Friday, September 30, 2011

रिक्शा चालक का कमाल

समाचार पत्र : दैनिक भास्कर
कलम से : अभिषेक श्रीवास्तव


उपलब्धि:- मैंगो शेक, टोमैटो सॉस, चिली सॉस और संतरा का रस भी आसानी से बनाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल एक बड़े प्रेशर कुकर के रूप में भी किया जा सकता है। इतनी सारी खूबियों वाली इस मशीन की कीमत 1,35,000 रुपये है।


पेट पालने के लिए कभी रिक्शा चलाने वाला अब निर्यातक बनने जा रहा है। एलोवेरा और आंवला की खेती और स्वयं की ओर से इजाद की गई मल्टीपरपज फूड प्रोसेसिंग मशीन के जरिए दो लाख रुपये प्रति माह कमाने वाला हरियाणा के यमुनानगर का किसान धर्मवीर जल्द ही अपनी मल्टीपरपज फूड प्रोसेसिंग मशीन का निर्यात केन्या और नाइजीरिया को करने जा रहा है।


सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीफेट) की ओर से बुधवार को आयोजित कृषि उपकरणों की प्रदर्शनी में भाग लेने आए धर्मवीर ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। धर्मवीर के मुताबिक वह दिल्ली में रिक्शा चलाता था और रोज उसकी आमदनी 300 रुपये थी।


एक्सीडेंट में घायल होने के बाद वह गांव लौटा आया और औषधीय खेती करने लगा। जिला बागवानी बोर्ड के सहयोग से वह एक बार अजमेर और पुष्कर दौरे पर गया, जहां उसने आंवला के लड्डू और एलोवेरा का जूस निकालने की विधि सीखी।


इसके बाद 2006 से धर्मवीर ने अपने खेत में एलोवेरा और आंवला की खेती शुरू की। एलोवेरा का जूस हाथ से निकालने में काफी दिक्कतों के चलते धर्मवीर को एक ऐसी मशीन बनाने की सूझी, जिसमें गूदा भी निकल आए और दूसरे काम भी आसानी से हो जाएं। इसी सोच के जरिए धर्मवीर ने इजाद कर डाली पोर्टेबल मल्टीपरपज प्रोसेसिंग मशीन।


एलोवेरा से जूस और जेल बनाने के अलावा इस मशीन से बिना गुठली तोड़े आंवला और जा मून का चूर्ण, जीरा, धनिया और गुलाब का अर्क निकाल सकते हैं। मैंगो शेक, टोमैटो सॉस, चिली सॉस और संतरा का रस भी आसानी से बनाया जा सकता है। धर्मवीर ने बताया कि इस मशीन का इस्तेमाल एक बड़े प्रेशर कुकर के रूप में भी किया जा सकता है। इतनी सारी खूबियों वाली इस मशीन की कीमत 1,35,000 रुपये है।


नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन अहमदाबाद और राष्ट्रीय बागवानी मिशन के सहयोग से धर्मवीर अब तक कुल 62 मशीनों की बिक्री कर चुके हैं और जल्द ही उनकी यह मशीन केन्या और नाइजीरिया भी जाने वाली हैं। धर्मवीर ने बताया कि दो माह पहले इन देशों के एक दल ने उनके फार्महाउस का दौरा किया था और वहीं इस मशीन को खरीदने में अपनी दिलचस्पी दिखाई थी। अभी केन्या के लिए ऐसी दो मशीनों को तैयार करने में वे लगे हुए हैं।


धर्मवीर के मुताबिक दो हॉर्स पॉवर की इस मशीन से एक घंटे में 200 किलो हर्बल प्रोडक्ट या फलों की प्रोसेसिंग की जा सकती है। धर्मवीर इस मशीन को चलाने के लिए दो दिन का प्रशिक्षण भी देते हैं। उनका दावा है कि इस मशीन को गांव की औरतें भी आसानी से चला सकती हैं और इससे अच्छा रोजगार प्राप्त कर सकती हैं।

Sunday, September 25, 2011

करिश्माई सफलता

सन् 1990 तक वे बाल काटने के पांच रुपए लेते थे और आज उनके पास 154 कारों का बेड़ा है,जिसमें 3 करोड़ 18 लाख रुपए की रोल्स रॉयस घोस्ट भी शामिल है। बेंगलुरु के रमेश बाबू अब भी रोजाना पांच घंटे अपने सैलून में बिताते हैं। हालाकि रोल्स रॉयस की खातिर लिए गए लोन के बदले हर माह 7 लाख रु. की किस्त चुकाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती।

ब्रिगेड रोड स्थित बोवरिंग इंस्टीट्यूट में सैलून चलाने वाले रमेश की ट्रैवल एजेंसी भी है,जिसके कस्टमर्स में फिल्म सितारे और कापरेरेट जगत की बड़ी हस्तियां भी शामिल हैं। रोल्स रॉयस के लिए वे एक दिन के किराए के रूप में 75 हजार रु.लेते हैं।

पिछले 25 साल से बाल काटने का अपना पुश्तैनी व्यवसाय कर रहे रमेश ने 1994 में निजी इस्तेमाल के लिए मारुति ओमनी खरीदी थी, पर बाद में उसे किराए पर देना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उनकी कारों का काफिला बढ़ता ही गया,जिसमें अब मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू के कई मॉडल और वोल्क्सवैगन जैसी महंगी कारें भी हैं। वे अगले साल करीब नौ करोड़ कीमत वाली लिमोजिन खरीदने की योजना बना रहे हैं।

इस करिश्माई सफलता के बावजूद रमेश बाबू ने विनम्रता का दामन नहीं छोड़ा है। पॉश इलाके में सैलून और सितारा ग्राहकों के बावजूद उन्होंने हेयरकट के रेट अनाप-शनाप नहीं बढ़ाए। वे कहते हैं कि जब तक हाथ चलेंगे, वे काम करते रहेंगे। रमेश जब नौ साल के थे,तब उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने जो भी हासिल किया,अपने दम पर। रमेश की कामयाबी ने कन्नड़ फिल्मों के निर्माता-निर्देशक सुरेश रेड्डी को भी आकर्षित किया है।

एस. गोपालकृष्णन

बिजनेसमैन उम्र : 56 वर्ष पढ़ाई : फिजिक्स में एमएससी और आईआईटी, चैन्नई से कंप्यूटर में डिग्री हासिल की हुनर : ईमानदारी और लगन से काम करने की प्रवृति आमदनी : 47 लाख रूपए सालाना वेतन पाते हैं

जीनियस कारोबारी एस.गोपालकृष्णन मन से भी बड़े उदार हैं। उन्होंने आईआईएम,चैन्नई को,जहां से अपनी अंतिम पढ़ाई पूरी की,बतौर दान एक बड़ी धन राशि दी।

एस.गोपालकृष्णन (क्रिस) के दादाजी टीचर थे। पिता शुरू में स्कूल क्लर्क थे,लेकिन अपने पिता के हालात देख उन्होंने नौकरी छोड़,प्लंबिंग का काम शुरू किया,जो आजीवन उनका मुख्य व्यवसाय रहा। यह काम मामूली था, पर उसने क्रिस को व्यवसाय जगत में जाने की दिशा दी। उनके मन में उद्यमी बनने की रुचि बचपन से पैदा हो गई थी, इसलिए दशकों बाद उन्होंने एनआर नारायण मूर्ति के साथ इन्फोसिस की शुरुआत की, तो उन्हें रोजगार-सुरक्षा के बारे में चिंतन की जरूरत नहीं पड़ी।

सन् 1956 में तिरुअनंतपुरम में जन्मे और पले-बढ़े क्रिस ने साइंस विषय लेकर पढ़ाई शुरू की। वे बताते हैं ‘उनके माता-पिता ने पढ़ाई के प्रति उन्हें कभी न प्रोत्साहित किया और न हतोत्साहित। हां,वे यह जरूर चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं।’

क्रिस सरकारी स्कूल में पढ़े। उन्होंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा दी, पर सीट पाने में दो नंबर कम रहे । इसके बाद आईआईएम, चैन्नई में दाखिला लिया। यहां उन्हें डर था कि अंग्रेजी कमजोर होने के कारण वे पास हो पाएंगे या नहीं। तब उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन वे आईआईएम के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में होंगे। 1977 में उन्होंने एमएससी किया व 1971 में कंप्यूटर साइंस में डिग्री ली।

1981 में एनआर नारायणमूर्ति एवं अन्य पांच लोगों के साथ मिलकर, क्रिस ने ‘इन्फोसिस टेक्नोलॉजी लिमिटेड’ की स्थापना की। शुरुआत में उनकी जिम्मेदारी डिजाइन,डेवलपमेंट,इंप्लीमेंटेशन प्रबंधन के साथ कंज्यूमर प्रोडक्ट इंडस्ट्री में ग्राहकों को दी जाने वाली सूचना व्यवस्था में मदद करना था। 1987-1994 में वे अटलांटा, अमेरिका में इन्फोसिस और केएसए के संयुक्त उपक्रम में वाइस प्रेसीडेंट रहे।

1984 में वापस आए और डीएमडी बने। 2007 में एनआर नारायणमूर्ति के रिटायर होने पर,उनकी जगह सीईओ एंड मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त हुए।

फोब्र्स द्वारा 2010 में उन्हें देश के सबसे धनी लोगों में 43वां और दुनिया में 773वां स्थाना दिया गया। वे दुनिया के 50 काबिल कारोबारी विचारकों में शामिल किए गए। 21 अगस्त, 2011 को रिटायर हुए गोपालकृष्णन अब इन्फोसिस बोर्ड के एक्जीक्यूटिव को-चेयरमैन हैं। इसके अलावा देश-दुनिया की कई संस्थाओं में अहम भूमिकाएं निभा रहे हैं,तो कइयों से बतौर मेंबर जुड़े हैं। जनवरी,2011 को उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नावाजा गया।

Thursday, September 22, 2011

गरीब (नहीं!)

योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है।

अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर पर दी है। इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्‍ताक्षर किए हैं। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नै में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता। इस हास्यास्पद परिभाषा पर हो- हल्ला मचना शुरू हो चुका है।

रिपोर्ट के मुताबिक, एक दिन में एक आदमी प्रति दिन अगर 5.50 रुपये दाल पर, 1.02 रुपये चावल-रोटी पर, 2.33 रुपये दूध, 1.55 रुपये तेल, 1.95 रुपये साग-सब्‍जी, 44 पैसे फल पर, 70 पैसे चीनी पर, 78 पैसे नमक व मसालों पर, 1.51 पैसे अन्‍य खाद्य पदार्थों पर, 3.75 पैसे ईंधन पर खर्च करे तो वह एक स्‍वस्‍थ्‍य जीवन यापन कर सकता है। साथ में एक व्‍यक्ति अगर 49.10 रुपये मासिक किराया दे तो आराम से जीवन बिता सकता है और उसे गरीब नहीं कहा जाएगा।

योजना आयोग की मानें तो हेल्थ सर्विसेज पर 39.70 रुपये प्रति महीने खर्च करके आप स्वस्थ रह सकते हैं। एजुकेशन पर 99 पैसे प्रतिदिन खर्च करते हैं तो आपको शिक्षा के संबंध में कतई गरीब नहीं माना जा सकता। यदि आप 61.30 रुपये महीनेवार, 9.6 रुपये चप्पल और 28.80 रुपये बाकी पर्सनल सामान पर खर्च कर सकते हैं तो आप आयोग की नजर में बिल्कुल भी गरीब नहीं कहे जा सकते।

आयोग ने यह डाटा बनाते समय 2010-11 के इंडस्ट्रियल वर्कर्स के कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स और तेंडुलकर कमिटी की 2004-05 की कीमतों के आधार पर खर्च का हिसाब-किताब दिखाने वाली रिपोर्ट पर गौर किया है। हालांकि, रिपोर्ट में अंत में कहा गया है कि गरीबी रेखा पर अंतिम रिपोर्ट एनएसएसओ सर्वेक्षण 2011-12 के बाद पेश की जाएगी।

Thursday, September 8, 2011

शेर

डूबने का डर जो, मुझको हो तो कैसे हो,
मै तेरा, कश्ती तेरी , साहिल तेरा दरिया तेरा