाप के दिन यहां पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी आएंगे।

Thursday, October 2, 2008

भारतीय दंपत्ति को अंतरराष्ट्रीय सम्मान

एक भारतीय दंपत्ति और उनकी संस्था को तमिलनाडु में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए एक जाना-माना अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार देने की घोषणा की गई है.
शंकरालिंगम जगन्नाथन और उनकी पत्नी कृष्णामल उन पाँच लोगों में शामिल है जिन्हें 'राइट लाइवलिहुड अवार्ड' देने की घोषणा की गई है. इस पुरस्कार को ऑलटरनेटिव नोबेल यानी नोबेल के बराबर का ही एक अन्य पुरस्कार माना जाता है.
ये पुरस्कार स्वीडन की संसद में आठ दिसंबर को एक समारोह में दिया जाएगा. ये पुरस्कार नोबेल पुरस्कारों से दो दिन पहले दिए जाते हैं.
तमिलनाडु के ये दंपत्ति 'लैंड फ़ॉर द टिलर्स फ़्रीडम' नाम की संस्था चलाते हैं.
इस संस्था का मक़सद भारत में दलितों का सामाजिक स्तर बेहतर करना है.
पुरस्कार देने वाले जजों ने इस दंपत्ति की भारत के ग्रामीण इलाक़े में ग़रीब लोगों के बीच काम करने के लिए सराहना की है. उनका कहना है कि वहाँ भूमिहीन लोगों के बीच ज़मीन बाँटने के लिए पति-पत्नी ने ख़ासा काम किया है.
इस दंपत्ति और पुरस्कार जातने वाले तीन अन्य लोगों को 20 लाख क्रोनोर यानी लगभग तीन लाख डॉलर की राशि दी जाएगी जो इनमें आपस में बाँटी जाएगी.
इस पुरस्कार की स्थापना स्वीडन के दानी जेकब वॉन एक्सकल ने 1980 मे की थी. उनका लक्ष्य था कि ये पुरस्कार उन लोगों को उस काम के लिए दिए जा सकें जो काम नोबेल पुरस्कार के लिए अनदेखा कर दिया जाता है.

Wednesday, October 1, 2008

जिन्हें चलना सिखाया, उन्हीं ने मारी ठोकर

अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस पर बुजुर्गो की शान में बड़े-बड़े कसीदे पढ़े जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि ये बुजुर्ग अकेलेपन की जिंदगी जीने के लिए विवश हैं। कभी बेटे की फटकार तो कभी बहू की मार अब इनकी आंखों की आंसू बन गए हैं।
71 वर्ष के राम गोपाल श्रीवास्तव ने कढ़ाई का काम करके एक-एक पाई जोड़ी और अपने इकलौते बेटे को खूब पढ़ाया लिखाया। पूरा जीवन किराए के मकान में गुजार गया। बेटा केके श्रीवास्तव भी पिता के अरमानों पर खरा उतरा और एकाउंटेंट बना। पर शादी के बाद बेटे के रंग बदल गए। पिता को किराए के मकान में अकेला छोड़कर स्वयं जरौली में मकान लेकर रहने लगा। सारी उम्र कढ़ाई का काम करने के कारण राम गोपाल की आंखें भी जवाब दे गई। आठ साल पहले राम गोपाल को पैर टूटा इलाज के रुपए न होने से वे पैरों से लाचार हो गए। 2004 में उनकी पत्नी ने भी साथ छोड़ दिया। सब कुछ खत्म होने के बाद उन्हें किराए का मकान छोड़ना पड़ा। दर दर की ठोकरें खाने के बाद समाजसेविका मंजू भाटिया तीस सितंबर को स्वराज वृद्धाश्रम ले आई।
बहू ने कीं चप्पलों से पिटाई
65 वर्ष के राम स्वरूप 27 जून को आश्रम में आए थे। नौबस्ता के रहने वाले राम स्वरूप ने दिन रात सिलाई का काम करके अपने व्यवसाय को बढ़ाया और एकलौते बेटे को पाला। बड़ा होकर बेटे ने दासू कुआं चौराहे पर स्थित पिता की दुकान संभाल ली। पिता ने बड़े अरमानों से बेटे की शादी की। 1999 में पत्नी का साथ छूटने के बाद उनकी बहू व बेटे ने रंग बदलना शुरू कर दिया। पेट भर भोजन मिलना बंद हो गया। बेटा आए दिन पीटने लगा। एक दिन तो बहू ने उन्हें चप्पलों से पीटा। उस दिन उन्हें लगा कि वह जिंदा क्यों है? उसी क्षण वे घर छोड़कर जिन्दगी से दूर जाने के लिए निकले लेकिन पहुंच गए स्वराज आश्रम।
संपत्तिबेटों को क्या दी, आश्रम बना आशियाना
आगरा के ओम प्रकाश कटियार ने 66 वर्ष की उम्र तक खूब काम किया। जाजमऊ से आगरा तक लेदर व रबड़ का व्यवसाय किया। धन की भी कमी नहीं थी। ऊपर से ईश्वर ने उन्हें दो बेटे दिए तो खुशियों में चार चांद लग गए। बड़े होने पर बेटों ने पिता का व्यवसाय संभाल लिया। ओम प्रकाश ने भी सारी संपत्तिअपने उनके नाम कर दी। फिर बेटों ने पिता को धक्के मारकर घर से निकाल दिया। वह भी स्वराज आश्रम में संतान का संताप झेल रहे हैं।
उम्र के आखिरी पड़ाव में अकेली है वो
ऐसे हीं झुर्रीदार चेहरा, सफेद बाल, दोहरी कमर और चलने की ताकत खो चुके पैर। ये पूरा व्यक्तित्व उस महिला का है, जो उम्र के आखिरी पड़ाव पर खुद को एकदम अकेला पा रही है। रह-रह कर उसकी जुबान पर एक ही वाक्य आता है, लोगों के पास अब वक्त नहीं है। यह केवल इस महिला ही नहीं बल्कि उनके जैसे उम्रदराज लोगों की पूरी पीढ़ी का दर्द है, जिनका अस्तित्व अपने ही घर में एक कोने में पड़े कबाड़ से ज्यादा नहीं रह गया है।
नाम : सावित्री देवी ठाकुर
उम्र : करीब 80 वर्ष
रंग : गेहुंआ
निवास : फिलहाल पिछले दो दिन से गोविंद नगर दो व तीन ब्लाक की सड़क पर करंट उतर आने वाले खंभे के बगल में।
नवरात्र में जब पूरा देश मां जगदंबा की आराधना में जुटा है। इस वृद्धा के परिजनों ने उनसे अपना पल्ला झाड़ लिया। दो दिन पहले रविवार सुबह गोविंद नगर में ब्लाक दो व तीन के बीच की सड़क पर रहने वाले जितेंद्र कुमार जब टहलने निकले तो उन्हें घर के बाहर सड़क पर घिसट कर जाती वृद्ध महिला नजर आई। वह कुछ दूर जाकर ठहर गई। दिनभर आसपास सड़क पर बैठी रही वह महिला सोमवार को भी आसपास रही और शाम को नाली के किनारे खाली जगह पर लेट गई। खुद को साफ रखने में अक्षम होने के कारण उनके कपड़े बुरी तरह गंदे व दुर्गधयुक्त हैं। बगल में ही बिजली का वह खंभा भी था जिसमें अक्सर करंट उतर आता है।
पहले दो दिन उसे भिखारी समझते रहे आसपास रहने वाले लोगों की आंखें उस समय खुली रह गई जब नवरात्र के पहले दिन सुबह पास ही स्थित दुर्गा मंदिर आते जाते श्रद्धालुओं ने उन्हें भिखारी समझ उनके सामने रुपये डाल दिए, मगर उन्होंने रुपयों को हाथ भी नहीं लगाया।
क्षेत्र के ही विक्रम मल्होत्रा के मुताबिक एक भिखारी महिला वहां आई वह थोड़ी देर वृद्ध महिला से बात करती रही। बातों ही बातों में उसने वहां पर पड़े सारे पैसे उठाकर चली गई। वृद्ध महिला ने इसका कोई विरोध भी नहीं किया। जिससे साफ हो गया कि महिला कोई भिखारी नहीं है।
जितेंद्र कुमार के मुताबिक उनकी जो स्थिति है, उससे तो यही लगता है कि उन्हें वहां कोई छोड़ गया है। उनके मुताबिक मंगलवार सुबह उन्होंने चाय देने की कोशिश की तो वह बोलीं कि दो दिन से कुछ नहीं खाया है, बिस्कुट नहीं दोंगे। वह अपनी गंदी धोती बदलवाने की भी जिद करती हैं।
बातचीत की गई तो बमुश्किल उन्होंने अपना नाम बताया। काफी कुरेदने के बाद उन्होंने पति का जिक्र तो किया लेकिन वह कहां रहते हैं और यहां उन्हें कौन छोड़ गया, इस पर वह चुप्पी साध लेती हैं।
उन्होंने अपनी बेटी का नाम मीरा बताया और यह भी बताया कि मीरा का एक बेटा भी है। दामाद के मकान का तो जिक्र वह करती हैं लेकिन दामाद का नाम और वह मोहल्ला कौन-सा है, इसके बारे में वह कुछ नहीं बोलतीं।
बेटी-नाती के पास चलने की बात कहते ही वह इनकार से सिर हिला देती हैं। उनके होठों से एक ही बात निकलती है, अब किसी के पास उनके लिए समय नहीं है। शून्य में ताकती हुई वह कई बार बड़बड़ाती हैं, मुझसे कोई चालाकी नहीं कर सकता मगर वह यह नहीं बतातीं कि किसने उनसे चालाकी करने की कोशिश की।
मेरा विचार
१। जो अभी जवान हैं वो भी एक दिन बुजुर्ग बनेगें
२। हमारे बुजुर्ग हमसे प्यार और अच्छी परवरिश की अपेक्षा रखतें हैं यह कोई अपराध नहीं बल्कि उनका हक हैं और जवानों का उत्तरदायित्व भी
३। हमारे बुजुर्ग दुनिया का अनुभव रखतें हैं अगर हम उनके पास बैठें तो वो हमें बड़ी सरलता से उसे हमें समझा सकतें हैं

सूदूर जापान में भी है एक मिथिला


उनका नाम टोकियो है, लेकिन वह रहते निगाता में हैं और उनका दिल मिथिला के लिए धड़कता है। जिस जापान में कुल बीस हजार ही हिंदुस्तानी रहते हों, वहां अलग से मिथिला के नाम पर कुछ होना अपने आप में चौंकाने वाला है। इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि वह व्यक्ति कोई हिंदुस्तानी नहीं बल्कि एक जापानी है।
जापान के टोकियो हासेगावा टोक्यो से कई सौ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बंदरगाह शहर निगाता में एक पहाड़ी पर बने मिथिला म्यूजियम के निदेशक हैं। यह म्यूजियम उन्हीं की परिकल्पना है और उन्होंने इसकी स्थापना उस समय की थी जब जापान में मुट्ठीभर भारतीय रहे होंगे।
हासेगावा एनपीओ सोसायटी टू प्रोमोट इंडो-जापान कल्चरल रिलेशंस के प्रतिनिधि के हैसियत से टोक्यो में 16 साल से फेस्टिवल करा रही नमस्ते इंडिया कमेटी के 2003 से चेयरमैन भी हैं और इस सोसायटी का सचिवालय भी मिथिला म्यूजियम से ही कार्य कर रहा है।
हासेगावा के मिथिला से प्रेम की कहानी बड़ी रोचक है। वह उन जापानियों में से नहींजो महज भारत प्रेम में डूबे हैं बल्कि उनका प्रेम अध्यात्म, संस्कृति और प्रकृति की कई प्रेरणाओं से उपजा है। हाशेगावा खुद को जापान के एडो काल की 16वींपीढ़ी का मानते हैं। महज 18 वर्ष की उम्र में वह संगीतकार बने और संगीत में नई धाराओं व प्रयोगों की खोज में लग गए। जल्द ही उन्हें यूरोपीय म्यूजियमों से न्योते आने लगे। महज 24 की उम्र में उन्होंने जापान छोड़ दिया। लौटकर उन्होंने एडो काल की उकीयोए पेंटिंग के विकास में खुद को लगा दिया।
हाशेगावा उन लोगों में हैं जो आधुनिकता को विरासत का और विकास को प्रकृति का दुश्मन मानते हैं। वे मानते हैं कि मनुष्य मूल रूप से संगीत, नृत्य व कविता का प्रेमी रहा है। इसीलिए पुरानी परंपराओं की जिंदा रखने के लिए उन्होंने पहले निगाता में एक प्राथमिक स्कूल की स्थापना की।
हाशेगावा 1982 में भारत गए। वहींउन्हें किसी से मधुबनी पेंटिंग के बारे में जानकारी मिली। उत्साहित हाशेगावा मधुबनी चले गए जहां उनकी मुलाकात गंगा देवी से हुई। यह मुलाकात और मधुबनी चित्रकारों की खराब स्थिति उनकी प्रेरणा बने। मधुबनी पेंटिंगों से उन्होंने उसी तरह से नाता जोड़ा जैसे अपने देश की लुप्त होती कलाओं से जोड़ा था। लौटकर उन्होंने मिथिला म्यूजियम की स्थापना की। उसके बाद सब इतिहास है।
हाशेगावा 25 बार भारत जा चुके हैं और 1500 से ज्यादा मधुबनी पेंटिंग निगाता की रौनक बढ़ा रही हैं। वह चित्रकारों को मदद देते हैं, उनकी पेंटिंग खरीदते हैं। यही नहीं, वह इन चित्रकारों को जापान लेकर जाते हैं। ये चित्रकार निगाता में ही महीनों रहते हैं, पेंटिंग बनाते हैं। दो सौ से ज्यादा लोग यहां आकर रह चुके हैं। हर चीज का खर्च खुद हाशेगावा उठाते हैं। मशहूर मधुबनी चित्रकार बुआ देवी और कर्पूरी देवी नौ-नौ बार जापान जा चुकी हैं। हर प्रवास कई-कई महीनों चला है।
अब हाशेगावा खुद को मधुबनी पेंटिंग का हिस्सा मानते हैं। वे पेंटिंगों में प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल पर जोर डालते हैं, लिहाजा कर्पूरी देवी व बुआ देवी गेरूं, सेम, काजल व सिंदूर का इस्तेमाल करती हैं। यही नहीं, हाशेगावा इन मशहूर चित्रकारों के कई चित्रों की परिकल्पना भी तैयार करते हैं। अब यह प्रक्रिया कई अन्य भारतीय कलाओं की भी मददगार बनी है। महाराष्ट्र की वारूड़ी पेंटिंग इसी कड़ी में शामिल है। पीतल, बांस, मिट्टी से शिल्प तैयार करने वाले कई कलाकार और नर्तक भी निगाता आते हैं। नमस्ते इंडिया फेस्टिवल के लिए दो टेराकोटा कलाकार दो महीने निगाता आकर कलाकृतियां बनाते रहे। इसी तरह नोएडा के पास सिकंदराबाद के शम्सुल हक भी तीन हफ्ते तक अपने एक साथी के साथ निगाता में रुककर बांस के हाथी बनाते रहे।
भारतीय कलाओं का यह बेजोड़ प्रेमी भारतीय संस्कृति के इस जश्न का प्रेरणास्रोत रहा है। तमाम तंगी के बावजूद उन्होंने इसे रुकने नहीं दिया। लेकिन उन्हें भारत में वह पहचान नहीं मिली जिसके वह हकदार थे। जापान में भारतीय दूतावास की तमाम कोशिशों के बावजूद भारत सरकार ने जब इस ओर कान नहींधरा तो दूतावास ने उन्हें 2007 में भारत-जापान एक्सचेंज अवार्ड दे डाला। आज मधुबनी पेंटिंगों की दुनियाभर में पहचान बनी है तो उसमें एक जापानी टोकियो हाशेगावा का भी बड़ा योगदान है।

चामुंडा मंदिर हादसा : हांफी राहें, टूटा दम

किले की दीवारें अवाक् रह र्गई। संकरी राहें सिसकने लगीं। एक पल में कई गोद सूनी हो गईं। जयकारों के बीच ‘मां-मां’ की पुकारें गूंजने लगीं। किले के सदियों के इतिहास में मंगलवार को एक स्याह पल में कलंक लग गया।
जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग स्थित चामुंडा माता मंदिर व्यवस्था में लापरवाही का स्थाई दस्तावेज बन गया! ..लापरवाही की फिसलन, हजारों श्रद्धालु.. प्रशासनिक अमला नदारद।
कभी जयघोष से गूंजने वाली किले की बुर्जियां घायलों की हृदयविदारक चीत्कारों से जार-जार हो र्गई। ऐसे हालात में भी शहर ने दिखाया, जोधपुरी परंपरा में कितना माद्दा है। बाकी बेटे आ जुटे, टैक्सी वाले निशुल्क सेवाएं देने लगे, रक्त देने के लिए अस्पताल में कतारें लग गईं..
फिसलन भरा हादसा
नारियल फोड़ने से निकले पानी की फिसलन से लोग एक दूसरे पर गिरते गए और पैरों के नीचे दबने से ज्यादातर मौतें हुईं।
अफवाह की भगदड़
जैसे ही कुछ लोग गिरे, कहीं दीवार गिरने, तो कहीं बम की अफवाहें फैल गईं, जिससे भगदड़ मच गई।
खामियों का इंतजाम
मंदिर व रास्ते में नारियल फोड़ने को प्रतिबंधित नहीं किया गया था। बेरिकेड्स इस तरह लगाए थे कि रास्ता मात्र 5 फीट का रह गया।
बुझ गए चिराग
मरने वालों में ज्यादातर पुरुष थे, उनमें भी युवा व किशोर अधिक हैं। 12 से 26 वर्ष के युवकों की संख्या अधिक बताई जा रही है।
फूट पड़ा गुस्सा
लोगों में इस हादसे की वजह से इतना गुस्सा था कि सांसद की पिटाई कर डाली व विधायक को भी खरी-खोटी सुना दी।
हर जगह चल रहा था इलाज
शहर के निजी अस्पतालों में भी कोहराम मचा हुआ था। अस्पतालों के बाहर कोई रो रहा था तो कोई अपने रिश्तेदार को ढूंढ रहा था। कहीं पर शव को घर ले जाने की तैयारी थी तो कही पर हाथों में उठाए बेहोश लोगों को लाया जा रहा था।
कमोबेश आठ से दोपहर बारह बजे तक यह दृश्य शहर के निजी अस्पतालों में देखे गए। भीतर के दृश्य तो रुलाने वाले थे। अस्पतालों के इंतजार कक्ष ही मुर्दाघर बने हुए थे। लाशें कतार में रखी थीं। पुलिस मृतकों की शिनाख्त कर रही थी तो परिजन शव के पास विलाप कर रहे थे। गोयल अस्पताल में 31 जनों की मौत हुई।
एमडीएम के समीप होने से दुर्ग से कई गंभीर घायलों को गोयल अस्पताल लाया गया। अस्पताल के बाहर पुलिस का जमावड़ा था तो परिजनों की भीड़। भीतर स्ट्रेचर पर कइयों का उपचार किया जा रहा था। अंडर ग्राउंड में बड़ा कमरा जहां मरीजों के परिजन इंतजार करते हैं, वो कक्ष मुर्दाघर नजर आया।
करीब एक दर्जन शव वहां पड़े थे। पुलिस शवों की श्निाख्त कर रहा थी। परिजन जल्द से जल्द शव ले जाने की गुहार कर रहे थे। कमला नगर अस्पताल में 28 जनों की मौत हुई। दुर्ग से घायलों को सूरसागर के रास्ते इस अस्पताल में लाया गया। अस्पताल में गमगीन माहौल था। शव एंबुलेंस में ले जाने की व्यवस्था की जा रही थी तो कई स्वयंसेवी संस्थाओं की गाड़ियां मदद के लिए आ गई। र्न्िसग स्टाफ व चिकित्सक घायलों को हर संभव उपचार देते नजर आए। मणिधारी अस्पताल में 16 जनों ने दम तोड़ा।
कनात की स्ट्रेचर बनाई
घायलों को नीचे लेजाने के लिए दुर्ग पर लगे अस्थाई हाट बाजार में लगी कनातें उखाड़ कर लोगों ने स्ट्रेचर की तरह उपयोग में लिया।
क्रेन को बनाया एंबुलेंस
हादसे के समय एंबुलेंस मौजूद नहीं होने से दुर्ग के बाहर खड़ी यातायात क्रेन को ही एंबुलेंस बनाया व उस पर घायलों व मृतकों को डालकर अस्पताल पहुंचाया। वहीं दुर्ग के बाहर खड़ी कारों, बसों व जीपों आदि में भी घायलों को अस्पताल ले जाया गया।

मेरा विचार

१। आप लोग भी अपने शहर, गांवों के मंदिरों को देखें

२। उनकी क्या व्यवस्था है उसे देखें और अपने ब्लागों पर लिखे तथा चित्र भेजे

३। अगर मन्दिर में नारियल फोडे तो अंत में मन्दिर में जो कचरा आप फैला कर आए हैं उसके प्रति जिम्मेवार बने

४। संकोच त्याग कर अपना कचरा अपनी पोलीथिन में ले आए और अपने क्षेत्र के कूड़ाघर में डाले