Tuesday, September 30, 2008

चढ़ावा तो ठीक, भक्तों की चिंता भी कीजिए!

हम इतने आस्थावान हैं कि तीर्थो पर मन्नत मांगने या पूरी करने जाते हैं और मौत लेकर लौटते हैं। हम इतने धार्मिक हैं कि करोड़ों का चढ़ावा एकत्र कराने वाले हमारे तीर्थ प्रबंधक हमें एक कायदे का बुनियादी ढांचा भी नहीं दे सकते जिसका इस्तेमाल कर हम सुरक्षित ढंग से अपनी आस्था पूरी कर सकें। हम इतने आधुनिक हैं कि हमारी सूचना तकनीक कंपनियां दुनिया भर के ग्राहकों को क्यू मैनेजमेंट सिस्टम, वेटिंग लाइन मैनेजमेंट सिस्टम, क्लोज सर्किट प्रणालियां, ट्रैफिक प्रबंधन तकनीकें बेचती हैं। लेकिन मंदिरों को यह सब नहीं दिखता। ..मंदिरों की सीढि़यों व रास्तों पर अक्सर बिखरने वाले शव बताते हैं कि इस घोर धार्मिक देश में आस्था जानलेवा है और उत्सव जोखिम भरे।
शायद आतंक की कार्रवाई जितनी जानें कई विस्फोटों में लेती हैं, एक मंदिर का अराजक कुप्रबंध उतनी जान एक ही बार में ले लेता है। विडंबना यह है कि बदहाली और कुप्रबंध की यह घातक अपवित्रता देश के प्राचीन और ऐतिहासिक तीर्थो में चरम पर है। इसी देश में तिरुपति, शिरडी, वैष्णो देवी, स्वर्ण मंदिर जैसे तीर्थ भी हैं जिन्होंने श्रद्धालुओं के प्रबंधन की व्यवस्था में आधुनिकता के प्रयोग कर हादसों को दूर रखा। लेकिन पुराने तीर्थो में कुछ नहीं बदला, इसलिए ज्यादातर हादसे इन्हीं तीर्थो में होते हैं।
आखिर एक तीर्थ में सबसे बड़ी चुनौती क्या है, दर्शनार्थियों का प्रबंधन ही न! इसके लिए क्या चाहिए? आधुनिक वेटिंग लाइन मैनेजमेंट सिस्टम, क्लोज सर्किट टीवी, कंप्यूटरीकृत पंजीकरण, सूचना प्रसारण पद्धति आदि से लैस प्रबंधन प्रणाली ही न। देश के संसाधन संपन्न तीर्थो के लिए यह सब करना बहुत आसान है। खासतौर पर उस स्थिति में जबकि इसी देश की दर्जनों कंपनियां ऐसी प्रणालियां बनाकर बेच रही हों और तमाम मंदिरों ने इनका इस्तेमाल भी किया हो।
तिरुपति में भी वर्षो पहले दर्शनार्थियों की लंबी कतारें मंदिर प्रबंधन के लिए बड़ा सरदर्द थीं और 22 घंटे तक लाइनें चलती रहती थीं। तिरुपति प्रबंधन ने महीनों तक तकनीकों विशेषज्ञों के साथ विचार- विमर्श के बाद इसे बदल दिया। कुछ वर्ष पहले आईआईएम अहमदाबाद ने तिरुपति में वेटिंग लाइन प्रबंधन की पड़ताल की थी। यह बताती है कि मंदिर प्रबंधन ने किस तरह बारकोड पर आधारित पंजीकरण प्रणाली शुरू की और लोगों को दर्शन के लिए समय देना प्रारंभ कर दिया। इससे मंदिर के द्वार पर औसत प्रतीक्षा समय केवल आधा घंटे रह गया। इस प्रणाली ने प्रत्यक्ष कतारें समाप्त कर दीं और कंप्यूटर पर व्यवस्था होने लगी।
लगभग इसी तरह की पद्धति वैष्णो देवी मंदिर में भी अपनाई जा रही है। सूत्र बताते हैं कि शिरडी मंदिर सहित कुछ और मंदिर भी अब इसी प्रणाली तरफ बढ़ने की तैयारी कर रहे हैं ताकि एक समय पर मंदिर प्रांगण में निर्धारित क्षमता से ज्यादा लोग न जुटें। सूत्र बताते हैं कि हैदराबाद की एक सूचना तकनीक कंपनी ने हाल में इसी तरह की प्रणाली मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर को भी दी है। इसमें फिंगर प्रिंट के जरिये पंजीकरण होता है। बारकोड आधारित पर्ची पर दर्शन का समय दिया जाता है।
इधर, पुणे के पास आलंदी में पंढरपुर के विट्ठल मंदिर का प्रबंधन व प्रशासन 240 किमी. के यात्रा मार्ग को सैटेलाइट नक्शे और सूचना तकनीक के जरिये संभाल रहा है। पंढरपुर की यह प्रणाली एक स्थान पर भीड़ का दबाव बनने से रोकती है। अब इसकी तुलना जरा उत्तर प्रदेश में गोवर्धन या चित्रकूट में कामदगिरि की परिक्रमा के इंतजामों से करिये। कितनों के लिए यह यात्रा यंत्रणा बन जाती है। इधर कुछ प्रमुख तीर्थो में गर्भ गृह के आकार बढ़ाए गए हैं। दर्शनार्थियों को प्रतीक्षा के लिए सुविधाजनक ढांचा उपलब्ध कराया गया है।
इन आधुनिक व्यवस्थाओं के उलटे देश के तमाम बड़े और पुराने तीर्थो में क्या है। खुले आसमान के नीचे, गंदे, फिसलन भरे और अतिक्रमण से अटे मार्गो या सीढि़यों पर घंटों इंतजार। दर्जनों पुजारियों की खींचतान लेकिन कोई सूचना या सहायता नहीं। सुरक्षा के नाम पर दिखावटी मेटल डिटेक्टर और कुछ सिपाही और हमेशा किसी अनहोनी का खतरा!
यह अनहोनी कल नैनादेवी में घटी थी, तो आज चामुंडा देवी में करीब 150 श्रद्धालुओं की बलि चढ़ी है। कौन जाने कल किसी दूसरे तीर्थ पर इसी तरह आस्था लेकर आए लोगों हादसे का प्रसाद मिले। वजह साफ है कि हमें पूजा करना आता है पूजा स्थलों को ठीक ढंग से चलाना नहीं।

राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे ने चामुंडा देवी मंदिर हादसे में मरने वालों के परिजनों को 2-2 लाख और घायलों को 50-50 हजार रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया है। मेहरानगढ़ किले में स्थित चामुंडा मंदिर 400 फुट की ऊंचाई पर बना है।

मंदिर में श्रद्धालु पहले नवरात्रि के मौके पर सुबह-सवेरे दर्शनों के लिए आए हुए थे। श्रद्धालुओं में महिलाएं अधिक थीं। मंदिर में भारी भीड़ थी और लोग रात से ही दर्शन के लिए लाइन में लगे हुए थे। करीब 5।30 बजे अचानक मंदिर में भगदड़ मच गई। भगदड़ के चश्मदीद जिसने अपना नाम संता बताया कहा कि अधिकारियों ने किसी वीआईपी के लिए श्रद्धालुओं को मंदिर में जाने से रोका जिसके कारण भगदड़ मच गई।

लेकिन पुलिस भगदड़ के कुछ और ही कारण बता रही है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी राजीव दसोथ ने बताया- भगदड़ उस समय शुरू हुई जब मंदिर के पास लगा बैरिकेड टूट गया और लोग इधर उधर भागने लगे।

मेरा विचार

१। मन्दिर के संस्थापक तथा न्यासी सदैव चढावे में बहुत ध्यान देते हैं

२। मन्दिर में आबादी बढ़ने के साथ समय - समय पर नई सुविधाए बढ़नी चाहिए

३। हम २१वी सदी में जा रहे हैं लेकिन हमारी तैयारियां १२वी सदी की हैं

४। कुल मिला कर फिर बरसात होगी, हम फिर कुछ नये राग सुनेगें

५। अगर हर दिन मन्दिर में १००० लोग आतें हैं और कम से कम १० रुपये भी चढाते हैं तो ये १०,००० रूपये प्रतिदिन तथा ३,००,००० महीने का होता है इसकी कुछ प्रतिशत भी अगर संस्थापक तथा न्यासी प्रबंधन तथा व्यवस्था बढ़ाने में लगायें तो उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है तथा लोगों को भी खुशी होगी

चीन की उड़ान

केमिकल मिले दूध के कारण आरोपों की बौछार झेल रहे चीनी नेताओं को अपने अंतरिक्ष यात्रियों के कारनामे से बड़ी राहत मिली होगी। इस रविवार को चीन के तीन अंतरिक्ष यात्री स्पेस से सकुशल वापस लौट आए हैं। इनमें से एक अंतरिक्ष यात्री झाई झियांग ने स्पेस वॉक भी किया।
चांद को छूने की तैयारी में भारत और जापान से होड़ ले रहे चीन के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है। इस उपलब्धि को चीन ने लंबी तकनीकी छलांग कहा है। हाल ही में ओलिंपिक का सफल आयोजन कर चुके चीन में जहां इसे लेकर उत्साह का माहौल है, वहीं दुनिया उसकी इस चहलकदमी को हैरानी से देख रही है।
चीन का स्पेस प्रोग्राम, जिसके बारे में दुनिया संभवत: बहुत कुछ नहीं जानती, बहुत तेजी से आगे बढ़ता दिख रहा है। चीन ने पांच साल पहले अंतरिक्ष में ऐसे यान भेजने की शुरुआत की थी, जिसमें यात्री सवार थे। अब चीन जल्द ही चंद्रमा पर अपना यान भेजना चाहता है, उसका अगले कुछ सालों में अंतरिक्ष में प्रयोगशाला और फिर एक बड़ा स्पेस स्टेशन बनाने का इरादा है।
ताजा कामयाबी और उसकी आगे बढ़ने की रफ्तार को देखकर इन लक्ष्यों को पाने में कोई बाधा नहीं लगती। इस पर किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए। बल्कि अंतरिक्ष में चीन की सफलता तो भारत जैसे देशों के लिए एक प्रेरणा हो सकती है, क्योंकि हम भी उसी की तरह चांद की राह में हैं। पर चीन की उपलब्धि एक नई चुनौती भी हो सकती है, खास तौर से अमेरिका के लिए। चीनी स्पेस प्रोग्राम इस क्षेत्र में अमेरिका के एकाधिकार में खलल डालता है।
चीन की योजना एक ऐसा रॉकेट बनाने की है, जो बहुत भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जा सके। अमेरिका की चिंता यह हो सकती है कि इससे उसके स्पेस मार्केट पर असर पड़ सकता है। पर इससे ज्यादा चिंता चीन के मिसाइल कार्यक्रम को लेकर है, जो अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़ा हुआ है। पिछले ही साल चीन ने एंटी सैटलाइट मिसाइल का परीक्षण किया था और उससे अपना मौसमी उपग्रह मार गिराया था। इसे स्पेस में दूसरे देशों के उपग्रहों के लिए खतरा बताया गया था।
अंतरिक्ष में चीन की बढ़ती दखल का एक अर्थ यह भी निकलता है कि इससे उसके हथियारों की मारक क्षमता में इजाफा होता है। अगर ऐसा होता है, तो साफ है कि चीन की यह ताकत इस क्षेत्र में एक नया खतरा पैदा कर रही है। चीन को चाहिए कि वह खुद को स्पेस के शांतिपूर्ण इस्तेमाल तक सीमित करे, क्योंकि इसी में सभ्यता की भलाई है।

Monday, September 29, 2008

कूड़ा कितना सोणा है


आरएन अरोड़ा के शब्दकोष में 'कूड़ा' शब्द है ही नहीं। जिन प्रयुक्त धातुओं, गत्तों व लकड़ी के टुकड़ों को लोग कूड़ेदान में डाल देते हैं, अरोड़ा साहब के घर का कोना-कोना उन्हीं वस्तुओं से ऐसे सजा है कि एक पल आपको यकीन नहीं होगा। सोलह साल पहले रेलवे के वाराणसी डीएलडब्ल्यू कारखाने से रिटायर्ड 76 वर्षीय अरोड़ा प्रबंध गुरुओं के लिए चलती-फिरती 'पाठशाला' हैं। अरोड़ा अभी तकरोही [लखनऊ] के एक स्कूल में नियमित प्रशिक्षण दे रहे हैं।
करीब चालीस वर्ष अभियांत्रिक प्रकृति की नौकरी से जुड़े रहने के कारण अरोड़ा के कूड़ा प्रबंधन माडल पर री-यूज के सिद्धांत की छाप दिखती है। उनके कुछ निष्कर्ष हैरतअंगेज हैं। मसलन, सिर्फ लखनऊ शहर के लोग शू पालिश की खाली डिब्बी व एलपीजी सिलेंडर की सील में इस्तेमाल होने वाली एल्यूमिनियम फायल इकट्ठा करना सीख लें, तो हर महीने मालगाड़ी का एक नया वैगन बनाने भर को धातु मिल सकती है। अरोड़ा कहते हैं कि यह जागृति देश भर में फैल जाए, तो धातु संबंधी करीब 40 फीसदी जरूरत री-यूज से ही पूरी की जा सकती है। शादी के निमंत्रण कार्डो से बने छोटे-छोटे डिब्बे, गिफ्ट के लिफाफे और तरह-तरह के स्टैंड अरोड़ा जी के ड्राइंगरूम व बेडरूम में दीवारों पर टंगे देखकर उनके इस तर्क को काट पाना कठिन हो जाता है कि कोई भी प्रयुक्त वस्तु कूड़ा नहीं होती।
किसी स्वार्थ या सरकारी सहायता के बगैर कूड़ा प्रबंधन में जुटे अरोड़ा अकेले धुनी नहीं हैं। पेपर मिल कालोनी में पिछले पंद्रह सालों से यह अभियान चला रहीं प्रभा चतुर्वेदी इस क्षेत्र में कार्य कर रहे व्यक्तियों व संगठनों के लिए 'रोल माडल' हैं। दक्षिण भारत के एक प्रतिष्ठित कूड़ा प्रबंधन संगठन से जुड़ीं प्रभा चतुर्वेदी का तरीका भी सीधा-सादा है। वह लोगों को सिर्फ यह सिखाती हैं कि घर में दो कूड़ादान रखें। एक में गीला कूड़ा डालें, दूसरे में सूखा। गीले कूड़ा का आशय सब्जियों-फलों के छिलकों, बची-खुची खाद्य सामग्री व पौधों के पत्तों से है, जबकि सूखे कूड़े में कांच, धातुएं, टिन के डिब्बे आदि शामिल हैं। प्रभा चतुर्वेदी कहती हैं कि गीले कूड़े को किसी गड्ढे में दबाकर बढि़या जैविक खाद बनाई जा सकती है, जिसे या तो किचन गार्डेन में इस्तेमाल किया जा सकता है, अथवा बेचा जा सकता है। अपने घर के सामने पार्क में खुद उन्होंने यह प्रयोग सफलतापूर्वक किया है। उनकी प्रेरणा से लखनऊ में करीब 60 व्यक्ति अपने मोहल्लों में इसी तरह कूड़ा प्रबंधन की अलख जगा रहे हैं।
ऐसे ही एक अन्य धुनी हैं डा. जेके जैन उन्होंने सरकारी वकील की नौकरी से बचा अपना सारा समय पर्यावरण रक्षा, खासकर कूड़ा प्रबंधन के लिए झोंक दिया। डा. जैन ने पालीथीन का इस्तेमाल घटाने के लिए 'पर्यावरणीय रुमाल' का डिजाइन तैयार किया है। पतले सूती कपड़े का यह रुमाल वास्तव में छोटा-सा झोला ही होता है, जिसके ऊपरी हिस्से को दो बटन लगाकर इस तरह बंद कर दिया जाता है कि दिन भर रुमाल के तौर पर इस्तेमाल के बाद शाम को घर लौटते वक्त बटन खोलते ही यह झोले में तब्दील हो जाता है। इसमें दो-तीन किग्रा. फल, सब्जियां या कोई भी अन्य वस्तु रखी जा सकती है। डा. जैन कई जजों व अपने वकील मित्रों को ये 'पर्यावरणीय रुमाल' भेंट कर चुके हैं। कपड़ा वह खरीदकर लाते हैं और घर पर ही उनकी वकील पत्‍‌नी डा. कुसुम जैन रुमाल सिल देती हैं। मियां-बीवी हर महीने दस-बीस रुमाल बांटते हैं। डा. जैन ने पांच सूत्री पर्यावरणीय जीवन शैली का माडल विकसित किया है, जिसमें रुमाल के अलावा पर्यावरणीय वाहन, पर्यावरणीय ध्वनि, पर्यावरणीय लेखन और पर्यावरणीय परंपराएं शामिल हैं। उनका सिद्धांत है कि पांच किमी तक यात्रा पैदल या साइकिल से की जाए, ध्वनि विस्तारक साधनों से परहेज किया जाए, यूज एंड थ्रो रिफिल के बजाय स्याही भरकर निब वाली पेन से लिखने की आदत डाली जाए तथा प्रकृति-हितकारी परंपराएं अपनाई जाएं, तो पर्यावरण प्रदूषण रहित हो जाएगा।

Sunday, September 28, 2008

2020 का ऑफिस यानी मौजां ही मौजां

नई तकनीक के साथ सबकुछ बदल रहा है। कॉर्परट ऑफिस, कड़क बॉस, टेंशन वाली मीटिंग्स सबकुछ 2020 तक बदलने वाला है।
डालते हैं इन पर एक नजर-
घर से दफ्तर का काम
आजकल हर शख्स अपने घर से काम करना पसंद करता है। कॉर्परट ऑफिस गायब हो रहे हैं। वजह है 'प्लग ऐंड प्ले' ऑफिस। इन पर लॉगइन करके कोई भी कहीं से अपनी जॉब कर सकता है। भारत में आईबीएम और प्रॉक्टर ऐंड गैंबल जैसी कंपनियां यही तकनीक अपना रही हैं। उम्मीद है, 2020 तक बॉस भी यह ध्यान देना छोड़ देंगे कि कौन कब ड्यूटी पर आ रहा है? वह घर से काम कर रहा है या ऑफिस से। हो सकता है, तब हफ्ते में चार दिन ही काम करना पड़े।
हाई-टेक ऑफिस
इंटेलिजंट फर्नीचर ऑफिस को और बेहतर व आरामदेह बना देंगे। ऐसी कुर्सियां होंगी, जो पहचान जाएंगी कि कब आप काम करते-करते थक गए हैं। ऐसे में वह आपके बॉस को सिग्नल भेजकर बता देंगी कि काम का बोझ थोड़ा कम कर दें। इंटेलिजंट दरवाजे अपने स्कैनर से आपका आईकार्ड पढ़कर आपका कंप्यूटर ऑन कर देंगे। यही नहीं, पिछली बार आप जिस पेज पर काम कर रहे थे, वही पेज खुल जाएगा। बोर्ड मीटिंगों की जगह विडियो कॉन्फ्रेंसिंग लेने लगेंगी।
जॉब्स की चौपाल
2020 तक टैलंट सर्च एजंसियों, जॉब पोर्टल्स के दिन लद जाएंगे। तब सोशल नेटवर्किन्ग साइट्स लोगों को हायर करने के सेंटर बन जाएंगी। पैसे की बचत के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी देने की जगह फ्रीलांसर्स और टेंपररी वर्कर्स को तरजीह दी जाएगी।
बॉस बनेंगे 'कूल बडी'
कंपनियों के सीईओ और कड़क बॉस तक एम्प्लॉयी की पहुंच बढ़ जाएगी। आजकल सीईओ ब्लॉग लिखने लगे हैं। इससे उनके विचारों तक सभी कर्मचारियों की पहुंच रहती है। बदले में कर्मचारी भी अपने सुझाव देकर कंपनी पॉलिसी पर असर डाल सकते हैं।
तंदरुस्ती का खास ख्याल
मुमकिन है कि कंपनियां वेलनैस प्रोग्राम सभी के लिए जरूरी बना दें। ऐसे में सभी एम्प्लॉयी को अपनी सेहत की नियमित देखभाल और जांच करनी होगी। इससे कंपनी की हेल्थकेयर कॉस्ट कम होगी। कुडि़यों का होगा जमाना
पुरुषों के बीच महिलाएं अब जगह बनाने लगी हैं। उम्मीद है, 2020 तक बहुत से पुरुष घर बैठकर बच्चों की देखभाल करना पसंद करने लगें और बीवियां ऑफिस में कामयाबी के शिखर चूमें। बहरहाल कुछ भी हो, ऐसा समय होगा बड़ा रोचक और ऑफिस में काम करना एक अलग अनुभव।

बड़े काम की चीज है कद्दू


आमतौर पर 'कद्दू' के नाम का इस्तेमाल किसी को चिढ़ाने के लिए किया जाता है। लेकिन, यह सब्जी अपने भीतर इतने औषधीय गुण समेटे है कि आप पढ़ कर हैरान रह जाएंगे।
आहार विशेषज्ञ सीमा भटनागर का कहना है कि कद्दू हृदयरोगियों के लिए बेहद लाभदायक है। यह कोलेस्ट्राल कम करता है, ठंडक पहुंचाने वाला और मूत्रवर्धक होता है। यह पेट की गड़बड़ियों में भी असरदायक है। उन्होंने बताया कि कद्दू रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है और पेंक्रियाज को सक्रिय करता है। इसी वजह से चिकित्सक मधुमेह रोगियों को कद्दू खाने की सलाह देते हैं। इसका जूस भी सेहत के लिए फायदेमंद होता है।
सीमा ने बताया कि इसे डंठल की ओर से काटकर तलवों पर रगड़ने से शरीर की गर्मी बाहर निकल जाती है। सीमा के अनुसार लंबे समय के बुखार में भी कद्दू असरकारी प्रभाव छोड़ता है। हींग और नमक डालकर पकाई गई इसकी सब्जी खाने से बुखार का आभास दूर हो जाता है। कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी रंग के कद्दू में केरोटीन की मात्रा अधिक होती है। कद्दू के बीज भी आयरन, जिंक, पोटेशियम और मैग्नीशियम के अच्छे स्रोत हैं।
ऐसा माना जाता है कि कद्दू की उत्पत्तिउत्तारी अमेरिका में हुई। यह अंटार्कटिका के अलावा सभी महाद्वीपों में पाया जाता है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने की वजह से ही 29 सितंबर को 'पंपकिन डे' के रूप में मनाया जाता है। उम्मीद है कि इस खबर को पढ़ने के बाद आपकी नजर में भी कद्दू का कद बढ़ जाएगा।

Friday, September 26, 2008

'अपने बेटे से पूछकर उसे पैदा करना'

कड़े अनुशासन के बीच बोर्डिन्ग स्कूल का बंधा-बंधा सा जीवन अक्सर यूनिवर्सिटी की खुली फिजां में जाकर थोड़ा बदल जाता है, थोड़ा आजाद और उन्मुक्त हो जाता है। जब आप स्कूल के बाद यूनिवर्सिटी में कदम रखते हैं, तो आप के ऊपर से माता-पिता का नियंत्रण भी तकरीबन ख़त्म हो जाता है। हां, जवाबदेही और जिम्मेदारी तब भी होती है, लेकिन उतनी नहीं, जितनी स्कूल के दिनों में।
स्कूल की तुलना में यूनिवर्सिटी-कॉलिज का कैंपस समाज के अलग-अलग तबकों से आए छात्रों से गुलजार रहता है। चर्चा और वाद-विवाद यूनिवर्सिटी में पढ़ने वालों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा हो जाता है। देश की हालत, राजनीति, समाज, नैतिकता और अस्तित्वाद-यानी वह सभी मुद्दे जिनपर आप दिमागी कसरत कर सकते हैं, आप बात करते हैं, आप बहस करते हैं। इसके साथ-साथ यूनिवर्सिटी के दिनों में भविष्य को लेकर भी एक कशमकश के बीच आप पर दबाव रहता है। आपके आस-पास का समाज आप पर न सिर्फ खुद को काबिल बनाकर पैरों पर खड़ा होने का दबाव बनाता है, बल्कि समाज आप से उम्मीद करता है कि आप अपने परिवार को भी संभालेंगे। ऐसे ही वक़्त पर आप को निराशा घेर लेती है।
आज के आर्थिक नज़रिए से मजबूत भारत के युवाओं के पास जितने अवसर और उम्मीदें हैं, वह 50 और 60 के दशक में युवाओं के पास नहीं थे। ग्रैजुएशन के बाद क्या ? कौन-सी नौकरी ? कब, कहां, कैसे ? और ऐसे माहौल में आदर्शवाद की बातें, बहस-मुबाहिसे के दौर और कॉफी हाउस में लगने वाले जमघट सब बेमानी लगने लगते हैं और उम्मीद गुस्से में तब्दील हो जाती है। अब क्या करें, जब इस सवाल का कोई जवाब नहीं खुद को नहीं सूझता, तो गुस्सा आता है। आप इस उधेड़बुन, इस उलझन को सुलझाने के लिए जवाब तलाशते हैं। ऐसे में आप उन लोगों के पास जाते हैं, जिनके पास आपके हिसाब से इन पेचीदा सवालों के जवाब हो सकते हैं। और आप अपने जैसे ही किसी शख्स से ऐसे मुश्किल सवालों के जवाब पा भी जाते हैं। आप दुनिया में क्यों आए ? सिर्फ झेलने के लिए। हां, बस इसीलिए। हमें पैदा ही नहीं होना चाहिए था। फैसला सुना दिया जाता है। गुस्सा, निराशा और अतार्किक बातों से दिमाग घिर जाता है।
ऐसी ही निराशा और अवसाद भरी एक शाम को मैं पिता जी के कमरे में दाखिल हुआ और ज़िंदगी में पहली बार भावुक होकर रूंधे गले से चिल्लाया, 'आपने हमें पैदा क्यों किया ?' यह सुनकर हमेशा की तरह कुछ लिखने में तल्लीन मेरे पिता ने मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। फिर, कुछ सोचने लगे। कोई नहीं बोला। न मैं, न वे और न कोई आवाज़। हां, उनकी मेज पर रखी घड़ी की टिकटिक और मेरी तेज चलती सांसों की आवाज़ जरूर थी वहां पर। काफी देर तक मौन खड़े रहने के बाद जब कोई जवाब नहीं आया तो मैं कमरे से बाहर चला गया। उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया।
अगली सुबह पिता जी मेरे कमरे में आए। मुझे जगाकर एक पेज थमाकर वापस चले गए। मैंने उसे खोला और उसे पढ़ा। उस पन्ने पर एक कविता लिखी थी, जो उन्होंने उसी रात लिखी थी।
कविता का शीर्षक था - ' नई लीक '
ज़िंदगी और ज़माने की कशमकश से घबराकर मुझसे मेरे लड़के पूछते हैं कि आप ने हमें पैदा क्यों किया ?
और मेरे पास इसके सिवा कोई जवाब नहीं है कि मेरे बाप ने भी मुझसे बिना पूछे मुझे पैदा किया था।
मेरे पिता से बिना पूछे उनके पिता ने उन्हें पैदा किया था।
और मेरे बाबा से बिना पूछे उनके पिता जी ने उन्हें...ज़िंदगी और ज़माने की कशमकश पहले भी थी और अब भी है। शायद ज़्यादा।
आगे भी होगी, शायद और ज़्यादा। तुम नई लीक धरना।
अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना।

प्रतीक्षा, यानी मुंबई में हमारे निवास पर लंबी बीमारी से जूझते हुए बेहद कमजोर हो चुके पिता जी अपने बिस्तर पर लेटे हुए कहते हैं - जीवन में कोई बहाना नहीं होता। आप किसी पर इल्जाम नहीं लगा सकते। हर सुबह अपने साथ एक नई चुनौती लेकर आती है। या तो आप मुश्किलों से लड़ना सीखकर उनसे पार पाते हैं या फिर उनके सामने झुक जाते हैं। जब तक जीवन है, संघर्ष जारी रहेगा। प्रतीक्षा में ठीक उसी जगह, जहां पिता जी ने आखिरी सांसे लीं, उनकी आदमकद तस्वीर लगी है। मैं रोज उस तस्वीर को फूल-माला से सजाता हूं। तस्वीर के ठीक नीचे एक दीया जलता रहता है। कुछ महीने पहले उस तस्वीर के बगल में मां की भी तस्वीर लग गई है। मैं जब भी उस कमरे से गुजरता हूं या बेडरूम जाते या वहां से निकलते हुए सीढ़ियों से चढ़ता-उतरता हूं तो थोड़ा ठहरकर दोनों की तस्वीरों को देखता हूं। उनसे शक्ति मांगता हूं। उनके ज्ञान की रोशनी के सहारे ही मैं ज़िंदगी की जद्दोजहद के लिए रोज बाहर निकलता हूं।

मेरा विचार
१। मेरा सभी ब्लागर्स से अनुरोध है कि वो भी अपने जीवन के पलों को साझा करें
२। ये साझा विचार बहुत से लोगों के अनुउत्तिरत सवालों का हल ढूढने ने मदद करेंगें

Wednesday, September 24, 2008

समाज को रास्ता दिखाने की ठानी बुजुर्गों ने


रिटायर्ड होने के बाद समय को कैसे समाज के लिए लगाया जाए। इस बात को जानना है तो आपको हिसार के सेक्टर 13 में आना होगा। यहां सरकारी सेवाओं से रिटायर्ड हुए बुजुर्गों ने एक ऐसी समिति का गठन किया है जोकि युवाओं के लिए भी एक आदर्श बनी हुई है।
समिति के सभी सदस्य लोगों के झगड़े-फसाद व उलझी हुई समस्याओं को निपटाते हैं। समिति में है सत्तर लोगों का समूह। सभी उम्र-दराज और जिंदगी के कार्यकलापों के अनुभवी हैं। इनमें कोई रिटायर्ड एसपी है तो कोई एसडीओ। रिटायर्ड मास्टर, कर्नल, बुजुर्ग किसान सभी वर्र्गो व जातियों के ये लोग नित्य प्रति इकट्ठे होते हैं हिसार के सेक्टर 13 स्थित पब्लिक हेल्थ कालोनी परिसर में। बुजुर्र्गो की इस टोली को कालोनीवासियों ने नाम दिया है शिकायत निवारण समिति।
प्रारंभ में इस समिति के सदस्यों में सिर्फ सेक्टर 13 के कुछ बुजुर्ग ही सदस्य थे। लेकिन बाद में अर्बन एस्टेट, माडल टाउन, सेक्टर 16 व 17, डीसी कालोनी व पीएलए के बुजुर्ग भी इसके सदस्य बन गए। समिति की हर रोज सुबह सात बजे से रात के ग्यारह बारह बजे तक बैठक चलती है। इस लंबी बैठक में समिति का कोई सदस्य दो घंटे लगाता है तो कोई पांच।
प्रत्येक सदस्य अपनी स्वेच्छा से आते-जाते रहते हैं। प्रत्येक दिन की बैठक की शुरुआत समिति को मिलने वाली किसी समस्या व झगड़े की शिकायत को निपटाने के लिए शुरु होती है। इन समस्याओं में गृहस्वामी-किराएदार का झगड़ा, पारिवारिक कलह, लेन-देन विवाद से लेकर पुलिस व कोर्ट कचहरी तक पहुंचने वाले मामलों का सहजता से निपटान हो जाता है।
समिति अध्यक्ष भरत सिंह बामल कहते हैं कि दो वर्र्षो में समिति ने इतने मामले निपटाएं है जिन्हें अब गिन पाना मुश्किल है। लेकिन समिति के सदस्य पूर्व सरपंच महताब सिंह व जगबीर गुराना निपटाए गए कुछ बड़े मामले बताते हैं। उन्होंने बताया कि कुछ माह पूर्व नारनौंद क्षेत्र की एक लड़की की बारात आने के वक्त दहेज की मांगते हुए बारात लाने से इंकार कर दिया।
लड़की के पिता धर्मबीर ने मदद के लिए समिति के पास गुहार लगाई। मामले की गंभीरता को देखते हुए समिति के सभी सदस्य सक्रिय हो गए। समिति के सदस्य के परिचित व योग्य युवक अनूप को शादी के लिए मनाया गया। उसी दिन धर्मबीर के घर बारात पहुंची और समिति के सभी सदस्यों ने न केवल बतौर बाराती शादी में शिरकत की बल्कि सभी ने लड़के की शादी के खर्च को भी मिलजुल कर वहन किया।समिति के सदस्य रिटायर्ड एसडीओ महेंद्र सिंह कुंडू, रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर बलबीर सिंह ढांडी व मास्टर बलदेव सिंह बताते हैं कि डीसी कालोनी निवासी मेवा ंिसंह डाटा की जमीन को खरीदने की आड़ लेकर किसी व्यक्ति ने धोखे से हथिया लिया था। पैसे मांगने पर उक्त व्यक्ति ने मेवा सिंह को ठिकाने लगाने तक की धमकी दे डाली। परेशान मेवा सिंह ने यह मामला समिति के समक्ष लाया।
समिति के दबाव के चलते मेवा सिंह को उसकी जमीन की पूरी पेमेंट मिल गई। इसी प्रकार समिति कार्यालय के निकट रहने वाले पब्लिक हेल्थ के सेवादार बनवारी लाल का कुछ गुंडों ने अपहरण करने का प्रयास किया। शोर-शराबा सुनते ही कार्यालय में बैठे दर्जनों बुजुर्ग मौके पर पहुंच गए और गुंडों से भिड़ गए।
छह मे से तीन गुंडे अपने वाहन पर सवार होकर मौके से भाग गए जबकि तीन गुंडे बुजुर्र्गो के हत्थे चढ़ गए। सभी गुंडों की मरम्मत करके उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया। सेवादार बनवारी लाल का ही नहीं कालोनी का हर परिवार समिति सदस्यों के इस उपकार का बखान करता है। इस प्रकार सैकड़ों ऐसे छोटे बड़े मामले हैं जिन्हें बुजुर्र्गो की इस संसद ने सहजता से निपटाकर लोगों को राहत पहुंचाई है। इन बुजुर्र्गो ने खाली पड़ी सरकारी जमीन पर करीब एक हजार पौधे लगाकर कालोनी को हरा-भरा कर दिया है जोएक मिसाल है।

महिलाओं को फौज में स्थायी कमिशन की सिफारिश


सेना के तीनों प्रमुखों की समिति ने महिलाओं को फौज में स्थायी कमिशन देने की सिफारिश रक्षा मंत्री ए के एंटनी को भेज दी है और यह ऐतिहासिक फैसला एक सप्ताह के भीतर होने की सम्भावना है।
सैन्य प्रमुखों की समिति ने सशस्त्र बलों में शिक्षा और न्यायिक शाखा में महिलाओं को पुरूषों की तरह स्थायी कमिशन देने की सिफारिश की है, लेकिन उन्हें लड़ाकू भूमिका में नहीं रखा जाएगा। रक्षा मंत्रालय के एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने पुष्टि की कि सैन्य समिति ने अपनी सिफारिश रक्षा मंत्री को भेज दी है और यह फैसला बहुत जल्दी ले लिया जाएगा। अधिकारी ने संकेत दिया कि एंटनी इस फैसले पर अपनी मुहर एक सप्ताह के भीतर लगा देंगे। अभी तक महिलाओं को सशस्त्र सेनाओं में अस्थायी तौर पर ही लिया जाता है और उनकी नौकरी 15 साल से कम होती है। महिला अधिकारियों को लेफ्टीनेंट कर्नल रैंक से उपर का दर्जा नहीं मिल पाता।
इस समय सशस्त्र बलों में 1899 महिलाएं हैं। इनमें 1014 महिला अधिकारी सेना में 739 वायु सेना में और 236 महिलाएं नौसेना में हैं। रक्षा सूत्रों ने कहा कि महिलाओं को स्थायी कमिशन देने के मुद्दे को कैबिनेट के पास ले जाने की आवश्यकता नहीं है और रक्षा मंत्री के स्तर पर यह फैसला ले लिया जाएगा जो एक साल से इस मुद्दे को आगे बढाते आ रहे हैं। वह संसद को वचन दे चुके हैं कि इस मामले पर सक्रियता से विचार किया जा रहा है और लड़ाई के मोर्चे के अलावा उन्हें स्थायी कमिशन दिया जाएगा।
इस फैसले के बाद राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी जैसे संस्थानों के द्वार भी महिलाओं के लिए खुल जाएंगे। लेकिन सूत्रों ने कहा कि इस निर्णय से मौजूदा शार्ट सर्विस कमिशन प्राप्त महिला अधिकारियों को लाभ नहीं होगा क्योंकि इससे अनेक तरह की जटिलताएं पैदा होने की सम्भावना है। महिलाओं को स्थायी कमिशन के जरिए परिवहन विमान और हेलीकाप्टर तक के पायलट के तौर पर सैन्य बलों में नौकरी मिलती रही
है। इसके अलावा मेडिकल, डेंटल और नर्सिग में उन्हें स्थायी कमिशन
मिलता रहा है। पुरूष वर्चस्व की मानसिकता के कारण महिलाओं को स्थायी कमिशन देने की यह सिफारिश काफी नानुकर के बाद शीर्ष तक पहुंची है। अलबत्ता अब भी ऐसे सैन्य अधिकारियों की कमी नहीं है जिनके गले महिलाओं को स्थायी कमिशन देने का निर्णय उतर नहीं पा रहा है।

Tuesday, September 23, 2008

सीईओ की हत्या मैनेजमेंट के लिए चेतावनी: श्रम मंत्री

ग्रेटर नोएडा में इतालवी कंपनी ग्रेजियानो ट्रांसमिशियोनी के सीईओ एल. के. चौधरी की हत्या की उद्योग जगत ने भले ही निंदा की हो लेकिन सरकार का मानना है कि यह श्रमिकों में बढ़ते असंतोष का नतीजा है। केंद्रीय श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नांडिस ने मंगलवार को कहा, ' इस घटना को कंपनियों के प्रबंधनों को चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। ' उन्होंने कहा कि मैं कंपनियों के प्रबंधन से अपील करता हूं कि कर्मचारियों के मामले में संवेदनशीलता से सोचें। ऑस्कर फर्नांडिस ने कहा, ' स्थायी कर्मचारियों और ठेके के कर्मचारियों के वेतन में भारी अंतर होता है। कर्मचारियों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे ग्रेटर नोएडा जैसी घटना फिर से घटे। ' उन्होंने कहा, ' यह सही है कि संगठित श्रमिकों की संख्या घट रही है। सात प्रतिशत से घटकर यह अब छह प्रतिशत हो गई है। लेबर कांग्रेस में हम ' हायर ऐंड फायर पॉलिसी ' पर चर्चा करेंगे। पहले हम पीएसयू में इस समस्या को सुलझाएंगे और इसके बाद निजी क्षेत्र का रुख करेंगे। '

युवी निकले अब गांधीगीरी करने


अगर आप सोचते हैं कि देश के क्रिकेटर जीवन की सभी सुविधाओं का उपभोग करने में ही लगे रहते हैं, तो आप गलत हैं। डीएलएफ सिटी के पास अवैध रूप से फेंके जा रहे कूड़े-कचरे के खिलाफ लोगों द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में भारतीय क्रिकेट टीम के सितारे युवराज सिंह ने भाग लिया।

गौरतलब है कि युवी डीएलएफ सिटी के एफ ब्लॉक में रहते हैं। गुड़गांव-फरीदाबाद मार्ग पर फेंके जा रहे कूड़े-कचरे के खिलाफ यहां के निवासी लंबे समय से विरोध कर रहे थे। युवी के इस मुहिम में शामिल होने से लोगों का उत्साह बढ़ा है। इससे पहले भी इस तरह का प्रदर्शन अगस्त महीने में आयोजित किया गया था।

325 टन कचरा प्रतिदिन :

गुड़गांव म्युनिसिपल कॉरपोरेशन, हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट एथॉरिटी और कई निजी डेवलपर्स की ओर से इस स्थान पर प्रतिदिन लगभग 325 टन कूड़ा (100 ट्रक) फेंका जाता है। यह सिलसिला पिछले दो वर्षे से जारी है।

प्रशासन को देना चाहिए ध्यान :

डीएलएफ सिटी की सफाई अभियान से जुड़े युवराज सिंह ने कहा कि यहां रहने वाली बड़ी आबादी की मांग पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। युवी ने अवैध रूप से कूड़ा-करकट फेंकने की कार्रवाई पर तुरंत रोक लगाने की भी मांग की।

बढ़ेगा खेल के प्रति रुझान :

युवराज ने उम्मीद जाहिर की है कि सड़कों और शहर के साफ-सुथरे होने पर युवाओं का खेलों के प्रति रुझान बढ़ेगा तथा जागिंग और साइकिलिंग को बढ़ावा मिलेगा।

60 एकड़ में फैला है कूड़ा :

डीएलएफ सिटी के पॉश फेज -1 इलाके के पास ही वन विभाग की संरक्षित जमीन पर लगभग 60 एकड़ में चारों तरफ कूड़ा कचरा फैला हुआ है।

डेंगू और सांस की बीमारियां :

स्थानीय निवासियों के अनुसार गंदगी की वजह से यहां डेंगू और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। इस बीच हुडा प्रशासन ने लोगों की शिकायतों पर ध्यान देने का आश्वासन दिया है। हुडा इस समस्या से निपटने को एक हाईटेक कूड़ा-कचरा प्रबंधन तकनीक को अगले वर्ष शुरू करने पर विचार कर रही है
मेरा विचार
१। हम सभी को अपने घर के अन्दर और बाहर सफाई रखनी चाहिए
२। विचार १ पुरुषों के लिए भी है :D ।
३। अच्छी सफाई व्यवस्था से आपको स्वास्थ्य लाभ होगा
४। आपके और पडोस के सभी आयु वर्ग के चिंटू और मिंटू भी स्वस्थ रहेगें ।
५। आप नई - नई कूड़ा-कचरा प्रबंधन तकनीक के बारें में सोचिये ।
६। आप समान विचार धारा वाले लोगों का समूह बनाइये और योजना को अंजाम दीजिए
७। जगह - जगह फलदार, फूलदार और छाया वाले पेड़ पौधे लगाइए
८। आपके पास अगर फोटो कैमरा है तो सुंदर बाग़ बगीचों के फोटो खीच कर उनका अध्ययन कीजिए कि ऐसी हरियाली आप अपने घर के पास कैसे ला सकतें हैं
९। आप अपने शहर के जिला अधिकारी से भी सरकारी हरित योज़नाओं की जानकारी लें ।
१०। आजकल सरकार के पास इन योज़नाओ का काफी फंड होता है जो अंत में खर्च न होने के कारन उनको अपने जेब में डालना पड़ता है ;) मज़बूरी में ।

Monday, September 22, 2008

मुसीबत नहीं, मुनाफे की बाढ़

यमुना की बाढ़ दिल्ली के लिए मुसीबत बनने की बजाय मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है। गुजरात और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों का सबक दिल्ली के लिए फायदेमंद हो सकता है। दिल्ली के चारों ओर एक नहर बनाकर बाढ़ के पानी को रीचार्ज किया जाए तो राजधानी की धरती पानी से मालामाल हो जाएगी। दो-तीन साल में ही दिल्ली का गिरता भूजल स्तर सामान्य स्थिति पर पहुंच जाएगा, इससे जमीन के पानी का खारापन भी दूर हो जाएगा। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड के चेयरमैन रह चुके डॉ. डी. के चड्ढा ने इस बारे में प्रस्ताव तैयार किया है जो इस वक्त बोर्ड के पास है। उन्हीं के प्रस्ताव पर उत्तरी गुजरात के सात जिलों में पानी रीचार्ज का यह सिस्टम अमल पर लाया गया और पानी का स्तर सुधर गया। दिल्ली के लिए बने प्लान के मुताबिक पल्ला से लेकर अशोक विहार, रोहिणी, मंगोलपुरी, द्वारका, वसंत कुंज होते हुए ओखला तक नहर ले जाई जाए। ओखला के करीब नहर को यमुना में जोड़ दिया जाए। नहर में जगह-जगह करीब 100 इंजेक्शन वेल बनाए जाएं। इन इंजेक्शन वेल के जरिए पानी जमीन के अंदर छोड़ा जाएगा। राजधानी में जमीनी पानी 20 मीटर से लेकर 50 मीटर की गहराई पर मिलता है। इसलिए अलग-अलग जगह के मुताबिक इनकी गहराई तय की जाएगी। अभी यमुना में 4 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। अगर नहर बनी होती तो आज यह पानी दिल्ली के लिए बेहद मुनाफे का सौदा साबित होता। उत्तरी गुजरात में जमीनी का पानी बेहद दोहन होने के कारण भूजल स्तर काफी नीचे चला गया था। गुजरात में तैयार की गई यह नहर अलग-अलग जिलों से गुजरने के कारण हर जिले की जमीन की अलग तरह की है, इसलिए यहां यह योजना को लागू करने में काफी परेशानी सामने आई, लेकिन दिल्ली में तो केवल दो ही तरह की जमीन है, एक सामान्य जमीन व एक चट्टानी, यहां तो आसानी से नहर बनाकर बाढ़ के पानी को रीचार्ज किया जा सकता है। गुजरात में तो नहर के जरिए जमीनी पानी काफी रीचार्ज हुआ है, दिल्ली में अगर इंजेक्शन वेल लगा दी जाएं तो जमीनी पानी तेजी के साथ रीचार्ज होगा। इसी तकनीक को महाराष्ट्र में भी अपनाया जा रहा है।

Krtek - Mole - छछूंदर






चलिए आज आपको एक पुराने एनीमेशन कैरेक्टर के बारे मैं बताता हूँ इसको मैंने आज इन्टरनेट पर सर्फ़ करने पर पाया बड़ा ही मनोरंजक पात्र है इसका नाम है Krtek इंग्लिश में इसका नाम है Mole और हिन्दी में छछूंदर :) मैं एनीमेशन कैरेक्टरस को काफी पसंद करता हूँ एनीमेशन फिल्मों में कहानीकार अपनी बात एनीमेशन कैरेक्टरस के ज़रिये रखता है ये तो हुई मेरी फिलोसोफी मैं Krtek पर दुवारा लोटता हूँ Krtek का जन्म चेक कहानीकार Zdeněk Miler ने किया आप http://www.youtube.com/ पर Krtek को सर्च कर सकतें हैं



कुछ एनीमेशन Krtek छोटी फिल्में



१। http://www.youtube.com/watch?v=hsfBsojVBmw&NR=1



२। http://www.youtube.com/watch?v=hnc85K5JoBk&NR=1



३। http://www.youtube.com/watch?v=AnBwjIpIS2o&feature=related



४। http://www.youtube.com/watch?v=CgM2wk6qzmk&feature=related


मोबाइल से मुनाफा कमाते कलाकार

कला के कद्रदान तो दुनिया में बहुत सारे लोग हैं लेकि न कला अमीरों की एक पहचान बन चुकी है।
किसी सामान्य आदमी के लिए कलात्मक चीजों को खरीदना आसान नहीं है और हर शहर में कला प्रदर्शनी के लिए कोई जगह भी नहीं होती। आप कल्पना करें कि अगर आपको कला की भूख मिटाने के लिए कलादीर्घा में नहीं जाना पड़े और वहां लाखों में बिकने वाली पेंटिंग आपको केवल 10 रुपये खर्च करने पर ही मिल जाए तो यह कैसा अनुभव होगा?हालांकि इसमें सिर्फ यही अंतर है कि 10 रुपये खर्च करके आप बेहतरीन पेंटिंग से अपने मोबाइल को खूबसूरत बना सकते हैं जबकि कलादीर्घा से लाई हुई लाखों की पेंटिंग से आप अपने घर को सजा सकते हैं। जी हां अब आप किसी फोटोग्राफर की ली हुई तस्वीर को अपने मोबाइल पर वैल्यू एडेड सर्विस प्लेयर(वीएएस) के जरिए डाउनलोड कर सकते हैं।आकाश दास पेशे से फोटोग्राफर हैं और उन्होंने 100 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता है। हाल ही में उन्होंने अपनी फोटोग्राफी एक्जीबिशन लगाई है, 'एशियन न्यूड्स इन दी जंगल' और 'एशियन न्यूड्स इन दी अरबन जंगल'। एक्जीबिशन की इन तस्वीरों को मोबाइल हैंडसेट पर अपलोड किया जा सकता है। दास ने हैंडिगो के साथ एक गठजोड़ किया है जो उनकी तस्वीरों को टेलीकॉम सर्विस मुहैया कराने वाली कंपनियों के जरिए मोबाइल पर वितरण का काम करेगी। दास का कहना है, 'मेरे मन में ऐसा विचार इसलिए आया क्योंकि मुझे लगा कि मैं मोबाइल के जरिए कला प्रेमियों तक अपनी कला को पहुंचा सकता हूं।' अपनी कला प्रदर्शनी के पहले भाग 'एशियन न्यूड्स इन दी जंगल' के बारे में दास का कहना है कि इसमें कॉर्बेट नेशनल पार्क और बांधवगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के जंगली जानवरों खासतौर पर शेर और हाथियों पर काम किया गया है। दूसरे भाग 'एशियन न्यूड्स इन दी अरबन जंगल' में उन्होंने नारी सौंदर्य को अपने रचनात्मक काम के जरिए पेश किया है।'आर्ट ऑन मोबाइल' के इस कॉन्सेप्ट से कलाकारों के लिए नए मौके तैयार होंगे और यह बिजनेस के लिहाज से भी खास है। वीएएस प्लेयर से डाउनलोड के जरिए होने वाली कमाई में दास का भी हिस्सा होगा। कंपनी ने हैंडिगो सर्वर पर तस्वीरों को दो दिन उपलब्ध कराया जिससे 50,000 बार तस्वीरों को डाउनलोड किया गया। एक बार एक तस्वीर को डाउनलोड करने में 10 रुपये लग जाते हैं।वैल्यू एडेड सर्विसेज ने दुनिया में कई संभावनाओं को विस्तार दिया है। सेल्यूलर इंडस्ट्री अपने ग्राहकों को लुभाने के तमाम विकल्पों पर काम कर रहे हैं। हैंडिगो के संस्थापक और सीईओ प्रवीण राजपाल का कहना है, 'बेहतर क्वालिटी वाले नोकिया, एचटीसी, सैमसंग और आईफोन ने बड़े स्क्रीन, बेहतर डिसप्ले और अच्छे म्यूजिक सिस्टम जैसी तमाम सुविधाएं मिल रही हैं। इस तरह की पहल दरअसल वीएएस के जरिए कलात्मकता को बेहतर आयाम देना है।' देश में लगभग 29.6 करोड़ सेल्यूलर उपभोक्ता हैं जिसमें हर महीने औसतन 80 लाख उपभोक्ता और जुड़ जाते हैं। इसी वजह से निश्चित तौर पर मोबाइल लोगों तक अपनी पहुंच बनाने का बेहतर साधन है। अनुमान ऐसा है कि इस साल वीएएस सुविधा से लैस मोबाइल का मार्केट लगभग साढ़े पांच से छह हजार करोड़ है।

कंपनी के सीईओ को बर्खास्त कर्मचारियों ने मार डाला

एक कंपनी के सीईओ को उनके ही बर्खास्त कर्मचारियों ने पीट-पीटकर मार डाला है। इन कर्मचारियों को मैनेजमंट ने बातचीत के लिए बुलाया था। बातचीत सफल नहीं हो सकी और मीटिंग बिना किसी फैसले के खत्म हो गई। उसके बाद कंपनी के आंगन में ही झगड़ा हो गया। इसी दौरान हुई मारपीट में सीईओ एल। के. चौधरी की मौत हो गई। नोएडा के एसएसपी आर. के. चतुर्वेदी ने बताया कि ग्रैडियानो कंपनी के सीईओ एल. के. चौधरी को उनके कर्मचारियों ने पीट-पीटकर मार डाला। झगड़ा होने पर सिक्यूरिटी गार्ड ने हवा में फायर भी किए। इस झगड़े में कुल 20 लोग घायल हुए। चौधरी को फौरन अस्पताल ले जाया गया , लेकिन वहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। जब यह घटना घटी , तब कंपनी के आंगन में करीब 200 पूर्व कर्मचारी थे। उन्हें दो महीने पहले बर्खास्त किया गया था और तब से वे प्रदर्शन कर रहे थे।
मेरा गणित
१। सीईओ को सदैव अपने बोनस या कंपनी के बारे में नहीं सोचना चाहिए
२। लोकतंत्र में सीईओ सामंतवादी नहीं होना चाहिए
३ कर्मचारी वर्ग को नौकरी निष्कासन को जीवन का अंत नहीं मानना चाहिए
४। सीईओ को कर्मचारी वर्ग को अपने परिवार का हिस्सा मानना चाहिए
५। कर्मचारी वर्ग को नौकरी निष्कासन पर उस कंपनी में आवेदन करना चाहिए जहाँ उनके योग्यताओं की माँग है

Sunday, September 21, 2008

जब पूरा गांव ही बन गया भगीरथ



सामूहिक प्रयास कैसे बियाबान में फूल खिला सकते हैं, यह देखना है तो आपको एक बार कन्नौज के उदैतापुर गांव जाना पड़ेगा। राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लाए, तो उनका प्रयास मुहावरा बन गया। अब पूरे गांव ने मिलकर पानी का संकट दूर किया, टंकी खड़ी की और घरों तक पाइपलाइन डाल दी। वह भी सरकार से एक पैसा लिये बिना।
छोटा-सा यह गांव उन लोगों को रोशनी दिखाता है, जो खुद कुछ करने के बजाय भगवान या सरकार भरोसे बैठे रहते हैं। उदैतापुर का भगीरथ प्रयास साबित करता है कि लोग चाह लें, तो सरकारी मदद के बिना भी गांव चमकने लगेंगे। अंधाधुंध जल-दोहन के चलते उदैतापुर एक दशक पहले प्यास से बेहाल था। जलस्तर गिरने से कुएं सूखने लगे थे और हैंडपंप बालू उगल रहे थे। मर्द, औरतें खेत-खलिहान छोड़कर बचे कुओं पर बाल्टी लेकर अपनी बारी का इंतजार करते। इन हालात में उदैतापुर ने अफसरों से गुहार लगायी, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। एक हैंडपंप लगाने में 20-25 हजार रुपये का खर्च बताया गया, लेकिन सभी परिवार यह खर्च बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे। ग्राम पंचायत ज्यादा से ज्यादा तीन-चार हैंडपंप लगा सकती थी।
उम्मीद की डोर टूटने लगी थी, लेकिन कुछ लोगों ने हार नहीं मानी। पानी के इंतजाम में दिन खपाने के बाद रात को चौपाल लगाकर उपाय खोजे जाते। ऐसे लोगों में ग्राम प्रधान रत्नेश दुबे भी थीं। उन्होंने लोगों से श्रमदान के लिए अनुरोध किया। उनके साथ खड़े थे पति गिरीश दुबे। लोग पहले झिझके, लेकिन फिर तैयार हो गए। देखते-देखते गांव में दस हजार लीटर क्षमता की पानी की टंकी बन गई, सबमर्सिबल पंप की बोरिंग भी हो गई। इसके बाद लक्ष्य था घरों तक पानी पहुंचाने का। कमल किशोर दुबे, श्याम किशोर, छुन्नीलाल सविता, शिवकुमार, सरीफुद्दीन, अवधेश कुमार दुबे, सुरेंद्र सहित गांव के 30 परिवार आगे बढ़े। पैसा जमा हुआ और फिर घरों तक पाइप लाइन बिछाकर पानी की आपूर्ति शुरू करने में देर नहीं लगी। जो परिवार पाइप लाइन का खर्च नहीं उठा सकते थे, उनके लिए गांव के कुछ स्थानों पर सार्वजनिक नल लगाकर पानी का इंतजाम किया गया। टंकी की देखरेख, साफ-सफाई जैसे काम आज भी गांव वाले मिल जुल कर करते हैं। सामूहिक सहयोग की यह यात्रा आठ बरस पूरे कर चुकी है। सुबह-शाम सबमर्सिबल पंप चलाकर टंकी को भरा जाता है और 24 घंटे आपूर्ति जारी रहती है।

लंदन में टिम, जौनपुर में टिम बाबा

दो एकड़ में बन रहे भगवान लक्ष्मी नारायण के विशाल मंदिर का परिसर, चारों तरफ मंदिर निर्माण की हलचल। केंद्र में है धाराप्रवाह हिंदी बोलता एक अंग्रेज। ईसाई धर्म छोड़ कर हिंदू हो चुका यह अंग्रेज मंदिर निर्माण का अगुआ है। उसके जीवन का लक्ष्य न केवल यहमंदिर है, बल्कि आयुर्वेदिक अस्पताल और लड़कियों का कालेज बनाना भी है। ग्रामीण उसके सहयोगी हैं।
एक ओर तो उड़ीसा और कर्नाटक से हिंदू-ईसाई संघर्ष की खबरें आ रही हैं, धर्मातरण चर्चा में है और दूसरी तरफ टिम जैसे लोग भी हैं, जो अठारह देशों में भटकने के बाद अब भारत में हैं, भारतीय संस्कारों में रमे हैं और जिनकी वेशभूषा या भाषा उनके अंग्रेज होने की चुगली नहीं करती। उनकी भक्ति देख सुबह-शाम पूजा-पाठ व भजन-कीर्तन के लिए भीड़ इकट्ठा हो जाती है। लंदन में जन्मे और दक्षिण अफ्रीका में बिल्डिंग कांट्रैक्टर रहे टिम केली अब जौनपुर में टिम बाबा कहलाते हैं।
मथुरा-वृंदावन में अंग्रेज अक्सर दिख जाएंगे, लेकिन वे सब किसी पंथ, संस्था से जुड़े हैं। 47 वर्षीय टिम इस मायने में अलग हैं, क्योंकि वह मंदिर, आयुर्वेदिक और होमियोपैथिक अस्पताल और महिला कालेज का अपना सपना अपने स्तर से साकार कर रहे हैं। इंग्लैंड में रहती उनकी दो बेटियां एंजल और वेथीपर्ल अपनी कमाई से बचत करके उन्हें इस काम के लिए पैसा भेजती हैं। बेशक, यह काम उनके गुरुभाई और ग्रामीणों के सहयोग के बिना नहीं हो सकता, लेकिन टिम बाबा का योगदान अतुलनीय है। समाधगंज बाजार में बन रहे 365 खंभों के इस विशाल मंदिर के लिए जयपुर से पत्थर और शिल्पी आते हैं।
टिम में हिंदू धर्म के प्रति आकर्षण की कथा भी रोचक है। दक्षिण अफ्रीका में काम करते हुए टिम केली एक मकान की दूसरी मंजिल से गिर गए और उनकी कमर की हड्डी टूट गयी। कारोबार ठप हो गया और टिम लगभग तीन वर्षो तक व्हील चेयर पर रहे। निराश टिम को किसी ने सलाह दी, तो उन्होंने आयुर्वेदिक एवं होमियोपैथी दवाओं का दामन पकड़ा और साथ में योग भी करने लगे। दैवयोग से पांच साल बाद वे स्वस्थ हो गये। इससे टिम के मन में भगवान के प्रति अनोखा अनुराग पैदा हो गया। स्वस्थ होने के बाद भी उनका मन काम में नहीं लगता था और आखिरकार एक दिन वह सब कुछ छोड़कर निकल पड़े विभिन्न देशों के भ्रमण पर। अठारह देशों में घूमने के बाद टिम भारत आये और यहां अंजलि पर्वत पर स्वर्गीय लक्कड़ महाराज के आश्रम में पहुंचे। वहां उनकी मुलाकात हुई महाराज के शिष्य तुलसीदास महाराज से। टिम ने उन्हें अपना गुरु मान लिया और योग व तप करने लगे। वर्ष 2004 में वह कुरनी [समाधगंज-जौनपुर] पहुंचे व उसी स्थान पर मंदिर बनवाना शुरू कर दिया, जहां सन 1990 में लक्कड़ महाराज ने श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर की नींव रखी थी।

अभी तो वह अनुभव ले रहे हैं

उन्हें किसी नौकरी के इंटरव्यू के लिए नहीं जाना है, जो अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। अनुभव के आधार पर उनका कोई प्रमोशन भी नहीं होने जा रहा है, जो अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। अभी तो उन्हें अपनी कोई बात, अपनी कोई दलील, अपना कोई पॉइंट भी साबित नहीं करना है कि वह जो कह रहे हैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहे हैं, जो उन्हें अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। अभी तो उन्हें कोई प्रामाणिक किताब नहीं लिखनी है, जो अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। उन्हें अनुभवों के आधार पर कोई भाषण भी नहीं देना है, जो अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। उन्हें अपने अनुभवों से देश की आने वाले पीढि़यों को शिक्षित भी नहीं करना है, जो अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। उन्हें कोई यह चुनौती भी नहीं दे रहा है कि आखिर आपका अनुभव क्या है, जो अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। अनुभवहीन बताकर कोई उन्हें कमतर बनाने की कोशिश भी नहीं कर रहा है, जो अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। उन्हें शायद कोई एडवेंचर करने का शौक भी नहीं होगा, जो उन्हें अनुभव चाहिए। फिर भी वह अनुभव ले रहे हैं। गृह मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि हर नए बम विस्फोट से उन्हें अनुभव मिल रहे हैं। नए-नए बम विस्फोट, नए-नए अनुभव। वह अनुभव समृद्ध हो रहे हैं। समृद्ध होना अच्छी बात है। इधर समृद्धि की भूख भी कुछ ज्यादा बढ़ गई है। हर आदमी समृद्धि की दौड़ में है। सरकार तक ने खुली छूट दे दी है, समृद्ध होने की। सो कोई पीछे नहीं रहना चाहता। ऐसे में अनुभव समृद्ध होना भी कोई बुरी बात नहीं। हमेशा अच्छी ही समझी गई है। अच्छी समझ के लिए, अच्छे जीवन के लिए। पर यह अनुभव नया है -गृह मंत्रालय का हर नए बम विस्फोट से अनुभव समृद्ध होने का। जनता तो बम विस्फोटों का काफी अनुभव ले चुकी। बीसियों साल से ले रही है। अनुभव लेते-लेते वह थक चुकी है, तंग आ चुकी है। अब वह और अनुभव नहीं चाहती। माफ करो बाबा। इतना भोगा हुआ यथार्थ पाकर हम क्या करेंगे। वैसे अनुभव तो गृह मंत्रालय भी लेता ही रहा है। उसके अधिकारी, उसकी खुफिया एजंसियां, उसके सुरक्षा बल सब लेते रहे हैं। पर अभी उनका मन नहीं भरा है। इतने अनुभवों के बाद भी उन्होंने ज्यादा नहीं सीखा है। अक्सर तो लोग यही कहते हैं कि उन्होंने कोई सबक नहीं लिया है। खुफिया एजंसियां तो हर बार फेल हो जाती हैं। सुरक्षा बल नाकाम रहते हैं, नाकारा साबित होते हैं। वह बलहीन, तेजहीन, कर्महीन हो गए हैं। पूरी तरह विफल हो गए हैं। इसलिए गृह मंत्रालय को और अनुभव चाहिए। और सबक चाहिए। सफल होने के लिए अनुभव और सबक हमेशा ज्यादा चाहिए, नए-नए चाहिए। लेकिन जनता को अगर लगता है कि यह गलत है, मीडिया को अगर लगता है कि यह गलत है, तो सबसे पहले तो उन्हें अपना रवैया बदलना चाहिए। गृह मंत्रालय को दोषी ठहराना बंद करना चाहिए। खुफिया एजंसियों को विफल बताना बंद करना चाहिए। सुरक्षा बलों को नाकाम और नाकारा कहना बंद करना चाहिए। कहना चाहिए कि अब तक गृह मंत्रालय ने काफी सबक सीख लिए हैं, उसके पास काफी अनुभव है और इन सबकों से सीख लेते हुए, इन अनुभवों के आधार पर वह जो कर रहा है, ठीक कर रहा है। खुफिया एजेंसियों को पूरी तरह सफल बताना चाहिए और सुरक्षा बलों के बल और तेज का गुणगान करना चाहिए। ऐसे में नए-नए अनुभव लेने की भूख नहीं रहेगी। गृह मंत्रालय को लगेगा कि वह काफी अनुभव समृद्ध है। आखिर प्रोत्साहन भी तो एक चीज होती है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो गृह मंत्रालय इसी तरह नए-नए अनुभव लेता रहेगा, पाता रहेगा, बटोरता रहेगा। और आखिर में बम विस्फोट तो पता नहीं रुकेंगे या नहीं, जनता को तो पता नहीं राहत, सुरक्षा और शांति मिलेगी या नहीं, पर होगा यह कि इन अनुभवों के आधार पर रिटायरमंट के बाद गृह मंत्रालय के अधिकारी सुरक्षा सलाहकार बन जाएंगे, किसी राज्य के राज्यपाल हो जाएंगे, सुरक्षा संबंधी किसी कमिटी के अध्यक्ष हो जाएंगे, मीडिया एक्सपर्ट बन जाएंगे और कुछ नहीं होगा तो सुरक्षा संबंधी एक अच्छी सी किताब लिखेंगे और सिलेब्रिटी बन जाएंगे। कर लो क्या करोगे?

पंक्चर बनाकर परिवार पालती है मगदाली

बीस वर्ष तक गृहिणी का जीवन जीने वाली झारखंड निवासी मगदाली ने ऐसा व्यवसाय अपनाया है जिस पर पुरुषों का एकाधिकार माना जाता है। वह साइकिल के पंक्चर बनाकर अपने परिवार का पालन पोषण कर रही है।
रांची में रहने वाली मगदाली का जीवन आज से पांच वर्ष पहले तक किसी आम घरेलू औरत की तरह अपने परिवार तक सिमटा हुआ था। उसी समय पंक्चर की दुकान चलाने वाले उनके पति की मौत हो गई। तीन बच्चों के साथ जिंदगी से जूझ रही मगदाली ने अपने पति के व्यवसाय को अपनाने का फैसला किया।
मगदाली ने बताया कि पति की मौत के बाद मेरे परिवार के भूखों मरने की नौबत आ गई थी। तभी मैंने अपने पति की तरह पंक्चर बनाने का निर्णय लिया। सारा समान तो पहले से ही घर में था, बस मैंने काम सीखना शुरू कर दिया। अब मैं आराम से काम कर लेती हूं।
मगदाली ने बताया कि शुरू में लोग मेरी ओर घूर कर देखते थे। उन्हे आश्चर्य होता था कि एक महिला पंक्चर बनाने का काम करती है। उनके पास दिन में 10 से 15 ग्राहक आते है और वह 50 से 150 रुपये प्रतिदिन कमा लेती है। मगदाली ने बताया कि उन्होंने अपनी बचत से दो वर्ष पूर्व अपनी बेटी की शादी भी की।
मगदाली को एक ही दुख है कि कमाई कम होने की वजह से वह अपने दोनों बेटों को पढ़ा नहीं पाई। अब उनकी इच्छा है कि वह बैंक से कर्ज लेकर अपने काम को साइकिल से मोटरसाइकिल और कार तक विस्तार दे।

मेरा विचार

बूंद बूंद से सागर भरता है मुझे खुशी हुयी कि मगदाली ने अपने सपनों को नई उड़ान दी

Saturday, September 20, 2008

सेहतमंद रहने के लिए कुछ फंडे

भागमभाग भरी जिंदगी और बदलती जीवनशैली के चलते हृदय रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। भारतीय चिकित्सकों का कहना है कि देशी तरीके अपना कर दिल की बीमारियों से बचा जा सकता है। भुने चने, मक्का के फुल्ले [पापकार्न], मुरमुरे और चने व जौ के सत्तू का सेवन हृदय की सेहत के लिहाज से बेहद फायदेमंद है।
एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2010 तक दुनिया में मौजूद दिल के रोगियों की 60 फीसदी संख्या भारत में होगी। यानी भारत हृदय रोगियों की राजधानी बनने की ओर है। भयभीत करने वाले इन आंकड़ों के बीच हम इस बात से राहत महसूस कर सकते हैं कि देशी खान-पान से हृदय रोग का खतरा कम किया जा सकता है।
व‌र्ल्ड हार्ट अकादमी के अध्यक्ष डाक्टर एच. के. चोपड़ा और मैक्स हार्ट हास्पिटल के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डाक्टर प्रवीण चंद्रा के अनुसार मोटे अनाज दिल की बीमारी से लड़ने का सर्वोत्तम उपाय हैं। उनका कहना है कि खाने में नियमित रूप से भुने चने, पापकार्न, सत्तू व दलिया का सेवन कर दिल की अच्छी देखभाल की जा सकती है। डा. चोपड़ा व चंद्रा दसवीं हेल्थ राइट्स कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि मुरमुरे जैसे खाद्य पदार्थ रोजमर्रा के आहार में शामिल करने से शरीर में टोटल कोलेस्ट्राल और बैड कोलेस्ट्राल का स्तर कम किया जा सकता इनका बढ़ा स्तर ही लोगों को दिल का मरीज बनाता है। डा. चोपड़ा के अनुसार नशा, डिब्बाबंद खाना और तला भोजन हृदय का सबसे बड़ा दुश्मन है। तो इंतजार किस बात का है! बर्गर, पिज्जा और जंक फूड को तत्काल टा-टा कह दीजिए।

अगर
आप रोजाना एक्सरसाइज़ करते हैं, तो इससे आपका इम्यून सिस्टम ठीक रहता है। डेली रूटीन में तेज-तेज कदमों से चलना, पत्तों को इकट्ठा करना या बच्चों के साथ 20 से 30 मिनट तक खेलना आदि ऐक्टिविटी शामिल करें। अकसर लोग काम के दबाव में खाना खाना भूल जाते हैं, इसलिए जहां तक संभव हो ब्रेकफास्ट अवश्य लें। ब्रेकफास्ट में टोस्ट, फल व जूस लें। रात को खाना खाने के बाद अगर आप वॉक पर जाते हैं, तो हल्की वॉक लें, क्योंकि दिन के मुकाबले रात में पाचन क्षमता घट जाती है। कभी भी 5 घंटे से ज्यादा समय तक भूखे न रहें। अकसर लंबे समय तक कुछ न खाने के बाद जब आप लंच या डिनर करते हैं, तो भूख लगने के कारण कुछ अधिक ही खा लेते हैं, जो आपके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। हमेशा फ्रीज में ताज़े फल व सब्जियां रखें और जब भूख लगे तो खा लें। आप रोजाना क्या खा रहे हैं, उसे डायरी में जरूरी लिखें। संभव हो, तो व्रत न रखें। अगर आप व्रत रखते भी हैं, तो उससे एक दिन पहले अच्छी डाइट लें। आपकी डाइट प्रोटीनयुक्त होनी चाहिए। अगर कभी आप खाना खाना भूल गए हैं, तो बाद में प्रोटीनयुक्त हैवी डाइट लें। अपनी डाइट में फाइबर जरूर शामिल करें। इससे मोटापा भी नहीं बढ़ता है और आप स्वस्थ्य भी रहते हैं।
मेरा विचार
शरीर को मोटर साइकिल जैसा सोचिये, अगर आप इसमें अच्छा क्वालिटी का पेट्रोल डालेंगें, इसकी समय समय पर सर्विसिंग करवायेंगें, इसको चमका के रखेंगें तो ये लंबे समय तक आपका साथ देगी अगर आप सोचे कि चलो पेट्रोल की जगह पानी डाल देतें हैं इसको क्या पता पड़ेगा उसको पता नहीं चलेगा आपने सही सोचा :) लेकिन जब ये बीच सफर में बंद हो जायेगी तो फिर मोटर साइकिल ( शरीर ) को दोष मत दीजिये क्योकि इसके सूत्रधार तो आप हैं :))

नेग में मिली हरियाली

मेरा सभी से अनुरोध है कि आप भी हर किसी अवसर (शादी , जन्मदिन, त्यौहार या आप जिसे पसंद करे) पर पेड़ पौधे लगाये एवं हमारे आसपास के वातावरण को शुद्ध वायु और oxygen से भर दें

"पैसे दे दो, जूते ले लो " लोक में इस गीत के बोल चाहे जिस तरह के भी हों, विवाह के अवसर पर जूते चुराकर नेग लेने की परंपरा बहुत पुरानी है. लेकिन उत्तराखंड की लड़कियों ने शादी के लिए आए दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने के रिवाज को तिलांजलि दे दी है. वे अब दूल्हों के जूते नहीं चुराती बल्कि उनसे अपने मैत यानी मायके में पौधे लगवाती हैं. इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी परंपरा को गति दे दी है, जिसकी चर्चा देश भर में हो रही है.


अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में भी अपने जड़ें जमा चुका है. चार राज्यों में तो वहां की पाठ्य पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया है. कनाडा में मैती आंदोलन की खबर पढ़ कर वहां की पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा डोनाल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गईं.

वे मैती परंपरा से इतना प्रभावित हुई कि उन्होंने इसका कनाडा में प्रचार-प्रसार शुरु कर दिया. अब वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं. मैती परंपरा से प्रभावित होकर कनाडा सहित अमेरिका, ऑस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं.

मैती आंदोलन की भावनाओं से अभिभूत होकर अब लोग जहां पेड़ लगा रहे हैं वहीं उनके व्यवहार भी बदल रहे हैं. पर्यावरण के प्रति उनके सोच में भी परिवर्तन आ रहा है. यही वजह है कि अब लोग अपने आसपास के जंगलों को बचाने और इनके संवर्धन में भी सहयोग करने लगे हैं. इस आंदोलन के चलते पहाड़ों पर काफी हरियाली दिखने लगी है और सरकारी स्तर पर होने वाले वृक्षारोपण की भी असलियत उजागर हुई है. गांव-गांव में मीत जंगलों की श्रृंखलाएं सजने लगी हैं.
मैती आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से बातचीत
नीयत
का
कमाल
इस आंदोलन की जो अवधारणा थी और जो ताना-बाना बुना गया था, उससे ही यह उम्मीद की गई थी कि लोग जरूर इस आंदोलन को अपनाएंगे और इसमें अपनी भावनात्मक दिल्चस्पी दिखाएंगे.
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पर्यावरण संरक्षण के लगातार बढ़ते इस अभियान को अपनी परिकल्पना और संकल्प से जन्म देने वाले कल्याण सिंह रावत ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके प्रेरणा से उत्तराखंड के एक गांव से शुरु हुआ यह अभियान एक विराट और स्वयं स्फूर्त आंदोलन में बदल जाएगा.

मैती की धुन
अब तो इसकी व्यापकता इतनी बढ़ गई है कि इसके लिए किसी पर्चे-पोस्टर और बैठक-सभा करने की जरूरत नहीं होती है. मायके में रहने वाली मैती बहनें शादियों के दौरान दूल्हों से पौधे लगवाने की रस्म को खुद-ब-खुद अंजाम देती हैं.

विवाह के समय ही पेड़ लगाने की इस रस्म के स्वयं स्फूर्त तरीके से फैलने की एक बारात में आए लोग भी होते हैं जो अपने गांव लौटकर इस आंदोलन की चर्चा करने और अपने यहां इसे लागू करने से नहीं चूकते. शादी कराने वाले पंडित भी इस आंदोलन का मुफ्त में प्रचार करते रहते हैं. अब तो शादी के समय छपने वाले निमंत्रण पत्रों में भी मैती कार्यक्रम का जिक्र किया जाता है.

आज की तारीख में आठ हजार गावों में यह आंदोलन फैल गया है और इसके तहत लगाए गए पेड़ों की संख्या करोड़ से भी उपर पहुँच गई है.

करीब डेढ़ दशक पहले चामोली के ग्वालदम से फैला यह आंदोलन कुमाऊं में घर-घर होते हुए अब गढ़वाल के हर घर में भी दस्तक देने लगा है. शुरुआती दौर में पर्यावरण संरक्षण के वास्ते चलाए गए इस अभियान में महिलाओं और बेटियों ने इसमें सर्वाधिक भागीदारी निभाई.

मैती का अर्थ होता है लड़की का मायका. गांव की हर अविवाहित लड़की इस संगठन से जुड़ती हैं. इसमें स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ, घर में रहने वाली लड़कियां भी शामिल होती हैं. इस संगठन को लड़कियों के घर परिवार के साथ गांव की महिला मंगल दल का भी समर्थन-सहयोग प्राप्त होती है. बड़ी-बूढ़ी महिलाएं भी मैती की गतिविधियों में शामिल होने से नहीं चूकती.

मैती वाली दीदी
मैती संगठन की कार्यविधि बिल्कुल साफ औऱ कदम सरल है. संगठन को मजबूत और रचनात्मक बनाने के लिए सभी लड़कियां अपने बीच की सबसे बड़ी और योग्य लड़की को अपना अध्यक्ष चुनती है, अध्यक्ष पद को बड़ी दीदी का नाम दिया गया है. बड़ी दीदी का सम्मान उनके गांव में उतना ही होता है जितना एक बड़े परिवार में सबसे बड़ी बेटी का होता है.

गांव के मैती संगठन की देखरेख और इसको आगे बढ़ाने का नेतृत्व चुनी गई बड़ी दीदी ही करती है. बाकी सभी लड़कियां इस संगठन की सदस्य होती है. जब बड़ी दीदी की शादी हो जाती है तो किसी दूसरी योग्य लड़की को बहुत सहजता के साथ संगठन की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है और यह क्रम लगातार चलता रहता है.
प्रेम का पेड़
मैती आंदोलन अब केवल विवाह के मौके पर दूल्हा-दुल्हन से वृक्ष लगाने तक सीमित नहीं रह गया है. इस संगठन ने वैलेंटाइन डे जैसे आयातित मैके को भी गुलाब फूल लेने-देने के प्रचलन से बाहर निकाल कर `एक युगल एक पेड़' के कार्यक्रम से जोड़ दिया है.
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गांव की हरेक लड़की मायके में अपने घर के आसपास किसी सुरक्षित जगह पर अपने प्रयास से किसी वृक्ष की एक पौध तैयार करती है. यह पौध जलवायु के अनुकूल किसी भी प्रजाति की हो सकती है. कुछ लड़कियां जमीन पर पॉलिथीन की थैली पर केवल एक पौधा तैयार करती है. गांव में जितनी लड़कियां होती हैं, उतने ही पौधे तैयार किये जाते हैं.

हरेक लड़की अपने पौध को देवता मान कर या अपने जीवन साथी को शादी के समय़ देने वाला एक उपहार मान कर बड़ी सहजता, तत्परता और सुरक्षा से पालती-पोसती रहती है. इस तरह अगर गांव में सौ लड़कियां है तो सौ पौध तैयार हो रहे होते हैं.

किसी भी गांव की लड़की की शादी तय हो जाने पर बड़ी दीदी के मां-बाप से बातचीत करके उनके घर के ही आंगन में या खेत आदि में शादी के समय अपने दूल्हे के साथ पौधारोपण कर देती हैं. शादी के दिन अन्य औपचारिकताएं पूरी हो जाने पर बड़ी दीदी के नेतृत्व में गांव की सभी लड़कियां मिल कर दूल्हा-दुल्हन को पौधारोपण वाले स्थान पर ले जाती हैं. दुल्हन द्वारा तैयार पौधे को मैती बहनें दुल्हे को यह कह कर सौंपती हैं कि यह पौधा वह निशानी है या सौगात है जिसे दुल्हन ने बड़े प्रेम से तैयार किया है.

मैती कोष भी
दूल्हा मैती बहनों के नेतृत्व में पौधा रोपता है और दुल्हन उसमें पानी देती है. मंत्रोच्चार के बीच रोपित पौधा दूल्हा दुल्हन के विवाह की मधुर स्मृति के साथ एक धरोहर में तब्दील हो जाता है. पौधा रोपने के बाद बड़ी दीदी दूल्हे से कुछ पुरस्कार मांगती है. दूल्हा अपनी हैसियत के अनुसार कुछ पैसे देता है, जो मैती संगठन के कोष में जाता है. मैती बहनों दूल्हों से प्राप्त पैसों को बैंक य़ा पोस्ट ऑफिस में या गांव की ही किसी बहू के पास जमा करती रहती हैं.

इन पैसों का सदुपयोग गांव की गरीब बहनों की मदद के लिए किया जाता है. गरीब बहनों के विवाह के अलावा इन पैसों से उन बहनों के लिए चप्पल खरीदी जाती है, जो नंगे पांव जंगल में आती-जाती हैं या इन पैसों से गरीब बच्चियों के लिए किताब या बैग आदि खरीदे जाते हैं. हरेक गांव में मैती बहनों को साल भर में होने वाली दस पंद्रह शादियों से करीब तीन चार हजार से अधिक पैसे जमा हो जाते हैं. ये पैसे मैती बहनें अपने गांव में पर्यावरण संवर्धन के कार्यक्रमों पर भी खर्च करती है.

महिलाओं के विचारों में विविधता होती है।

कॉर्परट सेक्टर में महिलाएं लगातार तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रही हैं। कंपनियां भी उन्हें लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। अगर मौजूदा कर्मचारी किसी महिला कर्मचारी को रेफर करते हैं, तो कंपनियां उन्हें 25 फीसदी एक्स्ट्रा बोनस दे रही हैं।

देश के कॉर्परट सेक्टर में नया ट्रेंड यह है कि महिला स्टाफ की संख्या बढ़ाई जाए। इसकी वजह यह मानी जा रही है कि वे किसी भी हालात में बेहतर प्रफेशनल साबित होती हैं। तेल उत्पादन में जुड़ी कंपनी केयर्न इंडिया के डायरेक्टर (एचआर ऐंड अडमिनिस्ट्रेशन) पी. सेंथिलकुमार ने कहा कि महिलाओं के विचारों में विविधता होती है। हम महिलाओं को काफी प्राथमिकता देते हैं। उन्हें सभी कामों में बराबर का मौका देते हैं।

कंपनियों ने महिलाओं के नाम पर कई लाभों का भी इंतजाम कर रखा है, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में उनकी टीम से जुड़ें और बनी रहें। इन्फर्मेशन टेक्नॉलजी कंपनी सीएससी के असोसिएट डायरेक्टर (एचआर) अनुज कुमार का कहना है कि हमारे देश में सांस्कृतिक मूल्यों का अब भी काफी महत्व है। यही कारण है कि हम कामकाजी महिलाओं के लिए काफी लचीला रुख अपनाते हैं। हमारी पहल के कारण ही कंपनी में महिला कर्मचारियों की संख्या पिछले साल 21 फीसदी हो गई, जबकि 2004 में यह महज 13 फीसदी थी।

काम के घंटों में लचीला रुख रखने के अलावा सीएससी ने महिला कर्मचारियों के लिए खास तौर से वेबसाइट तैयार की है, जिसे प्लैनेट डब्ल्यू का नाम दिया गया है। यह साइट विचारों के आदान-प्रदान के मंच के तौर पर काम करता है। अनुज कुमार का कहना है कि यह वेबसाइट 2006 में लॉन्च की गई और इसे काफी पसंद किया गया। कंपनी ने महिला कर्मचारियों के लिए रेग्युलर हेल्थ चेकअप का भी इंतजाम किया है।

मुंबई की मैनिजमंट कंसल्टंसी फर्म ईएसपी कंसल्टेंट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में पार्टनर आनंद वरदराजन का कहना है कि देश में अधिकांश कंपनियां महिला कर्मचारियों के साथ सहानुभूति रखती हैं। उन्हें बेहतर प्रफेशनल भी माना जाता है।

विश्व पर्यटन मानचित्र पर छाने की क्षमता

अर्थव्यवस्था में उभर रही मंदी की स्थिति एवं डॉलर व रुपए की गड़बड़ाती विनिमय दर के बावजूद देश में विदेशी पर्यटकों की संख्या में अच्छी वृद्धि की बहुत अच्छी संभावना है। यह अनुभवजन्य मान्यता है कि जिस देश में ओलिम्पिक होते हैं उस देश में पर्यटकों की संख्या घटती है एवं पड़ोसी देशों में बढ़ती है। ऐसा ही बार्सिलोना व सिडनी में भी हुआ है।

इस लिहाज से आने वाले वर्षों में भारत में विदेशी पर्यटकों की संख्या में अच्छा इजाफा हो सकता है एवं इसका अच्छा लाभ देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों को भी मिल सकता है। वैसे भी हमारे देश में पर्यटन एक महत्वपूर्ण उद्योग बन चुका है और देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को इससे करीब 7 प्रतिशत का योगदान मिल रहा है एवं 4.10 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और 9 लाख लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।

भारतीय अस्पताल विदेशी मरीजों के लिए पहली पसंद बन रहे हैं। इसीलिए विश्व पर्यटन एवं व्यवसाय परिषद के अनुसार भारत में पर्यटन की माँग सतत रूप से तेज गति से बढ़ सकती है। उसके अनुसार वर्ष 2013 में समाप्त होने वाले नौ वर्षों में पर्यटकों की संख्या प्रति वर्ष औसतन 9 प्रतिशत की गति से बढ़ सकती है और तब भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा पर्यटक बाजार बनकर उभर सकता है।

वैसे वर्ष 2007 में पहली बार 50 लाख विदेशी पर्यटक भारत आए, जबकि 2006 में उनकी संख्या 44 लाख 50 हजार थी। इसी वजह से वर्ष 2007 में पर्यटन से विदेशी मुद्रा की आवक 33 प्रतिशत बढ़कर 11 अरब 96 लाख डॉलर हुई, जबकि 2006 में 8 अरब 93 लाख डॉलर की हुई थी। देश का होटल उद्योग अभिन्न रूप से पर्यटन से जुड़ा हुआ है। इसलिए पर्यटन में आई तेजी का सबसे अधिक लाभ होटल उद्योग को मिला।

इसे 'अभ्यार्थना उद्योग' इसीलिए कहा जाता है। वित्तीय वर्ष 2007-08 में पर्यटन उद्योग में जो वृद्धि हुई वह वर्ष 2008-09 की प्रथम तिमाही में भी जारी रही और इसका लाभ होटल उद्योग के साथ ही हवाई सेवाओं को भी मिला। चालू वित्तीय वर्ष की प्रथम तिमाही में पर्यटकों की संख्या में 12.2 प्रतिशत की वृद्धि (पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में) हुई एवं विदेशी मुद्रा की आय में 34.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 19.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

पर्यटकों की अधिक संख्या में आकर्षित करने के लिए विकास के बुनियादी साधनों का निर्माण तेजी से किया जा रहा है, किन्तु फिर भी देश में होटलों के 1 लाख 50 हजार कमरों की कमी है और होटल के कमरों की माँग के अनुरूप पूर्ति नहीं हो रही है- इसीलिए करीब 40 अंतरराष्ट्रीय होटल ब्रॉण्ड भारत में प्रदेश कर रहे हैं एवं उनकी उपस्थिति से यह अभ्यार्थना क्षेत्र 11.41 अरब डॉलर से अधिक हो जाएगा, किन्तु सही बात यह भी है कि पर्यटन उद्योग के क्षेत्र में अनेक छोटे-बड़े रोड़े हैं और वे कभी भी देश को विश्व का प्रमुख पर्यटन स्थल बनने से रोक सकते हैं, क्योंकि अभी भी देश में विकास की बुनियादी संरचनाएँ अधूरी हैं एवं पर्यटन प्रबंधन में अनेक खामियाँ हैं, उच्च गुणवत्ता वाली होटलों की कमी है। फिर इस उद्योग से जगह-जगह जुड़े छोटे-मोटे दलाल एवं बुरी नीयत के व्यवस्थापकों की वजह से देश का पर्यटन उद्योग बदनाम हो रहा है।

Friday, September 19, 2008

मार्गन स्टेनली भारत में अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली में जुटी

मार्गन स्टेनली भारत में अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली कर रही है। क्या यह एक और पतन के संकेत हैं? या विलय होने वाला है? मार्गन स्टेनली की बिकवाली से सबके कान खड़े हो गए हैं क्योंकि वाल स्ट्रीय की बड़ी कंपनी बेयर स्टर्न्‍स और लीमैन ब्रदर्स ने भी यही रास्ता अपनाया था।

बुधवार को मार्गन स्टेनली मारीशस कंपनी ने 871 करोड़ रुपए के शेयर बेच दिए हैं। यूनाइटेड स्पिरिट्स में उसने 339 करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं। यह देश में उसकी 11,200 करोड़ रुपए की हिस्सेदारी में 8.5 फीसदी है।

यह बिकवाली बुधवार को एफआईआई की कुल बिकवाली का 80 फीसदी थी। मार्गन स्टेनली ने यह बिकवाली 7 कंपनियों के शेयरों में 8 बार में की है। इससे ये सभी शेयर 4 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए हैं। सुभाष प्रोजेक्ट्स में 9.2 करोड़ और यूनाइटेड स्पिरिट्स में 339 करोड़ रुपए की हिस्सेदारी बेची है।

Thursday, September 18, 2008

पिता के समान मिले मां के नाम को भी दर्जा

बच्चों के नाम के आगे पिता का ही नाम क्यों लिखा जाना चाहिए? केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने यह सवाल उठाते हुए कहा कि लिखा-पढ़ी में पिता के समान मां के नाम को भी अहमियत मिलनी चाहिए। उनका मंत्रालय इसके कानूनी प्रावधान के लिए पहल करने जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने महिलाओं या लड़कियों पर तेजाब फेंकने की घटनाओं को रोकने के लिए पीड़ित के इलाज और पुनर्वास का जिम्मा इसके दोषियों पर ही डालने की पैरवी की है।

रेणुका चौधरी ने दहेज निरोधक कानून-1961 को और सख्त बनाने की बात कही। महिलाओं और लड़कियों को तेजाब संबंधी अपराधों से बचाने के लिए प्रस्तावित विधेयक के मसौदे पर भी वह बोलीं। उन्होंने कहा, 'बच्चे के नाम के आगे आखिर मां का नाम क्यों नहीं लिखा जा सकता? पासपोर्ट, स्कूल-कालेज और दूसरे सभी दस्तावेजों में मां के नाम को वही दर्जा मिलना चाहिए-जो उसके पिता को मिलता है'। उन्होंने कहा कि जल्द ही उनका मंत्रालय इस मसले पर दूसरे मंत्रालयों से बातचीत शुरू करने जा रहा है।

पुलिस अधिकारियों, कानून के जानकारों और गैर-सरकारी संगठनों की मौजूदगी में हुए इस विचार-विमर्श में आईपीसी की धारा-498 ए में संशोधन या इसे खत्म करने का पुरजोर विरोध किया गया। रेणुका चौधरी ने खुद कहा कि कानून की धारा-498 ए को भी लागू करने वाले ज्यादातर पुरुष हैं, लिहाजा उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए कि इसका दुरुपयोग न हो। उन्होंने कहा महिलाओं पर तेजाब फेंकने की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार जल्द ही एक विधेयक को अंतिम रूप देने जा रही है। उसमें ऐसी घटना में पीड़ित को मुआवजा दिए जाने का प्रावधान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित के इलाज और पुनर्वास पर होने वाले सारे खर्च का जिम्मा घटना के दोषियों पर डाला जाना चाहिए।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा. गिरिजा व्यास ने कहा कि तेजाब फेंकने की घटनाओं में कार्रवाई की बाबत कानून में अलग से प्रावधान होना चाहिए। पीड़ित की प्लास्टिक सर्जरी होनी चाहिए। प्रस्तावित विधेयक में 'नेशनल एसिड अटैक विक्टिम असिस्टेंस बोर्ड' बनाने की बात कही गई है। प्रथम दृष्टया तेजाब हमले की पुष्टि होने पर पीड़ित को तात्कालिक तौर पर पांच लाख रुपये, बाद में इस राशि को तीस लाख रुपए तक करने की पैरवी की गई है।

Monday, September 15, 2008

न्यारे बंगले के नाम पर अरबों के वारे-न्यारे

डीडीए की हाउसिंग स्कीम के लिए करीब 10 लाख लोगों में से केवल 5,000 को ही फ्लैट मिलेंगे, लेकिन बैंकों और डीडीए की जरूर पौ बारह हो गई है। डीडीए की इस हाउसिंग स्कीम के लिए करीब 10 लाख फॉर्म जमा हो चुके हैं। डीडीए को केवल फॉर्म की बिक्री से 10 करोड़ रुपये आ जाएंगे। फ्लैट के लिए बुकिंग अमाउंट बैंक फाइनैंस कर रहे हैं और उन्हें ब्याज के तौर पर ही करीब 600 अरब रुपये मिल जाएंगे। इसके अलावा डेढ़ लाख रुपये प्रति फ्लैट के हिसाब से डीडीए के नाम जमा होगा, उसका ब्याज करीब 500 अरब रुपये बैठता है। यानी लोगों को फ्लैट मिलने से पहले बैंक और डीडीए जरूर मालामाल हो जाएंगे। डीडीए की हाउसिंग स्कीम के लिए फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख 16 सितंबर यानी मंगलवार है। इस हाउसिंग स्कीम को फाइनैंस करने के लिए बैंकों में होड़ मची हुई है। सभी फ्लैटों के लिए डीडीए ने डेढ़ लाख रुपये बुकिंग अमाउंट रखा हुआ है। इस भुगतान के लिए बैंक लोगों से ब्याज के तौर पर पांच से लेकर नौ हजार रुपये तक अडवांस में ले रहे हैं। यह राशि बैंक ब्याज के तौर पर वसूल रहे हैं, जिसमें प्रोसेसिंग फीस भी शामिल है। यानी आपका फ्लैट निकले या न निकले, यह राशि जरूर बैंकों को मिल जाएगी। कोई बैंक तीन महीने का ब्याज ले रहा है तो कोई छह महीने का। इस राशि के साथ बैंक लोगों से एक ब्लैंक चेक भी ले रहे हैं, यानी अगर डीडीए के फ्लैटों का ड्रॉ निकलने में देरी हुई तो आपको और भी राशि देनी पड़ेगी। डीडीए की पिछली हाउसिंग स्कीम का ड्रॉ निकलने में छह महीने से ज्यादा का समय लग गया था। अगर 10 लाख लोगों से औसतन 6,000 रुपये चार महीने के ब्याज के तौर पर वसूले गए तो बैंकों को 600 अरब रुपये की कमाई होगी। डीडीए ने फॉर्म की कीमत 100 रुपये रखी है। यानी 10 लाख फॉर्म बिकने से ही डीडीए को 10 करोड़ रुपये की आय होगी। डीडीए की हाउसिंग स्कीम के लिए फाइनैंस करने वाले बैंक डेढ़ लाख रुपये की अग्रिम राशि 16 सितंबर को डीडीए के नाम से जमा कर देंगे। अगर बैंक इस राशि पर 10 फीसदी की दर से डीडीए को चार महीने का ब्याज देते हैं तो भी यह राशि 500 अरब बैठती है। इस राशि को अगर 5,000 फ्लैटों में बांटकर देखा जाए तो एक फ्लैट पर ब्याज 10 लाख रुपये बैठता है। डीडीए ने कई फ्लैटों की कीमत 8 लाख रुपये भी है। यानी इस ब्याज से ही इन फ्लैटों की कीमत निकल आएगी।

तरक्कीपसंद नेताओं ने खोजा वोट जुटाने का नया तरीका

राजनेताओं को वोट बटोरने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते देखा जा सकता है लेकिन यह थोड़ा अलग तरह का मामला है। अब कुछ राजनेताओं ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है और वे युवाओं की मदद कर रहे हैं, उन्हें न केवल रोजगार के काबिल बनाने में बल्कि रोजगार हासिल करने में भी। चाहे वह छिंदवाड़ा में विकास एवं अध्ययन केन्द्र (डीएलसी) खोल रहे कमल नाथ हों, अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र शिवगंगा में रोजगार मेले का आयोजन कर रहे कार्ति चिदंबरम हों या युवाओं के लिए खुदरा कारोबार का प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना हो, ये सभी पुरानी लकीर से अलग राह पर चलते दिख रहे हैं। इसकी चाहे जो वजह हो, लेकिन उनके निर्वाचन क्षेत्रों के युवाओं के लिए यह फायदे की बात है क्योंकि अब कंपनियां भी उनकी मदद के लिए आगे आ रही हैं। उदाहरण के लिए, पिछले साल छिंदवाड़ा में एनआईआईटी के सहयोग से डीएलसी खोला गया। वाणिज्य मंत्री कमल नाथ ने शीर्ष आईटी कंपनियों को इसमें हिस्सा लेने के लिए तो राजी किया ही, जमीन और भवन हासिल करने में भी उनकी मदद की। आज उस इलाके में 20 से अधिक कंपनियां हैं जिनमें इंटेल, एनआईआईटी टेकनेलॉजीज, सिस्को, टीसीएस, आईबीएम, इंफोसिस, डेल, सूजलॉन, एचसीएल जैसी दिग्गज शामिल हैं। इसी तरह वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र शिवगंगा में ग्रामीण युवाओं को संभावित नियोक्ताओं से जोड़ने की पहल की गई है। इसी साल वित्त मंत्री के पुत्र कार्ति चिदंबरम, जो कांग्रेस के सदस्य भी हैं, ने टीमलीज को तमिलनाडु में अपने पिता के संसदीय क्षेत्र में आने का न्योता दिया ताकि शिक्षित बेरोजगारों के लिए रोजगार मेले का आयोजन किया जा सके। इसके जरिए लगभग 500 लोगों को रोजगार मिला। उसके बाद शिवगंगा में कई रोजगार मेलों का आयोजन किया गया। प्राय: गलत वजहों से चर्चा में रहने वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने सही वक्त पर कदम बढ़ाया। रीटेल सेक्टर में मौका भांपते हुए पार्टी ने बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण देने के लिए कुछ महीने पहले नवनिर्माण एकेडमी ऑफ रीटेल इंडस्ट्रीज खोली। मराठी मानुष के अधिकारों के लिए हो-हल्ला करने वाली पार्टी इस संस्थान में उन युवाओं को भी मौका देगी जो राज्य में पिछले 15 साल से रह रहे हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी ब्रोकरेज मेरिल लिंच बिकी

सबप्राइम संकट का ये सबसे ताजा शिकार है। बैंक ऑफ अमेरिका ने मेरिल लिंच को 50 अरब डॉलर यानी लगभग सवा दो लाख करोड़ रुपए में खरीद लिया है। इंडस्ट्री की खबर रखने वाले बता रहे हैं कि ये सौदा मेरिल लिंच की मजबूरी की वजह से हुआ है , लेकिन उसे ठीकठाक रेट मिल गया है। मेरिल लिंच दुनिया की सबसे बड़ी ब्रोकरेज कंपनी है। मेरिल लिंच के बिकने का भारत में असर दरअसल पिछला हफ्ता लीमन ब्रदर्स होल्डिंग के दिवालिया होने की खबरों के बीच बीता। लीमन ब्रदर्स दुनिया की प्रमुख इनवेस्टमेंट बैंकिंग और फाइनांशियल सर्विसेज फर्म है। इस बात की भी चर्चा रही कि बैंक ऑफ अमेरिका लीमन ब्रदर्स को खरीद सकता है। इससे ये अफवाह भी जोर पकड़ रही है कि दूसरे इनवेस्टमेंट बैंक इसी रास्ते पर चल सकते है। बैंक ऑफ अमेरिका और मेरिल लिंच के बीच सौदे के बारे में मेरिल लिंच अभी बात करने के लिए तैयार नहीं है जबकि बैंक ऑफ अमेरिका से इस बारे में संपर्क नहीं हो पाया है। इस सौदे से बैंक ऑफ अमेरिका की स्थिति इनवेस्टमेंट बैंकिंग के क्षेत्र में मजबूत होगी। इस करार के बाद बैंक ऑफ अमेरिका के पास अमेरिका का सबसे बड़ा ब्रोकरेज नेटवर्क होगा। साथ ही दुनिया का टॉप इनवेस्टमेंट बैंक और सबसे बेहतरीन इनवेस्टमेंट मैनेजर भी उसके होंगे। इस सौदे के लिए बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल के एक शेयर के 29 डॉलर दे रहा है। ये मेरिल लिंच के मौजूदा शेयर भाव से 70 परसेंट ज्यादा है। हालांकि इस कंपनी के शेयर मी में 50 डॉलर और जनवरी , 2007 में 90 डॉलर पर ट्रेड हो रहे थे दरअसल आप इसे सबप्राइम संकट का असर मान सकते हैं। लीमन ब्रदर्स के साथ भी यही हुआ है। पिछले एक साल में मेरिल लिंच के 4000 करोड़ डॉलर का कर्जा डूब गया। इसके बावजूद मेरिल लिंच को अब भी एक बेहतरीन कंपनी माना जाता है क्योंकि इसका ब्रोकरेज बिजनेस बेहद मजबूत है। एनालिस्ट इसके ब्रोकरेज बिजनेस की कीमत 2500 करोड़ डॉलर बता रहे हैं। दुनिया में किसी और कंपनी के पास इतने ज्यादा ब्रोकर नहीं हैं। साथ ही मेरिल लिंच जितने बड़े एसेट को मैनेज करती है , उसका भी दुनिया में कोई जोड़ नहीं है।

Sunday, September 14, 2008

ताकि फिर सूनी न हो किसी मां की गोद

'मेरा बेटा बीएमडब्ल्यू कार हादसे में मारा गया। उसका खून सड़क पर बहा। टीवी और समाचार-पत्रों में जब बम धमाकों में घायल होने वाले लोगों को लहूलुहान और तड़पते देखा तो मुझे अपने बेटे की याद ताजा हो आई। दिल ने यही फैसला लिया कि नहीं, अब वह किसी मां से उसका लाल जुदा नहीं होने देगी। इसलिए वह अपने पूरे कुनबे के साथ बम विस्फोट में घायल हुए लोगों की मदद के लिए रक्तदान करने आई हैं।' यह कहना था कि बुधवार की देर रात बीएमडब्ल्यू कार हादसे में घायल होने एवं इलाज के दौरान शनिवार को अस्पताल में दम तोड़ देने वाले गाजियाबाद निवासी युवक अनुज की मां उषा सिंह का। यह कहते हुए उसकी आंखों में बेटे की जुदाई के गम के साथ-साथ लोगों की मदद का एक अलग ही जज्बा दिख रहा था।
बम हादसे में घायल हुए लोगों की मदद करने के लिए रविवार की शाम अनुज आदित्य की मां उषा सिंह, बड़ा भाई क्षितिज, मामा राकेश चौहान व तेजेश चौहान, मामी अनिता, राजीव त्यागी समेत 15 लोग राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे। उन्होंने हाथ में अनुज की फोटो ले रखी थी। उन्होंने इस मौके पर कहा कि उनके द्वारा किए गए रक्तदान से अन्य लोगों का जीवन बचाया जा सकेगा और यही उनके बेटे को उनकी ओर से सही श्रद्धांजलि होगी।
वहीं, बम विस्फोट में घायल लोगों की मदद में राजधानी के राजनैतिक दलों, सामाजिक संगठनों और साधारण लोगों का भी जज्बा देखने लायक था। हर कोई रक्तदान करने के लिए उतावला-सा था। हादसा होते ही सबसे पहले युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता, उसके बाद एनएसयूआई कार्यकर्ता और बाद में युवा परिवार सेवा समिति के लोग घायलों की मदद को रक्तदान करने पहुंचे। इसके अलावा अन्य जगहों से भी एक-एक करके लोग रक्तदान करने के लिए अस्पताल में शनिवार की देर रात से रविवार की देर रात तक पहुंचते रहे। कितने लोगों ने रक्तदान किया, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रविवार की देर शाम तक लोहिया अस्पताल में ब्लड बैंक का काटा भी फुल हो गया। अंत में अस्पताल प्रबंधन ने लोगों से रक्तदान करने से मना कर दिया। इस बारे में अस्पताल के सीएमओ डॉ. एसके शर्मा ने बताया कि उनके पास इस समय घायलों की मदद के लिए पर्याप्त मात्रा में खून की यूनिट मौजूद हैं। इसलिए लोगों के द्वारा किए जा रहे रक्तदान की अभी जरूरत नहीं है। उनके पास पहले से ही ब्लड बैंक में काफी अधिक रक्त है।

Friday, September 12, 2008

डेढ़ रुपए से डेढ़ करोड़ तक का सफर


रायपुर. 18 साल पहले दो किशोरों ने साथ साथ काम करना शुरू किया। पहले कूरियर कंपनी में काम किया फिर ढोकला पैकिंग करने लगे मेडिकल किताबों के सेल्समैन बने और फिर सोचा कि खुद ही इस कारोबार के मालिक क्यों न बनें? बड़ी सोच, मेहनत और लगन ने आज उन्हें एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि नई पीढ़ी को उनकी मिसाल दी जा सकती है।
1990 के आसपास खोमलाल के पिता भरत चंद्रेश्वर श्रवण के घर किराए से रहते थे। खोमलाल दुर्ग के बेरला गांव में पढ़ता था। दसवीं फेल होने के बाद वह पिता के पास रायपुर आ गया। यहीं उसकी श्रवण से मुलाकात हुई।
श्रवण तब स्कूल में पढ़ता था। खोमलाल एक कूरियर कंपनी में काम करने लगा। शहर उसके लिए नया था इसलिए वह श्रवण को साथ लेकर घूमता था। इस घूमने का एक नतीजा यह हुआ कि श्रवण भी फेल हो गया और खोमलाल ने उसे भी एक कूरियर कंपनी में काम दिला दिया।
दोनों कूरियर का काम करने के साथ पाकेटमनी के लिए सुबह 4 बजे से 8 बजे तक नहरपारा के एक संस्थान में डेढ़ रुपये घंटे के हिसाब से ढोकला पैकिंग करने लगे। खोमलाल ने बताया कि इसी बीच जिस कूरियर कंपनी में वह काम करता था वह बंद हो गई। जिसके बाद कुछ दिन इधर-उधर भटकने के बाद वह एक मेडिकल बुक की दुकान में बतौर सेल्समैन काम करने लगा।
यह काम करते करते खयाल आया कि क्यों न इसी काम को मालिक की तरह किया जाए? दोनों ने नौकरी छोड़ दी और शहर के मेडिकल संस्थानों से आर्डर लेने लगे। सेल्समैन का काम करते करते कुछ पहचान तो बन ही गई थी,समय के साथ वह बढ़ने लगी। सुबह सुबह वे मेडिकल कालेज के विद्यार्थियों-शिक्षकों से मुलाकात करते, उनकी जरूरत पूछते और किताबें लाकर देते। ग्राहकों को घर पहुच सेवा मिलने लगी तो वे उन्हें आर्डर देने लगे। काम चल निकला।
काम बढ़ने लगा तो दोनों ने गुढ़ियारी में किराए की एक दूकान ली। किराया था 900 रुपए। वहीं से अपना कारोबार बढ़ाने लगे। मेहनत में कभी कमी नहीं की। काम और बढ़ा, आर्थिक स्थिति सुधरी तो उन्होंने जेल रोड पर दूकान लेने की हिम्मत की। आज एक दूकान के अलावा उनका एक शाप कम गोडाउन भी जेल रोड पर है।
डेढ़ करोड़ सालाना टर्न ओवर होने के बाद भी वे आराम से नहीं बैठे हैं। उनका लक्ष्य बड़ा है और इसके लिए वे मेहनत भी अधिक करते हैं। वे अब भी सेल्समैन की तरह घूमते हैं। उनके घूमने का दायरा अब रायपुर से आगे बढ़कर पूरा छत्तीसगढ़ हो गया है। प्रदेश के और भी शहरों में मेडिकल किताबों की दूकानें खोलना उनका सपना है जिसके लिए वे मेहनत व लगन से जुटे हुए हैं।

ऑनलाइन अरबपतियों में तीन भारतीय

इंटरनेट के ज़रिए अपना कारोबार कर दुनिया में नाम और धन कमाने वाले अरबपतियों में भारतीय भी किसी से पीछे नहीं है.
चर्चित अमरीकी पत्रिका फ़ोर्ब्स ने ऐसे 34 लोगों की सूची जारी की है जिन्होंने इंटरनेट क्रांति के बाद कारोबार का एक नया इतिहास रचा है.
वेब अरबपतियों के नाम से जारी इस सूची में तीन भारतीय कारोबारी भी शुमार हैं.
फ़ोर्ब्स के मुताबिक़ 'इंडियाबुल्स' नामक कंपनी के समीर गहलौत की कुल संपत्ति 1.2 अरब डॉलर है. समीर फोर्ब्स की इस सूची में शामिल हैं.
वर्ष 1999 में अपने कॉलेज के दिनों के दो साथियों के साथ ऑनलाइन 'दलाल कंपनी' शुरू किया था. वे इस कंपनी के प्रमुख हैं.
कंपनी
अब समीर की कंपनी ने अपना विस्तार करते हुए रियल इस्टेट के क्षेत्र में भी क़दम बढ़ाया है.
नौकरी के लिए चर्चित वेब साइट 'नौकरी डॉट कॉम' के मालिक कवितर्क राम श्रीराम भी भारत में जन्मे ऐसे कारोबारी है जिनका नाम फ़ोर्ब्स की इस सूची में है.
शर्मा की कुल संपत्ति 1.8 अरब डॉलर है. ऑन लाइन पर जुआ के कारोबार में लगे अनुराग दीक्षित की कंपनी 'पार्टी गैम्बलिंग' को भी फ़ोर्ब्स ने अरबपतियों में शामिल किया है.
फ़ोर्ब्स इन 34 कारोबारियों की कुल संपत्ति को 109.7 अरब डॉलर आँकता है.
इस सूची में गूगल कंपनी के संस्थापक सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज भी शामिल हैं जो इस सूची में 18.7 अरब डॉलर और 18.6 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ पहले और दूसरे नंबर पर विराजमान हैं
ऑन लाइन ख़रीद फ़रोख़्त, नीलामी के लिए प्रसिद्ध साइट 'ईबे' की सीइओ मेग व्हीटमैन एकमात्र महिला हैं जो इस सूची में शामिल हैं. उनकी कुल संपत्ति 1.3 अरब डॉलर है.

जीएसएलवी में लगेगी छात्रों की बनाई मोटर

तमिलनाडु के इंजीनियरिंग छात्रों द्वारा विकसित दो मोटर जल्द ही प्रक्षेपित होने वाले जीएसएलवी राकेट में इस्तेमाल होंगी।
इससे पहले तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] इन मोटर को आयात करता था। ये मोटर सेलम स्थित सोना तकनीकी संस्थान के छात्रों ने बनाई हैं। उन्होंने इनका नमूना विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के वैज्ञानिकों और तिरुवनंतपुरम स्थित इसरो इनर्शियल यूनिट के सामने प्रदर्शित किया।
संस्थान के निदेशक ने बताया कि राकेट नोजल में लगाई जाने वाली एक मोटर उसकी दिशा नियंत्रित करेगी तो दूसरी का प्रयोग उपग्रह के रोटेशन पैनल को नियंत्रित करने के लिए होगा।

21वीं सदी की लड़कियां

कहते हैं 21वीं सदी की लड़कियां लड़कों से किसी मायने में पीछे नहीं हैं। विश्वास मानिए अब यह सिर्फ कहने की बात नहीं रही। अपनी प्रबल इच्छाशक्ति व आत्मविश्वास के दम पर लड़कियां इस बात की सार्थकता को लगातार साबित कर रही हैं। चाहे हम कल्पना चावला की बात करें या फिर पहली महिला आईपीएस किरण बेदी की। भारत की धरती समय-समय पर नारी सशक्तिकरण के नए आयामों की साक्षी बनती रही है। इसी कड़ी में कुछ नाम और जुड़ गए हैं। जिनकी हिम्मत व जज्बे को सभी नमन करेंगे। पिछले दिनों रेलवे बोर्ड की ओर से धनबाद मंडल को भेजे गए लोको पायलट व गुड््स गार्ड के पैनल में तीन लड़कियों ने लोको पायलट तथा तीन ने गुड्स गार्ड के लिए अपना स्थान सुरक्षित कराया है। इसके अलावा पांच जून को संपन्न गैंगमैन की बहाली प्रक्रिया में भी धनबाद मंडल में 1673 महिला अभ्यर्थियों को सफलता मिली है।
इनकी प्रतिभा को अद्वितीय तो नहीं मगर अद्भुत जरूर कहा जा सकता है। धनबाद मंडल में पहली बार ट्रेन चलाने का गौरव प्राप्त करने वाली कविता व जानकी शुक्रवार से इंजन का स्टीयरिंग थामेंगी। मेडिकल में उत्तीर्ण होने के बाद उन्हें प्रशिक्षण के लिए मुगलसराय रेलवे ट्रेनिंग स्कूल भेजा जा रहा है। ज्योति को पहले ही ट्रेनिंग के लिए भेज दिया गया है। प्रशिक्षण को ले दोनों लड़कियां काफी उत्साहित दिखीं। लोको पायलट कविता कर व जानकी बारी ने दृढ़ निश्चय के बदौलत अपने आप को बहादूर लड़कियों के लिए रोल माडल बना लिया है। इंजन ड्राइवर की परीक्षा उत्तीर्ण कर, इन्होंने दिखा दिया कि अबला मानी जाने वाली नारी आज के युग में पुरुषों से किसी मायनों में पीछे नहीं है। उड़ीसा के राउरकेला जिले में रहने वाली दोनों लड़कियों ने कहा कि भारतीय रेलवे का हिस्सा बनकर वे गर्व महसूस कर रही हैं। कविता कर ने राउरकेला इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है। उसके पिता यादवेंद्र कर उड़ीसा सरकार के अधीन कार्यरत हैं। कविता ने बताया कि वह जूनियर इंजीनियर बनने की तैयारी कर रही थी। इसी बीच जब उसे पता चला कि उसकी दोस्त ने ईस्ट कोस्ट रेलवे में लोको पायलट की परीक्षा पास कर ली, तो उसने भी इस लाइन में आने की ठान ली। इसके बाद क्या था दूसरे बार के प्रयास ने उसके सपने पूरे कर दिए। जब वह इस सुखद समाचार के साथ घर पहुंची तो उसके माता-पिता के खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दूसरी ओर जानकी भी प्रशिक्षण को लेकर काफी रोमांचित है। उसके पिता भी रेलवे में ही कार्यरत थे। वहीं जानकी के बड़े भाई रेलवे के गुड््स गार्ड ही हैं। जानकी ने इलेक्ट्रानिक्स एंड टेली कम्यूनिकेशन में डिप्लोमा किया है। कविता के तरह ईस्ट कोस्ट की महिला पायलट ने ही जानकी को भी इस मार्ग के लिए प्रेरित किया था। दोनों ने संयुक्त रूप से कहा कि आज लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं है। सफलता के लिए सिर्फ आत्मविश्वास और इच्छा शक्ति की जरुरत है। महिलाएं रूढि़वादी विचारधाराओं से ऊपर उठ कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ें। सफलता उनके कदम चूमेगी। गुडस गार्ड के लिए चयनित तीनों लड़कियों को रिपोर्ट करने को कहा गया है। इसी तरह लिखित परीक्षा के बाद भारी तादाद में महिला गैंगमैन भी फावड़े व हथौड़े के साथ मंडल का कामकाज संभालेंगी।

Thursday, September 11, 2008

सूप का एक फायदा यह भी

यदि आप शारीरिक और दिमागी रूप से स्वस्थ रहना चाहते है, तो सूप का नियमित सेवन करे। आप यह कह सकते है कि इसमें नई बात क्या है? सूप का सेवन फायदेमंद है, यह तो सबको पता ही है, लेकिन ऐसा नहीं है। कारण, एक नई बात का खुलासा हुआ है।
हाल ही में जापान में हुई एक रिसर्च से यह पता चला है कि सूप का सेवन करने पर न केवल भूख लगती है, बल्कि यह हमारे दिमाग के लिए भी काफी फायदेमंद होता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सूप पीने से शरीर के हानिकारक तत्व बाहर हो जाते है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे न केवल शरीर को लाभ मिलता है, बल्कि दिमाग को भी शक्ति मिलती है। हालांकि वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि सूप ताजा होने पर ज्यादा लाभ मिलता है।
इस शोध के प्रमुख अध्ययनकर्ता डॉ. नारूहितो का कहना है कि इस शोध के लिए हमने काफी लंबे समय तक अध्ययन किया है। इस अध्ययन के बाद ही हम इस नतीजे पर पहुंचे है कि दिन में एक बार सूप का सेवन अवश्य करना चाहिए। सूप का सेवन करने पर हमारे शरीर को प्रोटीन और फाइबर प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसके साथ ही कई अन्य पोषक तत्व भी प्राप्त होते है। इन पोषक तत्वों के शरीर के अंदर पहुंचने पर हमारा डाइजेस्टिव सिस्टम सही रहता है। डॉ. नारूहितो का कहना है कि सूप का सेवन करने पर हमें थकान का भी अनुभव नहीं होता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अध्ययन के लिए करीब आठ सप्ताह तक कुछ लोगों को नियमित रूप से सूप दिया गया। इसके बाद इन लोगों को कुछ सवाल हल करने के लिए दिये गए। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि हम यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि सवाल हल करने में पहले जितना समय लगा था, उसका आधा समय भी नहीं लगा। साथ ही अधिकांश सवाल भी सही थे। इससे पता चलता है कि सूप का सेवन करने पर हमारे दिमाग को भी शक्ति मिलती है।
वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि सूप शाकाहारी पदार्थो से बना होना चाहिए। मांसाहारी पदार्थो से बना सूप उतना फायदेमंद नहीं होता, जितना कि शाकाहारी सूप। कारण, मांसाहारी सूप से शरीर का डाइजेस्टिव सिस्टम खराब होता है।

एमसीडी के भ्रष्ट एंजीनियरों पर गिरी गाज

दिल्ली सरकार के ऐंटी करप्शन ब्रांच ने बुधवार देर शाम एमसीडी के 13 एंजीनियरों को गिरफ्तार कर लिया। इन पर सड़क निर्माण में घपलेबाजी, मस्टर रोल में गड़बड़ी, पद के दुरुपयोग और एमसीडी को आर्थिक नुकसान पहुंचाने जैसे कई आरोप हैं। गुरुवार को उन्हें ऐंटी करप्शन अदालत में पेश किया जाएगा। इनकी गिरफ्तारी दिलचस्प तरीके से की गई है। वैसे तीन दर्जन से अधिक एंजीनियरों की गिरफ्तारी होनी थी लेकिन भनक पाकर बाकी अंडरग्राउंड हो गए हैं। गिरफ्तार किए जाने वालों में इग्जेक्यटिव एंजीनियर, असिस्टेंट एंजीनियर और जूनियर एंजीनियर शामिल हैं। सूत्र बताते हैं कि एमसीडी की पहल पर ही ऐंटी करप्शन ब्रांच इन एंजीनियरों पर लगाए गए आरोपों की जांच कर रहा था। आरोप है कि वर्ष 2001 से 2005 के बीच इन एंजीनियरों ने सड़क निर्माण में खासी घपलेबाजी की, सेनिट्री लैंडफिल पर कूड़ा पहुंचाने में ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया, मस्टर रोल में गड़बड़ी की और अपने पदों का दुरुपयोग कर एमसीडी को आर्थिक नुकसान पहुंचाया। आरोपी एंजीनियरों की संख्या तीन दर्जन से अधिक थी। विशेष बात यह है कि एमसीडी का विजिलेंस विभाग भी इनके खिलाफ जांच पूरी कर चुका था और इनमें से अधिकतर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी चल रही थी। चूंकि मामला संगीन था इसलिए एमसीडी ने इनके खिलाफ जांच की जिम्मेदारी ऐंटी करप्शन ब्रांच को भी सौंप रखी थी। ब्रांच के डीसीपी इंद्रदेव शुक्ला के अनुसार, इन एंजीनियरों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी थी और बुधवार की सुबह इन्हें अपना पक्ष रखने के लिए ब्रांच के सिविल लाइंस स्थित दफ्तर में इन्हें बुलाया गया। शाम तक एंजीनियरों को उन पर लगाए आरोपों की ब्योरेवार जानकारी दी गई और इस बाबत उनसे उनका पक्ष भी पूछा गया। लेकिन वे ब्रांच के आला अफसरों को संतुष्ट नहीं कर सके, जिसके बाद सभी 13 को देर शाम गिरफ्तार कर लॉकअप में डाल दिया गया। सूत्र बताते हैं कि ब्रांच ने विभिन्न आरोपों में सभी तीन दर्जन एंजीनियरों को अपने दफ्तर में बुलाया था लेकिन उनमें से 13 ही आ पाए, बाकी को इस बात की भनक लग चुकी थी कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है जिससे बाद वे भूमिगत हो गए। संभावना है कि आगामी दिनों में उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा। गौरतलब है कि एमसीडी एंजीनियरों पर सालों से भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं और जब तब उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती रही है। इसी साल 23 मई को एमसीडी कमिश्नर के. एस. मेहरा ने 14 इग्जेक्यटिव एजींनियर, 20 असिस्टेंट एंजीनियर, 17 जूनियर एंजीनियर और 17 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए। इन पर आरोप है कि उन्होंने सेनिट्री लैंडफिल में गाद के बजाय मलबा डलवाया।

Wednesday, September 10, 2008

घूसखोरों से राहत बस एक फोन कॉल दूर

नई दिल्ली : दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में शिष्टाचार बने भ्रष्टाचार से आम आदमी को मुक्त कराने की पहल तो शुरू हो गई है, लेकिन अभी उसके ठोस नतीजे आने बाकी हैं। देश की सबसे भरोसेमंद माने वाली जांच एजंसी सीबीआई की ओर से आजकल आम आदमी के मोबाइल पर एक मेसिज सर्कुलेट किया जा रहा है। इस मेसिज का मजमूं कुछ इस तरह है, 'अगर कोई केंद्रीय / दिल्ली सरकार / पीएसयू / बैंक आदि का कर्मचारी आपसे रिश्वत की मांग करें, तो आप सीधे एसपी, सीबीआई से 9968081216 / 17 / 18 या 24361535 / 3541 / 2494 पर शिकायत करें। ' सीबीआई की गुजारिश पर मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर ने इस तरह के मेसिज की डिलिवरी शुरू की है। यह पहल सीबाआई की करप्शन के खिलाफ शुरू की गई राष्ट्रव्यापी मुहिम का हिस्सा है। सीबीआई के मुताबिक, यह दिल्ली में फैले करप्शन को उखाड़ फेंकने की कोशिश है, जिसकी पहल सीबीआई की ऐंटी करप्शन ब्रांच की ओर से की गई है। इस सर्विस पर आप अपनी शिकायत चौबीसों घंटे दर्ज करा सकते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, शिकायत मिलने पर जांच की कार्रवाई शुरू की जाएगी और फिर सच का पता लगाया जाएगा। भ्रष्टाचार से तंग आ चुकी जनता के लिए यह मेसिज किसी संजीवनी से कम नहीं है। लेकिन जब लोगों ने इस सर्विस की असलियत जानने के लिए इन नंबरों पर कॉल करना शुरू किया तो ज्यादातर को निराशा हाथ लगी। इनमें से एक भी नंबर पर बात नहीं हो पा रही थी। कुछ नंबर्स हमेशा बिजी बता रहे हैं, तो कुछ पर घंटी तो जा रही थी, लेकिन हलो की आवाज सुनने के लिए लोग तरसते ही रह गए। सीबीआई का कहना है कि यह अभी नई पहल है, तो इसे सुचारू रूप से चलने में कुछ वक्त लगेगा। वैसे, जो भी हो आजादी के 61 साल बाद आम आदमी को करप्शन से मुक्त करने की इस पहल से दिल्लीवासियों को बहुत राहत की उम्मीद है। इस बारे में सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह का कहना है कि यह एक बढ़िया पहल है, जिससे लोगों के बीच सीबीआई की सकारात्मक छवि बनेगी। अब आम आदमी रिश्वतखोरों के खिलाफ आसानी से शिकायत कर सकेगा। नंबर्स का बिजी होना स्वाभाविक हैं, क्योंकि करप्शन से आजिज आ चुके लाखों लोग कंपलेन करने में लगे हुए होंगे। वैसे सीबीआई की इस तरह की मुहिम महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में पहले ही चल रही है।

महाप्रयोग में भारत ने निभाई अहम भूमिका

सर्न के इस प्रयोग को मानव इतिहास का सबसे बड़ा प्रयोग बताया जा रहा है
फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड की सीमा पर बनी सुरंग में मानव इतिहास का सबसे बड़ा प्रयोग चल रहा है और पूरी दुनिया की नज़रें उस पर लगी हुई हैं.
इस महाप्रयोग में दुनिया भर के दस हज़ार वैज्ञानिकों की प्रतिभाओं का योगदान रहा है और भारत ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है.
इसका अंदाज़ा शायद इसी बात से चल जाएगा कि सर्न में घुसते ही सामने आपको नटराज की भव्य मूर्ति देखने को मिलेगी.
इस पूरे प्रयोग में करीब 140 से 150 भारतीय वैज्ञानिक किसी न किसी रुप से जुड़े रहे हैं. भारत की डॉक्टर अर्चना शर्मा एकमात्र भारतीय वैज्ञानिक हैं जो सर्न की स्टाफ़ वैज्ञानिक हैं.
बुधवार को प्रयोग के समय डॉक्टर अर्चना भी वहीं थी. सर्न यानी यूरोपीयन सेंटर फ़ॉर न्यूक्लियर रिसर्च में मौजूद डॉक्टर अर्चना ने बताया, "उस समय बहुत उत्साह था, सुबह थोड़ी घबराहट भी थी. कई लोगों की आशाओं की विपरीत 55 मिनट के अंदर जब प्रोटोन ने पूरा एक चक्र लगा लिया तो समझिए कि धमाका हो गया, हॉल तालियों से गूँजने लगा."
इस प्रयोग में कई महत्वपूर्ण उपकरण ऐसे हैं जिन्हें भारतीय संस्थानों ने बनाया है.
कई महत्वपूर्ण उपकरण ऐसे हैं जिन्हें भारतीय संस्थानों ने बनाया है, इंदौर के सेंटर ऑफ़ एडवांस टेकनॉलिज़ी ने इस प्रयोग के लिए चुंबक बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने विशालकाय कंप्यूटिंग प्रणाली बनाने में भी मदद की है. भारत सरकार ने लभगभ ढाई करोड़ रुपए प्रयोग पर खर्च किए हैं

डॉक्टर अर्चना
डॉक्टर अर्चना शर्मा के मुताबिक इंदौर के सेंटर ऑफ़ एडवांस टेकनॉलिज़ी ने इस प्रयोग के लिए चुंबक बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने एक्सलरेटर तो बनाए ही हैं साथ ही विशालकाय कंप्यूटिंग प्रणाली बनाने में भी मदद की है जिसे एक नए नेटवर्क से पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के कंप्यूटरों से जोड़ा गया है.
प्रयोग में इस्तेमाल हो रहा इलेक्ट्रॉनिक चिप (मानस चिप) कोलकाता में विकसित होकर यहाँ आया है.
इसके अलावा भारत का टाटा संस्थान, पंजाब विश्वविद्यालय और दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत कई संस्थान प्रयोग से जुड़े रहे हैं.
भारत का योगदान
डॉक्टर अर्चना शर्मा सर्न से जुड़ी हुई हैं
इस प्रयोग में भारतीय वैज्ञानिकों ने तो अपना लोहा मनवाया ही है, सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में भी योगदान दिया है लेकिन भारत सरकार ने बड़ी धनराशि भी इसमें लगाई है.
डाक्टर अर्चना के मुताबिक भारत सरकार ने लभगभ ढाई करोड़ रुपए प्रयोग पर खर्च किए हैं. उम्मीद जताई है कि जब प्रयोग के नतीजों का अध्ययन होगा तो दूसरे देशों समेत भारत को इसके अध्ययन से फ़ायदा मिलेगा.
इस महाप्रयोग से भारत का नाता सिर्फ़ तकनीक, वित्तीय और वैज्ञानिक स्तर पर ही नहीं है. सर्न में जो चंद धार्मिक प्रतिमाएँ लगी हैं उमसें एक नटराज की मूर्ति है.
भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग ने नटराज की एक मूर्ति सर्न को तोहफ़े में दी थी और उसका बड़ा सांकेतिक महत्व है.
डॉक्टर अर्चना बताती हैं, "दरअसल नटराज की मूर्ति में आलौकिक नृत्य या कॉस्मिक डांस दिखाया गया है और हम लोग भी कॉस्मिक ऊर्जा का ही अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं. ज़ाहिर ही ये मूर्ति प्रयोग के लिए बहुत प्रासंगिक है."
डॉक्टर अर्चना ये तो मानती हैं कि इस मूर्ति का वहाँ होना किसी भी भारतीय के लिए गर्व की बात है. लेकिन वे इसे विज्ञान को धर्म से जोड़ने की कोशिश नहीं मानतीं. उनके लिए ये मात्र अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक प्रतीक मात्र है.
वाकई ये प्रयोग एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय योजना है जिसमें 70-80 देशों के संसाधन, पैसा और हुनर लगा हुआ है और मकसद सबका एक ही है.
नतीजे क्या और कब तक निकलेंगे ठीक से कोई नहीं जानता, रास्ता आसान नहीं है. लेकिन जैसे डॉक्टर अर्चना कहती हैं कि नामुमकिन कुछ भी नहीं...

प्रलय नहीं, सृजन की ओर बढ़ा पहला कदम

ब्रह्मांड बनने की गुत्थी सुलझाने के लिए अब तक का सबसे महत्वपूर्ण , सबसे खर्चीला और सबसे बड़ा भौतिक प्रयोग सफलतापूर्वक शुरू हो गया। फ्रांस और स्विट्जरलैंड की सीमा पर स्थित सीईआरएन लैब में बुधवार को स्थानीय समय के मुताबिक सुबह 9: 30 बजे दुनिया भर के लगभग 9 हजार वैज्ञानिकों ने यह महाप्रयोग शुरू किया। इन वैज्ञानिकों में लगभग 200 भारतीय मूल के हैं। वैज्ञानिकों ने सुरंग में प्रोटॉन की एक बीम छोड़ी। पहले ये प्रोटॉन घड़ी की सुइयों के घूमने की दिशा में घूमेंगे उसके बाद उन्हें दूसरी दिशा में छोड़ा जाएगा। इसके बाद कहीं जाकर उन्हें एक साथ छोड़ा जाएगा और प्रोटॉनों की टक्कर होगी। लगभग 30 साल पहले इस प्रयोग का विचार वैज्ञानिकों को आया था। बुधवार को उस प्रयोग का पहला कदम पूरा हुआ। 27 किलोमीटर लंबे रेस ट्रेक पर प्रोटॉन बीम को कंट्रोल करने के लिए एक हजार से ज्यादा चुंबक लगे हुए हैं। मशीन में 2 हजार से ज्यादा मैग्नेटिक सर्किट हैं। इनकी बेरोकटोक पावर सप्लाई एक बड़ी जिम्मेदारी है। यह बीम इतनी तेजी से चल रही है कि एक सेकंड में सुरंग के 11 हजार चक्कर पूरे हो रहे हैं। इस एक्सपेरिमेंट से न केवल ब्रह्मांड के रहस्य उजागर होंगे बल्कि मानवता के लिए कुछ आशा भरे संदेश भी मिलेंगे। समूची कवायद में सब - अटॉमिक पार्टीकल न्यूट्रॉन निकलेंगे। इनकी सहायता से जीवन के लिए खतरा बन चुके परमाणु कचरे से निपटने का उपाय खोजा जाएगा। इसके अलावा सीईआरएन का यह महाप्रयोग मौसम में बदलाव पर अहम जानकारी मुहैया कराएगा। इससे निकलने वाली प्रोटॉन बीम कैंसर के रोगियों का इलाज ज्यादा बेहतर और कारगर तरह से कर पाएंगी।

सौर ऊर्जा से रोशन हुए 400 गांव

बिजली की कमी आज का सबसे बड़ा संकट है। पिछले दो दशक से राजनीतिक दलों का यह प्रमुख मुद्दा है। हर आने वाली सरकार इस संकट का ठीकरा पूर्ववर्ती सरकार के सिर फोड़ती रही है। ऐसे में जिले का वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत विभाग [नेडा] ने सौर ऊर्जा से गांवों को रोशन करने की अनोखी पहल की। बात समझ में आयी तो प्रशासन ही नहीं जनप्रतिनिधियों तक ने इसमें अपने स्तर से सहयोग किया। सबकी पहल का नतीजा सामने है। आज जिले के 400 गांवों की गलियां सौर ऊर्जा से रोशन हो रही हैं।
इस उपलब्धि से उत्साहित नेडा के परियोजना अधिकारी एसडी दूबे का कहना है कि अगर इसी तरह सबका सहयोग मिलता रहा तो वित्तीय वर्ष के अंत तक जिले के हर गांव को सोलर स्ट्रीट लाइट से जोड़ दिया जाएगा। गांवों को सोलर ऊर्जा से रोशन करने की यह योजना नई नहीं है, पर उचित पहल व संसाधनों की कमी के नाते यह परवान नहीं चढ़ पा रही थी। जिला अधिकारी श्रीमती रोशन जैकब की तैनाती के बाद गांवों में सौर ऊर्जा स्ट्रीट लाइट लगाने का कार्य तेज हो गया। पहले विभाग अपने खर्च पर ही गांवों में स्ट्रीट लाइट लगा रहा था। इसको व्यापक स्वरूप देने में संसाधनों की कमी सबसे बड़ी बाधा थी। नेडा के परियोजना अधिकारी एसडी दूबे ने डीएम को इस बात से अवगत कराया। उन्होंने इसमें रुचि ली और बारहवें वित्त आयोग के तहत क्षेत्र पंचायतों को मिले धन से भी सौर ऊर्जा स्ट्रीट लाइट लगाने की अनुमति दी। साथ ही खंड विकास अधिकारियों को निर्देशित किया कि इस मद में अवशेष धनराशि से गांवों में सोलर स्ट्रीट लाइट की स्थापना करा दी जाए। इस पहल का नतीजा सामने है, जो गांव वर्तमान में सोलर स्ट्रीट लाइट से रोशन हो रहे है, उसमें सदर ब्लाक के भेलसा, पोखरभिटवा, छितही, महुआपार, रानीपुर, बेलाड़ी, परशुरामपुर विकास खंड के रोहदा, जटवलिया, नागपुर कुंवर, श्रीनगर, बनगवां, पडरी बाबू, हैदराबाद, सिकंदरपुर, भिनगवा खुर्द, हरिगांव, सल्टौवा गोपालपुर के नवोदा, बेरडिया, पिपरा जप्ती, गुरियापुर, हरदिया सहित चार सौ गांव शामिल हैं। इसके साथ ही रोज किसी न किसी क्षेत्र से इसके लिए डिमांड भी आ रही है, लेकिन हर स्ट्रीट लाइट पर 28,200 रुपये का खर्च आने से धन की कमी आड़े आ रही है। इसे दूर करने के लिए नेडा जनप्रतिनिधियों से भी सहयोग ले रहा है और अब सांसद, विधायक व ब्लाक प्रमुख भी इसमें रुचि लेने लगे है। सर्वाधिक सहयोग परशुरामपुर ब्लाक ने किया है। इस ब्लाक से दो माह के भीतर 71 गांवों में सोलर स्ट्रीट लाइटें लगीं जिनमें से 31 गांव सिर्फ परशुरामपुर ब्लाक के हैं। इस तरह इस बाबत धन उपलब्ध कराने में परशुरामपुर ब्लाक सबसे आगे रहा।
सौर ऊर्जा की यह चमक और भी तेज हो इसके लिए डीएम श्रीमती रोशन जैकब ने खंड विकास अधिकारियों को पत्र लिखा है। उन्होंने कहा कि 12वें वित्त आयोग के धन का भी उपयोग सोलर स्ट्रीट लाइट लगाने में किया जाए, जिससे धन की कमी इस अभियान में आड़े न आए।

सिर्फ दिमाग का खेल है मजाकिया होना

एक नई स्टडी से पता चला है कि व्यक्ति का मजाकिया होना एक दिमागी गुण होता है। इस्राइल के वीजमान साइंस इंस्टिट्यूट में एक इंटरनैशनल टीम ने स्टडी के बाद दावा किया कि मजाकिया प्रवृत्ति 'कॉमिडी ब्रेन सेल' की वजह से होती है। रिसर्चरों के मुताबिक, जैसे ही कोई व्यक्ति किसी कॉमिडी सीन को देखता है, उसका दिमाग ऐक्टिव हो जाता है। इसके बाद जब भी वह उस सीन को याद करता है, दिमाग वैसे ही रिऐक्ट करता है। स्टडी के दौरान मिरगी के 13 रोगियों के दिमाग का विश्लेषण किया गया। कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर में इनके दिमाग में इलेक्ट्रोड डाले गए थे। इन्हीं इलेक्ट्रोडों का इस्तेमाल दिमाग के हिप्पोकैंपस के कोशिकाओं पर नजर रखने के लिए किया जाता है। गौरतलब है कि हिन्पोकैंपस याददाश्त बनाए रखने में अहम रोल निभाता है। स्टडी में देखा गया कि जब भी लोग किसी कॉमिडी शो या मजाकिया पल को याद करते हैं, तो उनके दिमाग की खास कोशिकाएं फिर से ऐक्टिव हो जाती हैं। एक रिसर्चर प्रो. इत्जाक फ्राइड ने बताया कि सबसे अहम बात इन खास कोशिकाओं को दोबारा सक्रिय हो जाना है। कुछ मामलों में इन खास कोशिकाओं का फायरिंग रेट सामान्य परिस्थितियों से 7-8 गुना हो जाता है। प्रफेसर फ्राइड कहते हैं कि अलग-अलग कॉमिडी शो के लिए कोशिकाओं की प्रतिक्रिया अलग-अलग होती है। हिप्पोकैंपस कोशिकाएं चूहों जैसे कई अन्य जीवों में भी पाई जाती हैं। सभी जीवों में ये कोशिकाएं किसी पुरानी घटना को दोबारा याद दिलाने का काम करती हैं। फ्राइड बताते हैं कि इन पुरानी यादों में नर्व सेल्स का योगदान भी होता है। प्रक्रिया के दौरान यह भी सक्रिय हो जाती हैं।

Tuesday, September 9, 2008

परमाणु ऊर्जा

परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आने वाले 10-15 साल भारत की तकदीर बदल सकते हैं। एनएसजी में डील को मंजूरी मिलने के बाद अमेरिका, फ्रांस और रूस सहित कई अन्य देशों की बड़ी कंपनियों की बांछें खिल गई हैं।
कई भारतीय कंपनियां भी खुश हैं, क्योंकि डील होने के बाद उन्हें भी काम मिलेगा। एसोचैम और सीआईआई की मानें तो देश की 200 से ज्यादा कंपनियां परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आने को आतुर हैं। इनमें वीडियोकॉन और जिंदल पॉवर ने तो तैयारियां भी शुरू कर दी हैं।
भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते पर एनएसजी देशों की हरी झंडी मिलने के साथ ही देश के ऊर्जा बाजार का परिदृश्य एकदम बदल गया है। अगले दशक में इससे परमाणु ऊर्जा के घरेलू बाजार में कई गुना बढ़ोतरी होने की संभावनाएं पैदा हुई हैं।
क्या हैं संभावनाएं: सरकारी कंपनी न्यूक्लियर पावर कॉपरेरेशन आफ इंडिया लि. (एनपीसीआईएल) जो देश की एकमात्र अधिकृत परमाणु बिजली निर्माता कंपनी है, अगले एक दशक में घरेलू बाजार में 60,000 करोड़ रुपए (13 अरब डालर) के निवेश की संभावना देख रहा है। इसमें न सिर्फ वे अग्रणी कंपनियां शामिल हैं, जो परमाणु बिजली निर्माण के क्षेत्र में उतरने की योजनाएं बना रही हैं, बल्कि वे छोटे-बड़े निर्माता और सब कांट्रेक्टर भी शामिल हैं, जो परमाणु ऊर्जा उपकरण निर्माण के क्षेत्र में उतरना चाह रहे हैं।
ये कंपनियां लगी हैं लाइन में
इस क्षेत्र में सरकारी कंपनी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लि. (भेल) और देश की नंबर एक इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन टूब्रो हैं। बीएचईएल का एनपीसीआईएल के साथ 700 और 1,000 मेगावाट क्षमता वाले परमाणु रिएक्टर बनाने का संयुक्त उद्यम पहले से है जबकि एलएंडटी और एनपीसीआईएल एक फरो्िजग यूनिट के उद्यम के लिए योजना तैयार कर रहे हैं। इनके अलावा रिलायंस एनर्जी, टाटा पावर, सीमेंस, जीएमआर, अरेवा टीएंडडी और एलस्टोम प्रोजेक्ट्स समेत कई कंपनियां भी परमाणु बिजली निर्माण क्षेत्र में उतरने की योजनाएं बना रही हैं।
करार से क्या फायदा>> भारत न्यूक्लियर रिएक्टर के मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में उभर सकता है।>> भारत को थोरियम प्रोसेस की प्रौद्योगिकी मिल जाएगी।>> परमाणु बिजली संयंत्र स्थापित करने में 5-6 वर्ष लगते हैं, इसमें कमी आएगी।>> इस संयंत्र को स्थापित करने की लागत 6 करोड़ रुपए है, इसमें कमी आएगी।>> भारत को अधिक यूरेनियम मिलेगा।
एक किलो ईधन से कितनी ऊर्जा?कोयला - 3 किलोवाटतेल - 4 किलोवाटयूरेनियम - 50,000 किलोवाटप्लूटोनियम - 60,000,000 किलोवाट
एक दशक का लक्ष्यएनपीसीआईएल के डायरेक्टर फाइनेंस जे.के. घई के अनुसार समझौते के अस्तित्व में आने और परमाणु ऊर्जा अधिनियम में संशोधन के बाद भारत 2018 तक 10,000 मेगावाट परमाणु बिजली पैदा करने की क्षमता हासिल कर सकता है। इसके लिए अगले एक दशक में 60,000 करोड़ रुपए के प्रत्यक्ष निवेश की संभावनाएं पैदा होंगी। अप्रत्यक्ष रूप से निवेश और अधिक होगा क्योंकि कई कंपनियों को परमाणु बिजली संयंत्र के उपकरण बनाने की प्रौद्योगिकी हासिल करनी होगी।

Monday, September 8, 2008

पीड़ा सृजन की जननी

आजकल प्रतिस्पद्र्धाओं और प्रतियोगिताओं का दौर है। इसके दबाव से आज स्कूल का छोटा बच्चा भी प्रभावित है। कभी-कभी इस दबाव से उसका जीवन के प्रति उत्साह कम हो जाता है और अपनी नकारात्मक सोच के कारण वह आत्महत्या तक कर बैठता है। हर वर्ष बोर्ड की परीक्षा में असफल बच्चों के घर वापस न लौटने या आत्महत्या के उदाहरण सामने आते रहते है। यह समस्या मात्र बच्चों की ही नहीं, बड़ों की भी है। इसका मुख्य कारण हार या असफलता के प्रति उनकी नकारात्मक सोच है। दरअसल, असफलता में ही सफलता छिपी होती है। हार में ही जीत के अवसर छिपे होते है। असफल होना अलग बात है और हार कर बैठ जाना बिल्कुल अलग बात। कौन, कब, कहां असफल नहीं होता? सच तो यही है कि हर कोई कहीं न कहीं जीवन में असफल अवश्य होता है, दुख तकलीफ से रूबरू जरूर होता है। लेकिन जीवन में आगे वही बढ़ते हैं, जो अपनी असफलताओं से सीख लेते है। राह के रोड़े को सीढ़ी के पायदान की तरह इस्तेमाल करते है। ध्यान रखें कि बिना शूली चढ़े जीसस नहीं हुआ जा सकता है। विष का पान किए बिना शिव नहीं हुआ जा सकता। बिना त्याग के बुद्ध नहीं बना जा सकता है। कोई भी उपलब्धि पाने के लिए परीक्षा जरूरी है। बिना परीक्षा के उत्तीर्ण नहीं हुआ जा सकता है। तकलीफें किसके मार्ग में नहीं आतीं? कष्ट किसकी झोली में नहीं आते? जो जितना ऊंचा होता है, वह भीतर उतना ही गहरा होता है। गहरे जाना ऊपर उठने का मार्ग है। पीछे खिसकना आगे आने की तैयारी है। आग से ही गुजरकर सोना कुंदन बनता है। धान की कैद से निकलकर ही चावल महकता है। सच तो यह है कि पीड़ा माध्यम है सृजन और सौंदर्य का। स्त्री और प्रकृति दोनों गहरी पीड़ा और लंबे धैर्य से गुजरकर ही सृजन करने में सक्षम हो पाती है। छांव देने वाला वृक्ष सदा धूप में खड़ा रहता है, यदि वृक्ष धूप से नाता तोड़ ले, तो कभी छांव नहीं दे पाएगा। इसका मतलब यह है कि देने वाले को स्वयं का त्याग करना ही पड़ता है। छांव देने वाला सदा जलता है। पार लगाने वाले को लहरों से संघर्ष करना ही पड़ता है।
पीड़ा जननी है सौंदर्य की। फिर वह संघर्ष के रूप में हो या चुनौती के रूप में, श्रम के रूप में हो या इंतजार के रूप में। अत्यधिक पीड़ा यानी अत्यधिक सुख। कहते है कि रात जितनी गहरी होती है, सुबह उतनी ही करीब होती है। कड़वाहट और कसैलापन से गुजरकर ही फल मीठा और खाने लायक बनता है। बिना अनुभव ज्ञान संभव नहीं होता है और बिना बोध के रूपांतरण नहीं हो सकता है।
रूपांतरण के लिए समय, दौर या घटना से गुजरना जरूरी होता है। मुश्किलें सामने आने पर ही हम उनका मुकाबला करना सीखते हैं। यदि हम अपने जीवन की सबसे बहुमूल्य या प्रिय वस्तु खो देते है, तो उसके बाद हमें कोई अन्य बात दुख नहीं पहुंचा पाती है। ऐसा नहीं है कि जीवन में फिर उतार-चढ़ाव आने बंद हो जाते है।
तकलीफें आती है, पर हमें छू नहीं पाती है, क्योंकि हम उस बात से, जो हमारे लिए सर्वाधिक असहनीय थी, उस पीड़ा से रूबरू हो चुके होते है। मानव जीवन के लिए दुख- तकलीफ, पीड़ा आदि उसके दुश्मन नहीं है, लेकिन उनसे गुजरकर ही सुख की प्राप्ति की जा सकती है।

अब कुतुबमीनार परिसर में आसानी से आ-जा सकेंगे विकलांग


भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण शारीरिक रूप से लाचार, विकलांग, बुजुर्गो और गर्भवती महिलाओं पर मेहरबान होने जा रहा है। बहुत जल्द ये लोग सैकड़ों बरस पहले बने विश्वप्रसिद्ध स्मारकों को बिल्कुल करीब से निहार सकेंगे। ऐसा लकड़ी की रैंप बनने से संभव होगा जिसकी शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली की कुतुबमीनार से हो रही है। सब ठीक रहा तो सितंबर के अंत तक कुतुबमीनार देखने आने वाले विकलांग व्यक्ति किसी का हाथ पकड़ने या सहारा ढूंढने के बजाय खुद व्हीलचेयर पर बैठ चप्पे-चप्पे तक घूम-फिर सकेंगे। इसके बाद ये सुविधा लालकिला समेत देश के कुछ अन्य चुनिंदा स्मारकों में भी मुहैया कराने की भी योजना है। ऐसा स्वयं नामक एनजीओ की मदद से संभव हुआ है, जिसकी तस्दीक एएसआई के दिल्ली सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद् केके मोहम्मद करते हैं।
श्री मोहम्मद कहते हैं कि देखने में आया है कि एक उम्र पर पहुंचने के बाद लोगों को चलने-फिरने में इतनी दिक्कत होती है कि उनके लिए सीढि़यां चढ़ना-उतरना मुश्किल हो जाता है। विकलांगों के अलावा यही स्थिति गर्भवती महिलाओं और लकवे के शिकार या अन्य अक्षम लोगों की भी होती है। हाथ-पांव से लाचार व्यक्ति कुतुबमीनार परिसर आने के बाद भी अंदर घुस नहीं पाता। इसके मद्देनजर स्वयं संस्था के सहयोग से कुछ दिनों से कुतुबमीनार में कोने-कोने तक व्हील चेयर पर बैठने वाले विकलांगों को पहुंचाने की खातिर लोहे के बेस वाला लकड़ी का रैंप लगाया जा रहा है। इस संबंध में स्वयं संस्था की संस्थापक अध्यक्षा स्मिनू जिंदल का कहना है कि उनका संगठन एएसआई को स्मारकों में रैंप बनाने के लिए कंसलटेंट की भूमिका निभा रहा है। यहां कुल पांच रैंप बनेंगे। कुतुबमीनार में व्हीलचेयर पर बैठे व्यक्ति को देखते हुए टिकट खिड़की को कुछ नीचे बनाया गया है। व्यवस्था ऐसी है कि पार्किग क्षेत्र में वाहन से उतरने के फौरन बाद से विकलांगों के लिए अलग टिकट खिड़की और सुविधाजनक शौचालय भी बनाए गए हैं। कुतुबमीनार परिसर में नेत्रहीनों के लिए पैकटाइल पाथवे भी बना है। लालकिला और आगरा के ताजमहल समेत गोवा के दो चुनिंदा व‌र्ल्ड हेरिटेज स्थलों में भी रैंप की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। लालकिला में पब्लिक पार्किग के पास ये काम शुरू भी हो चुका है।

Saturday, September 6, 2008

भूखी जनता नेताओं से मारपीट पर उतरी

मधुरेश, सहरसा: बाढ़ की मार से त्रस्त और भूखी जनता अब नेताओं के साथ मारपीट पर उतर आई है। लेकिन नेताओं की अदा नहीं बदली है। वे जनता का कल्याण करने पर आमादा हैं। नेताओं के प्रति जो गुस्सा है, दो राय नहीं कि किसी दिन कोई बड़ी घटना हो जाएगी। बाढ़ की मार झेल रही जनता के निशाने पर जनप्रतिनिधि हैं। नरपतगंज के विधायक जनार्दन यादव की जबरदस्त पिटाई हुई। डर से अधिकांश जनप्रतिनिधि भागे फिर रहे हैं। एक मायने में जनता का गुस्सा स्वाभाविक भी है। सांसद सुखदेव पासवान का घर नरपतगंज क्षेत्र में है। उनके गांव के बांध को आम लोगों ने मिलकर बचाया। बेशक लोगों को इससे अपना फायदा भी था। बांध उनको भी सुरक्षित रखता। मगर इस विकट कार्य में सांसद या उनके आगे-पीछे घूमने वालों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। सिंघेश्वर के विधायक रामेश्वर यादव के साथ भी मारपीट हुई है, लेकिन नेताओं की टोली चेत नहीं रही है।

जहां धूप हो, वहीं घूम जाता है यह मकान

ऐसे में जबकि ऊर्जा की कीमतें बेतहाशा बढ़ रही हैं, बेल्जियम में एक कोयला व्यापारी से बिल्डर बने फ्रेंकोइस मसाऊ के द्वारा ईजाद किया गया घूमने वाला मकान आज दुनिया को ऊर्जा की बचत की सीख दे रहा है। मसाऊ की मृत्यु 2002 में 97 साल की उम्र में हुई थी। 1958 में, जब कुछ ही लोग इकॉलजी या ऊर्जा संरक्षण के बारे में जानते थे, मसाऊ ने घूमने वाला (रिवॉल्विंग हाउस) बनाया था। मसाऊ द्वारा सबसे पहले बनाए गए घुमंतू मकान की आधारशिला ईंट और कंक्रीट से बनी है जिसका आकार गोल है। इसे स्टील से बने एक ट्रैक का सहारा है, जिस पर यह एक छोटी इलेक्ट्रिक मोटर के जरिए घूमता है। इस मकान को उसने अपनी बीमार स्कूल टीचर पत्नी को ध्यान में रखकर बनाया था ताकि वह दिन और साल में कभी भी धूप के प्रकाश और उसकी गर्मी ले सकें। बेल्जियम में इन दोनों की चीजों की कमी रहती है। बढ़ती ऊर्जा कीमतों के इस दौर में घूमने वाली इमारतों का फैशन है। साउथ जर्मनी के रोल्फ डिश सौर ऊर्जा से चालित घूमने वाला मकान बना चुके हैं। इसी तरह इटैलियन आर्किटेक्ट डेविड फिशर का प्लान दुबई में 80 मंजिला रोटेटिंग डायनमिक टावर बनाने का है। कुछ लोग इसे सनफ्लॉवर आर्किटेक्चर भी कह रहे हैं। मसाऊ द्वारा ईजाद की गई तकनीक इतनी शानदार और असरदार थी कि यह आज भी काम करती है। उन्होंने जो भी 3 घुमंतू मकान बनाए थे, वे सभी आज तक इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं। इनमें से एक घर तो जल्द ही 50वां स्थापना वर्ष पूरा कर लेगा। मसाऊ के बारे में लिखने वाले एक रिटायर्ड पत्रकार गाय ओटन ने बताया कि मसाऊ की इस कोशिश को कभी भी प्रोत्साहन नहीं मिला। उसने ये खास मकान अपने हाथों से अकेले ही बनाए। यहां तक कि उसके पास इस पर खर्च के लिए पैसे भी नहीं थे।