Wednesday, October 8, 2008

हिंदी में अमिताभ और राहुल उपाध्याय

बिग बी अपना ब्लॉग आरंभ करने के समय से ही आश्वासन दे रहे हैं कि वे जल्दी ही हिंदी में लिखना आरंभ करेंगे। अपनी व्यस्तता और तकनीकी दिक्कतों के कारण 171 दिनों के बाद भी वे हिंदी में लिखना आरंभ नहीं कर सके हैं, लेकिन हिंदी में अमिताभ बच्चन के ब्लॉग पढ़ना चाहने वालों को अब निराश होने की जरूरत नहीं है। अमेरिका के सिएटल शहर के निवासी राहुल उपाध्याय ने यह संभव कर दिया है। लंबे इंतजार के बाद उन्होंने 158वें दिन से बिग बी के ब्लॉग का हिंदी अनुवाद अपने ब्लॉग http://amitabhkablog-hindi.blogspot.com पर पोस्ट करना आरंभ कर दिया है।
अमेरिका के सिएटल शहर से दैनिक जागरण से खास बातचीत में राहुल उपाध्याय ने बताया ,आप उनके ब्लॉग की टिप्पणियां पढ़ें तो पाएंगे कि उनके ढेर सारे प्रशंसक उन्हें हिंदी में पढ़ना चाहते हैं। निश्चित ही कुछ अड़चनों और तकनीकी सीमाओं के कारण वे ऐसा नहीं कर पा रहे होंगे। मैंने सोचा कि क्यों न उनका बोझ हल्का कर दिया जाए। उन्हें कोसने से अच्छा है कि हम उन्हें हिंदी में दूसरों के लिए उपलब्ध कर दें। क्या उन्होंने अमिताभ बच्चन से अनुवाद की अनुमति ली है? नहीं, मुझे नहीं मालूम कि यह अनुमति कैसे मिलेगी। मैंने उन्हें 168वें दिन की 40वीं टिप्पणी में पूछा है कि अगर उन्हें आपत्ति हो तो मैं अनुवाद बंद कर दूंगा। अगर वे चाहें तो अपने ब्लॉग पर मेरे अनुवाद का लिंक दे सकते हैं। मुझे अभी तक उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिली है। मूलत: रतलाम के निवासी राहुल उपाध्याय पिछले 22 सालों से अमेरिका में रह रहे हैं। वे अमिताभ बच्चन के अनन्य प्रशंसक हैं और हिंदी फिल्में देखना उनकी रोजमर्रा में शामिल है। वे स्वीकार करते हैं कि हिंदी फिल्मों ने उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैंने मां की परिभाषा, बहन की इज्जत, राखी की गरिमा, होली-दीवाली का महत्व - ये हिंदी फिल्मों से ही सीखा है। राहुल उपाध्याय बिग बी की हर पोस्ट का शीघ्रातिशीघ्र अनुवाद अपने ब्लॉग पर डालते हैं।
मेरा विचार
१। अमिताभ प्रेमी हिन्दी भाषियों के लिए अच्छी ख़बर है
२। राहुल जी रतलाम से भी हैं रतलाम के लोग बहुत तेज़ गति से आगे जा रहे हैं
३। यह ख़बर जागरण से ली गई है
४। राहुल जी को उनके प्रयासों के लिए मेरी बधाई
५। मेरा अनुरोध और दुसरे भाषाओँ के जानकर लोगों से है कि समय - समय पर विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध किस्से, कहानी, व्लागस, कविता और भी सुंदर आलेख हिन्दी में रूपांतरित कर प्रसारित करे इससे हिन्दी भाषी जन मानस का ज्ञान बढेगा

Tuesday, October 7, 2008

आंगनबाड़ी महिलाकर्मियों को मिलेगी साड़ी

तीन से छह साल के बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए ताजा पकाये या पहले से तैयार पूरक पोषाहार (सप्लीमेंट्री न्यूट्रीशन) पर फैसला अभी बाकी है। लेकिन सरकार की नजर आंगनबाड़ी केंद्रों की लगभग 18 लाख महिला कार्यकर्ताओं पर जरूर पहुंच गई है। लोकसभा चुनाव के पहले वह उन्हें एक और तोहफा देने की तैयारी में है। केंद्रीय कैबिनेट की मुहर लगते ही वे साल में दो सरकारी साड़ियों की भी हकदार हो जाएंगी।
सूत्रों के मुताबिक समेकित बाल विकास योजना में बदलाव के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों की मुख्य कार्यकत्रियों व सहायिकाओं को साल में दो-दो साड़ियां दिए जाने का प्रस्ताव किया गया है। व्यय वित्त समिति (ईएफसी) ने भी उसकी मंजूरी दे दी है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इसको शामिल करते हुए आईसीडीएस के पूरे संशोधित प्रस्ताव को कैबिनेट की हरी झंडी के लिए भी भेज दिया है। बताते हैं कि बुधवार को कैबिनेट संभावित बैठक में संशोधित प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने की भी उम्मीद थी। लेकिन महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री रेणुका चौधरी की गैरमौजूदगी के चलते यह मामला अगली बैठक के लिए टल गया है। गौरतलब है कि आंगनबाड़ी केंद्रों की महिला कार्यकर्ताओं का मानदेय पहले ही एक हजार से डेढ़ हजार रुपए और सहायिकाओं का 500 रुपए से 750 रुपये प्रतिमाह किया जा चुका है।
सूत्र बताते हैं कि वित्त मंत्रालय ने आईसीडीएस में बदलाव की बाबत महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के कुछ प्रस्तावों पर भले सहमति जता दी हो, लेकिन उसने कई मांगों को खारिज भी कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि उसने इस योजना को 'मिशन मोड' में रखे जाने से असहमति जता दी है, जिससे योजना को प्रभावी तरीके से लागू कराने में मदद मिलती। इसके अलावा आईसीडीएस का काम देखने के लिए मंत्रालय में खासतौर से एक अपर सचिव का पद सृजित करने से भी वित्त मंत्रालय ने इनकार कर दिया है। साथ ही संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी के नए पद के लिए व्यय विभाग से संपर्क करने की सलाह दी है। लिहाजा उसके लिए भी अगली
इतना ही नहीं, उसने आंगनबाड़ी भवनों को पक्का बनाने के लिए अलग से धन देने से भी इनकार कर दिया है। उल्लेखनीय है कि बच्चों को ताजा पकाये या पहले से तैयार (रेडी टू ईट) पूरक पोषाहार (सप्लीमेंट्री न्यूट्रीशन) पर अर्से से विवाद है। यह मामला दो बार हुई ईएफसी की बैठक में भी नहीं सुलझ सका। लिहाजा उसका फैसला भी अब कैबिनेट की अगली बैठक में ही होना है।

स्वच्छता पर आधारित सलाहकार समूह बनेगा

केंद्र सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान शत प्रतिशत स्वच्छता हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। शहरी स्वच्छता पर आधारित एक राष्ट्रीय सलाहकार समूह के गठन करने की भी योजना है।
शहरी विकास मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि इसका उद्देश्य यह है कि शहरों के सभी निवासियों की पहुंच सुरक्षित और स्वस्थ स्वच्छता सुविधाओं और व्यवस्थाओं तक हो। वे इनके इस्तेमाल में सक्षम हों ताकि कोई भी व्यक्ति खुले में शौच के लिए नहीं जाए।
सूत्रों का कहना है कि इस नीति का दृष्टिकोण यह है कि सभी भारतीय बाजार और शहर पूर्ण रूप से स्वच्छ, स्वस्थ और रहने लायक बन जाएं। इस नीति के तहत स्वच्छता के बारे में जागरूकता पैदा करके व्यावहारिक बदलाव लाने पर जोर दिया गया है।
मेरा विचार
१। यह सुनकर प्रसन्नता हुई कि सरकार स्वच्छता के प्रति जागरूप हो रही है
२। आज भी सारे गाँव शहर अपने प्रमुख बाजारों, स्थलों, सरकारी केन्द्रों पर सुरक्षित और स्वस्थ स्वच्छता सुविधा उपलब्ध नहीं कर पाएं हैं
३। जो सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं उनका मापदंड बहुत ही न्यूनतम है
४। सरकार अगर नागरिकों से टैक्स लेती है तो उसे पीने का साफ पानी तथा सुरक्षित और स्वस्थ स्वच्छता सुविधा मुफ्त उपलब्ध करानी चाहिए

Monday, October 6, 2008

मैडम की मार से ही मेरा हाथ टूटा

इंदौर. चोरल के पास सुरतीपुरा गांव में चौथी कक्षा की छात्रा का हाथ तोड़ने के मामले की रिपोर्ट सोमवार को सबमिट होगी। छात्रा ने अधिकारियों के सामने खुलकर बयान दिया कि पहाड़ा याद नहीं होने पर उसे प्रधानाध्यापिका सोनाली बुदे ने मुर्गा बनाया। पेन गिरने पर जब वह उसे उठाने लगी तो शिक्षिका ने पीठ पर लात मारी और उसका हाथ दीवार से टकरा गया। जिससे हाथ टूट गया।

हाथ टूटने से परेशान बच्ची का हाल जानने और उसके साथ हो रही ज्यादती का जायजा लेने रविवार को भास्कर टीम फिर सुरतीपुरा पहुंची। ललिता पहले की तरह अपने बयान पर कायम है।

स्कूल में ही पढ़ने वाली सपना, अलका और मुनिया ने भी कहा कि मैडम ने ललिता को मारा था। प्रधानाध्यापिका जिस छात्रा छीता पर दोष मढ़ रही है उस छात्रा ने भी कहा कि वह लंबे समय से स्कूल नहीं जा रही है और उसने ललिता का हाथ नहीं तोड़ा है।

यही नहीं एक छात्रा ने बताया कि उसे स्कूल में धमकी दी गई थी कि मैडम ने हाथ तोड़ा, यह किसी को नहीं बताए। यह सभी बयान भास्कर के पास रिकॉर्ड हैं लेकिन छात्रा के भविष्य के मद्देनजर उसका नाम उजागर नहीं किया जा रहा है।

सांच को कैसी आंच

सच-झूठ का पहाड़ा, किस पात्र को क्या याद.. जानिए —

मां रामकन्या व पिता राजाराम -उस दिन जब शाम को लौटे तो घटना पता चली कि मैडम ने मुर्गा बनाया और मारा, जिसमें हाथ टूटा। इलाज के लिए हम मैडम के पास बीमा के पैसे पूछने गए थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। बाद में अंगूठा लगवा लिया। पर यह नहीं बताया कि कागज में क्या लिखा है।

माया मालवीय, डीईओ- ललिता ने बताया था कि पहाड़ा याद नहीं होने पर मैडम ने मुर्गा बनाया था और लात मारी जिससे मेरा हाथ टूट गया।

आरएस मकवाना, संकुल प्रभारी, चोरल -ललिता ने बताया कि प्रधानाध्यापिका ने उसे मारा और उसका हाथ टूट गया। हालांकि अलग-अलग बयान भी आए हैं। मैंने प्रधानाध्यापिका से सफाई मांगी है कि घटना की जानकारी संकुल को क्यों नहीं दी गई?

मदनलाल गुप्ता, बीईओ, महू -ललिता ने कहा, मैडम सोनाली बुदे ने मारा जिससे हाथ टूट गया। जबकि मैडम ने कहा छीता के साथ खेलते समय हाथ टूटा। हम छीता से नहीं मिल पाए। रिपोर्ट माया मालवीय के पास है। वही जमा करेंगी।

रामगोपाल गोदिया, शिक्षक, चोरल हाईस्कूल -बच्चों ने बताया छिपा-छाई खेलते समय छीता ने ललिता को धक्का दिया। फिर भी शिक्षकों को इलाज कराना चाहिए था। हमने स्पष्टीकरण मांगा है। (गोदिया ने छिपा-छाई कहा, कबड्डी नहीं)

मेरा विचार
१। बच्चों को हर बात में मारना ठीक नहीं है
२। अगर अध्यापकों को बच्चों से स्नेह नहीं है तो कोई दूसरा काम तलाशना चाहिए
३। मारने पीटने से बच्चों के मन पर बहुत बुरा असर पड़ता है
४। एक तो अध्यापक मारते पीटते हैं फिर झूट बोलतें हैं प्रतिदिन ऐसे कई उदहारण सुनने को मिलतें हैं जबकि छोटा बच्चा अपनी बात को अच्छी तरह से कह भी नहीं पाता है

इंस्पेक्टर शर्मा की पत्नी ने ठुकराई अमर की मदद

इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की पत्नी माया शर्मा ने अपने पति की
शहादत पर शक जताने वाले बयानों पर दुख जताया है। उन्होंने अपील की है कि उनके पति की शहादत का मजाक न उड़ाया जाए। एसपी नेता अमर सिंह, जामा मस्जिद के शाही इमाम समेत कुछ नेता बटला हाउस एनकाउंटर में इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के जाने पर सवाल खड़े कर चुके हैं। अमर सिंह ने इस मामले की जुडिशल इनक्वायरी की भी मांग की है। इस बयान से बेहद दुखी माया शर्मा ने अमर सिंह के 10 लाख रुपये के चेक को लेने से इनकार कर दिया है।

माया शर्मा ने एनबीटी से कहा कि यह उनके पति की शहादत का मजाक उड़ाने जैसी बात है। बेटे के गंभीर हालत में हॉस्पिटल में भर्ती होने के बावजूद इंस्पेक्टर शर्मा देश के लिए जान देने चले गए थे, घर में बुजुर्ग माता-पिता, दो अबोध बच्चे और पत्नी होते हुए कितने लोग देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर सकते हैं?

एनकाउंटर और इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत पर शक जताने वाले कई बयान आने के बाद पहली बार माया शर्मा ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस तरह के बयान देने वालों से सवाल किया कि क्या वे देश के लिए बलिदान दे सकते हैं? माया शर्मा ने कहा कि उन्हें अपने पति पर गर्व है। उन्होंने भारत के लिए वह काम कर गए हैं, जो कोई आम इंसान नहीं कर सकता। शहादत पर सवाल उठाने वाले लोगों से उन्होंने कहा कि अगर उन्हें शर्मा के बलिदान पर शक है तो वे देश के लिए इससे बेहतर कर दिखाएं।

माया ने कहा कि शहादत पर शक जताने जैसी विवादास्पद बातें नहीं की जानी चाहिए। इससे पुलिस फोर्स पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। देश में बोलने की आजादी है। कोई कुछ भी बोल सकता है। हालांकि साफ जाहिर है कि एनकाउंटर पर शक जताने वालों के पर्सनल इश्यू हैं।

इसी बीच दिल्ली पुलिस ने उन खबरों का खंडन किया है, जिनमें एनकाउंटर से कुछ दिन पहले इंस्पेक्टर शर्मा का ट्रांसफर किए जाने की बात कही गई है। अमर सिंह ने इसी आधार पर इंस्पेक्टर शर्मा के बटला हाउस जाने पर सवाल खड़ा किया है। स्पेशल सेल के डीसीपी आलोक कुमार ने इंस्पेक्टर शर्मा का ट्रांसफर किए जाने की खबरों को बेबुनियाद बताया है। उन्होंने कहा कि ये खबरें सरासर गलत हैं।

Sunday, October 5, 2008

इस शक्ति को नमन

इंदौर. इंदौर से करीब 20 किलोमीटर दूर खंडवा रोड पर दतोदा ग्राम पंचायत ने तिक्खी पहाड़ी से निकलने वाली बरसाती नदी में पाइप लाइन डालकर टकरावदा तालाब भर लिया। पूरा भर जाने के बाद इसमें इतना पानी जमा हो जाएगा कि अगली गर्मी तक परेशानी नहीं होगी।
ऐसे मोड़ी धारापंचायत के उप सचिव गुलाब सिंह मस्करा ने बताया सबसे पहले तालाब से नदी तक करीब सवा किलोमीटर लंबी पाइप लाइन बिछाई। फिर नदी में 10 हार्सपावर की मोटर डालकर उसे थ्री फेस कनेक्शन से जोड़ा। इसके बाद बहते पानी को तालाब में सहेजना शुरू किया। रोज 18 घंटे मोटर चलाकर 90 टैंकर पानी नदी से तालाब में शिफ्ट किया जा रहा है। इस पर कुल 80 हजार रुपए का खर्च आया है लेकिन गर्मी में रोज 10 हजार रुपए की बचत होगी।
इसलिए पड़ी जरूरतगांव के किसान पूनमसिंह राजपूत ने बताया बारिश में तो दतोदा में खूब पानी बहता है, लेकिन गर्मी में भारी किल्लत हो जाती है। गांव के करीब-करीब सभी बोरिंग सूख जाते हैं। पानी की व्यवस्था करना पड़ती है। इस बार इतना पानी इकट्ठा हो गया है कि मई-जून तक का बंदोबस्त हो जाएगा।
..ताकि न हो रिसावग्रामीण लीलाधर सलवाड़िया ने बताया तालाब भरने से पहले इसकी तलछटी में काली मिट्टी भरी गई, ताकि पानी नहीं रिसे। इसके बाद थोड़ा पानी भरकर देखा, नहीं रिसा तो लगातार भराई शुरू कर दी। गांव में बिजली का संकट है। इसलिए व्यवस्था ऐसी की है कि तीनों फेस बराबर मिलते ही मोटर शुरू हो जाती है और बिजली रहने तक चलती रहती है।
बूंद-बूंद के लिए तरस जाते थे
ठ्ठ गांव के ही श्यामलाल मुंडेल ने कहा गर्मी में एक-एक बूंद के लिए तरस जाते हैं। पीने के लिए न सही लेकिन उपयोग के लिए तो पानी मिल जाएगा।ठ्ठ गुलाब सिंह केलवा ने कहा जानवरों के पानी का संकट सालभर के लिए दूर हो गया है।ठ्ठ मोहनसिंह गौड़ ने कहा बिजली कटौती और डीपी में फाल्ट के कारण कई बार मोटर बंद हो जाती है। बिजली अधिकारी बिना रिश्वत के काम नहीं करते। नदी कुछ दिनों में सूख जाएगी। पानी यूं ही बह गया तो तालाब पूरा नहीं भर पाएगा।
बचत होगीगर्मी में हर घर में दो सौ रुपए में टैंकर मंगाना पड़ता है। इस हिसाब से सभी को काफी बचत होगी। तालाब अभी पांच इंच और भरा जाना है।-हरिसिंह वर्मा, सरपंच, दतोदा

Friday, October 3, 2008

स्टडी- बागवानी बच्चों को रखे प्रसन्न


जिस प्रकार से ड्राइंग रूम और रसोई की खिड़की पर रखे खूबसूरत पौधे घर के सौंदर्य में चार चांद लगाते है। उसी प्रकार से पेड़-पौधों के बीच समय गुजारने वाले बच्चों के व्यक्तित्व में चार-चांद लग जाते है अर्थात वे हमेशा प्रसन्न रहते है। यह कहना है ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का। वैज्ञानिकों का कहना है कि गमलों में फूलों के बीज डालने के बाद उनसे निकले अंकुर बच्चों ही नहीं बड़ों को भी उत्साहित करते है।
बागवानी के काम में भाग लेने से बच्चा अभिभावकों के साथ अपना भावनात्मक सामंजस्य भी स्थापित करता है। इससे बच्चे की शारीरिक गतिविधियों में भी वृद्धि होती है। जब आप अपने लॉन में सुबह-शाम पौधों को पानी देती है और आपके बच्चे इस काम में आपकी सहायता करते है, तो एक प्रकार से उनकी एक्सरसाइज भी हो जाती है। रंग-बिरंगे फूलों पर इतराती तितलियां और भंवरे आपके बच्चे को अपने पीछे-पीछे भागने के लिए उकसाते है। इससे उनकी जॉगिंग हो जाती है।
अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि बागवानी के जरिये बच्चे सीधे तौर पर प्रकृति के साथ अपना संबंध जोड़ते है। इससे बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति संतुष्ट होती है। साथ ही उनमें जोश और उत्साह का संचार होता है। प्रकृति के विषय में उन्हे आश्चर्यजनक जानकारी मिलती है। रंग-बिरंगे और किस्म-किस्म के फूल बच्चों को प्रकृति में फैली विविधता से परिचय कराते है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को बागवानी का व्यवहारिक ज्ञान देने के लिए उन्हे शुरुआती दौर से ही सिखाएं। विभिन्न रंग-बिरंगी पुस्तकों से उन्हे मौसमी और पूरे साल हरे-भरे रहने वाले पौधों की जानकारी दें। बचपन में प्रकृति से इस प्रकार का सीधा संबंध उन्हे आगे के जीवन में भी उपयोगी सिद्ध होगा। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति के साथ रूबरू होने से बच्चों में धैर्य की भावना विकसित होती है, जो जीवन में सफलता के लिए निहायत जरूरी है। पौधों का धीरे-धीरे बढ़ना, समय के साथ उनका पुष्पित होना और उनमें फल आना यह सब बच्चे को धैर्य सिखाते है।