Sunday, August 21, 2011

दादी के करामाती नुस्खे

मंझार गांव की किरण ने दादी के परंपरागत फार्मूले को आजमाकर शीशम के हजारों सूखे पेड़ों को हरा-भरा कर दिखाया है। उन्होंने केरोसिन का इस्तेमाल कर शीशम के पेड़ों में फिर से हरियाली भर दी। बहुमूल्य शीशम वृक्ष ड्राईबैग नामक बीमारी से सूख रहे थे। उन्हें बचाने में सारे प्रयास विफ ल हो चुके थे। लेकिन बीए भाग-2 की छात्रा किरण ने ५० ग्राम केरोसिन व नीम का तेल तथा १०० ग्राम कार्बोफ्यूरॉंन को १० लीटर पानी में मिलाकर ऐसे पांच वृक्षों की जड़ों में १० दिनों तक डाला, तो ये पेड़ फिर से हरे-भरे हो गए।
उनके इस प्रयोग के बाद गांव के अन्य किसान भी यही तरीका आजमाने लगे। किरण ने शीशम के अलावा अन्य पेड़ों में फैलने वाले तना छेवक पीड़क (एक प्रकार का कीट) से बचाव का उपाय भी ढूंढ़ा है। चूने में तंबाकू का पाउडर मिलाकर पेड़ों को रंगने से कीड़े उन पर नहीं चढ़ते हैं। किरण बताती हैं कि कुछ अरसा पहले शीशम के सूखने की बीमारी फै ली थी। उनके पारिवारिक खेतों में सैकड़ों पेड़ सूख गए, जिससे करीब ५ लाख रुपए का नुकसान हुआ। एक दिन वे सूखे पेड़ों के पास खड़ी थीं, तो उनके मन में यह सवाल आया कि आखिर ये पेड़ क्यों सूख रहे हैं। उनकी दादी घर के किवाड़ में, जहां कीड़े लग जाते थे, मिट्टी का तेल लगाती थीं और कीड़े नष्ट हो जाते थे।

Tuesday, August 16, 2011

किसन बापट बाबूराव हजारे 'अन्ना'

अन्‍ना हजारे का असली नाम किसन बापट बाबूराव हजारे (प्यार से लोग अन्ना कहते) हैं।
हजारे का जन्म 15 जनवरी 1940 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भीनगर गांव में हुआ। पिता का नाम बाबूराव हजारे मां का नाम लक्ष्मीबाई हजारे है। अन्ना का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे, दादा फौज में थे।
अन्ना का पैतृक गांव अहमद नगर जिले में स्थित रालेगन सिद्धि में है। हजारे के दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के 6 भाई हैं।
परिवार में व्याप्त आर्थिक तंगी को देखते हुए अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। यहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। कठिन हालातों में परिवार को देख कर उन्होंने परिवार का बोझ कुछ कम करने की सोंची। और वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रूपए महीने की पगार में काम करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने खुद फूलों की दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान युवाओं को सेना में शामिल होने की सरकार की अपील पर वे मराठा रेजीमेंट में बतौर ड्राइवर नियुक्त हुए। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनकी पूरी यूनिट शहीद हो गई। गोली अन्ना को भी लगी, लेकिन बच गए। जिस ट्रक को अन्ना चला रहे थे, उस पर गोलाबारी हुई थी।
इस घटना के 13 साल बाद सेना से रिटायर हुए लेकिन अपने पैतृक गांव महाराष्ट्र के अहमदनगर में भीगांव नहीं गए। पास के रालेगांवसिद्धि में रहने लगे। वे कहते हैं कि समाजसेवा की प्रेरणा उन्हें स्वामी विवेकानंद की एक पुस्तक से मिली। उन्होंने अपना जीवन समाजसेवा को समर्पित कर दिया।


Friday, August 5, 2011

भाग्यवान इंसान

द्वारा : सुषमा पाण्डेय

मैं दुनिया का सबसे भाग्यवान इंसान हूँ, ये सुनने में कम ही आता है, अभागा होने का रोना रोने वाले तो करोड़ों में मिल जायेंगे लेकिन अपने भाग्य को सराहने वाला शायद ही कोई मिले. हर छोटी से छोटी बात पर भी भाग्य को कोसना, ये तो हमारी किस्मत ही खराब थी, ये सब हमारे साथ ही होना था. धिक्कार हैं! वो लोग जो भाग्य को कोस रहे हैं. हम क्या हैं? हमारा वजूद हमारा भाग्य नहीं कर्म निश्चित करते हैं. भाग्य ही एक ऐसी चीज है जिसे इंसान खुद जैसा चाहे गढ़ ले. दुनिया मैं किसी भी सफल इंसान को लो क्या वो परेशानियों से मुक्त था? जितनी बड़ी परेशानी उतना बड़ा सौभाग्य. अगर हर इंसान सिर्फ भाग्य को ही कोसता तो जानते हैं क्या होता, अभी तक हम असभ्य ही रहे होते. दुनिया भाग्य से नहीं हाथों और इन्द्रियों के मेल से चलती है. दुर्भाग्य क्या है कोई बताये मुझे?

सौभाग्य मैं जानती हूँ. "मैं सौभाग्यशाली हूँ" की इंसान के रूप में इस धरा पर आयी हूँ, मेरे पास करियत्री प्रतिभा है; ईश्वर ने मुझे अपने अंश से सर्वश्रेष्ठ भाग दिया है. शुक्रगुजार हूँ इस चमकते सूरज के लिए, मीठी चाँदनी के लिए और उसके द्वारा दी गयी उन चंद परेशानियों के लिए जिनसे वो मेरे वजूद को परखना चाह रहा है. असल मैं जन्म के बाद एक ही चीज है जिसके लिए हमें ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए वो हैं हमें दी गयी जिम्मेदारियां जिन्हें हम दुःख या फिर दुर्भाग्य कह देतें हैं. हम क्यों भागते हैं परेशानियों से? इन्हें हल कीजिये, ये हल हो सकती हैं, आज नहीं कल इनका हल निकलेगा. आप इन्हें किसी के भरोसे ना छोड़े कम से कम भाग्य के तो कतई नहीं. क्योंकि भाग्य हमारी नकारात्मक सोच का एक ऐसा काल्पनिक बुलबुला है जिसका कोई अपना अस्तित्व होता ही नहीं है. क्यों अब भी कोई संकोच बाकी है ये कहने में कि "मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान हूँ". मैं कौन हूँ जो ये कहूं की अपनी सोच बदलो. आप अपने दुर्भाग्य के साथ जितना जीना चाहें जी लें. लेकिन ये बंदी तो कभी दस्तक ही नहीं देगी दुर्भाग्य के दरवाजे.

Monday, June 6, 2011

मिट्टी

दैनिक भास्कर , सैयद शहरोज कमर, रांची

कहीं टेराकोटा, डोकरा तो कहीं सीरामिक की बिखरी खामोश कलाकृतियां के बीच आवाज गूंजती है, ..तो मिट्टी के बिना जिंदगी भी कहां है? मैं तो मिट्टी में ही जीती हूं, मिट्टी के साथ ही जीना चाहती हूं। यह मिट्टी सब कुछ दे सकती है। ऐसा कहते हुए रेशमा दत्ता का चेहरा दमक उठता है। इसकी वजह है, घोर नक्सल प्रभावित इलाके में उनकी मेहनत के बूते 70 घरेलू महिलाओं को मिली आत्मनिर्भरता। रेशमा इन दिनों रांची मारवाड़ी कॉलेज में शोनांतो दा के साथ एक म्यूरल पर काम कर रही हैं। इसे लेकर वह खासा उत्साहित है। कहती हैं यहां बहुत कुछ करना है।

2007 से चल पड़ा कारवां

राजधानी से महज 45 किलोमीटर के फासले पर बुंडू में चल रही है, गुरबत और बदहाली को पछाड़ती एक मौन क्रांति। जिसे सन 2007 में अपने दो साथियों शुचि स्मितो व बहादुर के साथ मिलकर रेशमा ने शुरू किया था। उन्होंने शांति निकेतन से फाइन ऑटर्स में बैचलर, महाराजा सेगीराव से मास्टर की डिग्री व जापान से फैलोशिप हासिल की है। धीरे धीरे उनका कारवां बढ़ता गया। 25 वर्ष की पोलियोग्रस्त देवंती से लेकर 80 साल की मीनू तक, अब इस कारवां में पुष्पा, सुधा और रूबी जैसी 70 ठेठ घरेलू औरतें हैं। लेकिन उनकी कला ने उन्हें एक नई पहचान दी है। आज वह रांची, अहमदाबाद और दिल्ली जाकर एग्जिविशन लगाती हैं।

कैसे होता है काम

पास के खेतों से लाई जाती है मिट्टी। उसे कुंभकार के हाथ खूबसूरत शिल्प आकार देते हैं। उसके बाद उसे रंग बिरंगे फूल पत्तियों से सजाया जाता है। बांस की खपचियों व लकड़ियों का इस्तेमाल सुंदर जेवरों और थैले, डलिया आदि के लिए किया जाता है। रेशमा ने कई म्यूरल भी बनाए हैं। रांची कडरु स्थित फ्लाई ओवर पर उनका बनाया म्यूरल झारखंड की संस्कृति से लबरेज है। उनके काम में लोक कहीं भी ओझल नहीं होता। यह कमाल बुंडू के हरे भरे पहाड़ी परिवेश में गूंजते मादर की थाप का है। इलाके के दलित और आदिवासी घरों की औरतें पौ फटते ही उठ जाती हैं। घर का सारा काम निपटाने के बाद वे सुबह के 11 बजे तक रेशमा के यहां पहुंचती हैं । फिर अपने हुनर और फन को निखारने और संवारने में लग जाती हैं। कोई पेंटिंग करती हैं, तो कोई मोतियों को धागा में पीरोती हैं। अंधेरा घना होने से पहले पहले घर वापस लौट आती है। इस तरह हर औरत के बटुआ में आ जाता है मासिक पांच से छह हजार रुपए तक।

बुंडू ही क्यों

अच्छी खासी पढ़ाई कर चुकी रेशमा ने आखिर बुंडू जैसी बेहद पिछड़ी जगह का चुनाव क्यों किया। उनके सामने तो कई विकल्प थे। वह कहीं भी जा सकती थीं। घर की पृष्टभूमि भी बेहतर थी। लेकिन उनके जवाब से असहमति मुश्किल होती है। उन्हें अपनी मिट्टी से गहरा लगाव है। यहां से जुड़ी हिंसा की खबरें उन्हें बेचैन करती थीं। वहीं उनके गांव घर के पास गरीबी से बदहाल लोगों के दर्द को महसूस कर उन्होंने बुंडू में ही रहकर कुछ सार्थक करने का मन बनाया। जिससे यहां की घरेलू औरतों को भी आर्थिक मदद मिल सके। आज उनकी अगुवाई में आधार नामक महिला शिल्प उद्योग स्वावलंबी सहयोग समिति बखूबी काम कर रही है। रेशमा का इरादा आधार से जुड़े परिवार के बच्चों के लिए एक अच्छा स्कूल खोलने का है।

Thursday, June 2, 2011

पैदल चली, दीये की रोशनी में पढ़ी

स्त्रोत : दैनिक भास्कर , महेंद्र सिंह

नाथूसरी चौपटा. धूप हो या बारिश, पढ़ाई के लिए हर दिन 14 किलोमीटर का सफर, फिर घर के कामकाज में माता-पिता का हाथ बंटाना, रात को दीये की रोशनी में पढ़ाई की। जब रिजल्ट आया तो नंबर आए 97.4 प्रतिशत। यह कहानी है गांव जमाल के राजकीय कन्या उच्च विद्यालय की दसवीं कक्षा की छात्रा ममता की।

ममता के पिता भरत सिंह खेत-मजदूरी करते हैं और माता बाधो देवी गृहिणी हैं। ममता ने सीमित संसाधनों और सुविधाओं के बीच बड़े-बड़े सपने देखे। मजदूर पिता और गृहिणी माता ने बेटी के सपनों को सपनों को साकार करने के लिए जी तोड़ मेहनत की। लेकिन ममता की राह आसान नहीं थी।

जनवरी में ग्यारहवीं में पढ़ रही उसकी बड़ी बहन सुनीता का हृदयगति रुकने से देहांत हो गया। सदमे के कारण ममता 20 दिन तक तो स्कूल भी नहीं जा सकी। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। ममता ने दोबारा अपने आप को तैयार किया और फिर से जुट गई पढ़ाई में। कुछ ही दिनों में पीछे छूटी पढ़ाई को शिक्षकों की मदद से पूरा कर लिया।

ममता का परिवार जमाल गांव से सात किलोमीटर खेतों में बने कच्चे मकानों की ढाणी में रहता है। ममता के घर पर किसी प्रकार की आधुनिक सुविधा नहीं है। यहां तक की बिजली भी नहीं है। लेकिन ममता ने कभी संसाधनों की कमी का बहाना नहीं बनाया। मिट्टी के तेल के दीये की रोशनी में ही पढ़ाई की। दिन में स्कूल से लौटकर काम में माता-पिता का हाथ बंटाती और रात को पढ़ाई। सुबह पैदल ही स्कूल के लिए निकल जाती और शाम को पैदल ही घर लौटती। ममता का लक्ष्य आईआईटी में दाखिला लेकर इंजीनियर बनना है। अब वह गांव के ही राजकीय संस्कृति मॉडल स्कूल में अंग्रेजी माध्यम में दाखिला लेगी।

मैं तो मजदूरी करणियां हां। मेरो बेटो टेलर है। महां नै बढी खुशी अ कि म्हारी बेटी नैं इत्ता नंबर लिया है। महां नै ममता तई पढ़णगी पूरी छूट दे राखी है। आ जो भी कोर्स करैगी म्हें करांवांगा। कम उ कम म्हें तो कोनी पढ़ सक्यां म्हारी बेटी न तो पाछै कोनी रहण दयां।

भरत सिंह, ममता के पिता

उनके विद्यालय की छात्रा ममता ने राजकीय स्कूल में पढ़ाई कर 97.4 प्रतिशत अंक हासिल किए। ममता शुरू से ही मेधावी छात्रा रही है। मुश्किल परिस्थितियों में भी मुस्कराना ममता की खूबी रही है। हम बाकी विद्यार्थियों को भी उससे प्रेरणा लेने को कहते हैं।

रमेश कुमार, स्कूल के मुख्य अध्यापक

Monday, May 30, 2011

‘फ्रेंड् टू स्पोर्ट’

पारुल अग्रवाल, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

मेरा नाम शरीफ़ है और मैं आंध्रप्रदेश का रहने वाला हूं. मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मिलकर एक ऐसी बेवसाइट की शुरुआत की है जिससे जुड़कर हज़ारों लोगों कि जान बचाई जा सकती है.

2005 में कुछ वॉलिंटियर्स की मदद से बनी वेबसाइट ‘फ्रेंड् टू स्पोर्ट’ http://www.friendstosupport.org के ज़रिए भारत भर में लोग अपने इलाके में मौजूद ब्लड डोनर्स तक पहुंच सकते हैं.

इस बेवसाइट पर रक्तदान के इच्छुक लोगों के नाम, पते, उनका ब्लड ग्रुप सभी कुछ उपल्बध होता है. देशभर में हमारे कुछ वॉलिंटीयर्स भी हैं जो लोगों को संगठित करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपने इलाके में खून उपलब्ध कराने की हर संभव कोशिश करते हैं.

यह सेवा पूरी तरह निशुल्क है और इस वेबसाइट पर कोई भी आ सकता है.

यानि कभी भी कहीं भी अगर किसी को खून की ज़रूरत पड़ जाए तो ये वेबसाइट लोगों की मदद करती है. कुछ साल पहले इस वेबसाइट से जुड़े रमेश उन 80,000 लोगों में शामिल हैं जो अब हमारी इस कोशिश का हिस्सा हैं.

रमेश बताते हैं, "1998 में मेरी एक रिश्तेदार को ल्यूकेमिया हो गया था. उन्हें हफ्ते में दो वार खून की ज़रूरत पढ़ती थी. उन दिनों मोबाइल फ़ोन नहीं थे और पेजर के सहारे हम लोगों को मैसेज भेजते थे. फिर रक्तदान करने को तैयार लोगों के फ़ोन आने का इंतज़ार करते. इसलिए मैं जानता हूं कि रक्तदान के इच्छुक लोगों की जानकारी और फोन नंबर कितनी ज़रूरी है."

सक्रिय डोनर

रमेश आज हमारे सक्रिय डोनर्स में से एक हैं, और अब तक 17 बार रक्तदान कर चुके हैं. कुछ है जो उन्हें बार-बार रक्तदान करने के लिए प्रेरित करता है.

वो कहते हैं, "मैंने पहली बार जिसे खून दिया वो एक 11 साल का लड़का था. जब मैं खून देने अस्पताल पहुंचा तो वो लोग मुझे भगवान की तरह पूजने लगे. फिर एक वह लड़की पूरी तरह स्वस्थ होकर हंसता खेलता मेरे पास आया. उसे देखकर मैं बहुत भावुक हो गया, और ठान लिया जब-जब संभव होगा मैं रक्तदान करूंगा."

इस वेबसाइट पर रक्तदान से जुड़ी सारी जानकारियां भी मौजूद हैं. बंगलौर सेहमारे एक वॉलिंटीयर रोहित बताते हैं, " हमारी कोशिश है कि वेबसाइट के ज़रिए लोगों को रक्तदान के बारे में सही जानकारी मिले और उनकी भ्रांतियां टूटें. हम लोगों को बताते हैं कि रख्तदान करना कितना सुरक्षित है, कैन लोग रख्त कर सकते हैं और एक व्यक्ति से लिया गया खून किस तरह तीन लोगों के भी काम आ सकता है."

बेस्ट बेकरी धमाका

मदद का ये जज्बा बड़ी संख्या में लोगों की जान बचा सकता है. महाराष्ट्र से हमारे एक वॉलिंटियर धीरज बताते हैं, "पुणे में बेस्ट बेकरी में हुए धमाके दौरान कई लोग घायल हुए थे. उस समय ब्लड बैंकों में खून की कमी हो गई थी. हमारे पास 80,000 से ज़्यादा डोनर्स की जानकारियां मौजूद हैं और बड़ी संख्या में घायलों के परिजनों ने हमसे संपर्क करने की कोशिश की. हमने बड़ी संख्या में रक्तदान भी किया था."

लोगों तक अपनी बात पहुंचाने और उन्हें जागरुक करने के लिए हम हम तरह-तरह के आयोजन भी करते हैं, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस बारे में जाने और उनकी मदद हो सके.

आप सभी से मेरा बस यही कहना है कि हमारी वेबसाइट ‘फ्रेंड्स टू सपोर्ट डॉट ओआरजी’ से जुड़ें और इस नेक काम में शामिल हों. याद रखें मुश्किल के समय में कोई हो न हो ‘फ्रेंड्स टू सपोर्ट’ हमेशा आपके साथ है

Thursday, May 26, 2011

गुदड़ी के लाल

स्रोत : जागरण

- मैट्रिक परीक्षा के टॉपर के गांव में जश्न का माहौल
- मां है चिंतित, गरीबी में आगे कैसे होगी पढ़ाई

मुजफ्फरपुर, एनएच -77 से सटे मीनापुर की पूर्वी सीमा पर स्थित मुकसुदपुर गांव में गुरुवार का दिन उल्लास भरा था। हो भी क्यों नहीं, वहां के गुदड़ी के लाल विशाल ने मैट्रिक परीक्षा में जिले में अव्वल आकर गांव का नाम जो रौशन किया है। सुबह से ही गांव के लोगों की जुबान पर बस विशाल का नाम था। हर किसी को उसकी काबिलियत पर गर्व हो रहा था। शाम होते-होते गांव में जश्न का माहौल शुरू हो गया। इस क्रम में एक समारोह का आयोजन कर विशाल को फूल-मालाओं से लाद दिया गया। इस दौरान उसे मिठाइयां खिलाने की होड़ मच गई।

विशाल की सफलता ने पंचायत चुनाव के परिणाम की चर्चाओं पर भी विराम लगा दिया। गांव में उपेक्षित सा रहने वाला विशाल का परिवार आज सबकी नजरों में था। आस-पास के गांवों के लोग भी उसके घर पहुंच कर शुभकामना दे रहे थे। विशाल की मां रीना देवी के लिए यह नया अनुभव था। वह कहती हैं कि विशाल ने सभी का सम्मान बढ़ाया है। अब उसके आगे की पढ़ाई की चिंता हो रही है। वह निजी बीमा कंपनी के एजेंट के रूप में प्रतिमाह एक से डेढ़ हजार रुपये कमाती है। इससे परिवार चलाना मुश्किल है। ऐसे में विशाल ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई करता रहा। विशाल अब विज्ञान विषय से आगे की पढ़ाई करना चाहता है। शारीरिक रूप से विकलांग व मजदूरी करने वाले चाचा लखीन्द्र भगत की तो खुशियों का ठिकाना ही नहीं था। कभी वह विशाल को मिठाई खिलाते तो कभी उसे चूमते। विशाल के पिता बिकाऊ प्रसाद की मौत के बाद लखीन्द्र ने ही परिवार को संभालने का दायित्व निभाया था। विशाल की सफलता ने गांव में उनकी पहचान ही बदल दी है। निवर्तमान उप मुखिया शारदानंद झा कहते हैं कि विशाल की सफलता से गांव गौरवान्वित हुआ है। उसकी मेहनत से गांव को एक नई पहचान मिली है। अन्य छात्रों के लिए यह प्रेरणा का काम करेगा। उनका कहना था कि गरीबी की मार झेल रहे प्रतिभावान विशाल की पढ़ाई के लिए प्रशासन व सरकार को भी आगे आना होगा।