Wednesday, September 2, 2009

जीती-जागती प्रयोगशाला बना एक किसान

उन्हें ऐसे दौर में करोड़पति किसान होने का तमगा मिला, जब कर्ज और हताशा में डूबे किसानों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं अक्सर सुर्खियों में रहती थीं। हजारों किसानों ने अनुयायी बनकर, तो सरकारों ने सम्मानित करके उनके प्रयोगधर्मी जज्बे को मान्यता दी, यद्यपि दौलतपुर [बाराबंकी] के किसान राम सरन वर्मा के लिए अब ये उपलब्धिया मामूली और गुजरी घटनाएं हैं।
ताजा खबर यह है कि दसवीं फेल राम सरन की मुश्किल से डेढ़ दशक की प्रगति यात्रा अब देश-विदेश के कृषि वैज्ञानिकों के लिए हैरत व जिज्ञासा का विषय है, तो उनका मनमोहक फार्म आईआईएम जैसे शीर्ष प्रबंधन संस्थान के शिक्षकों-छात्रों के लिए जीवंत प्रोजेक्ट। हजारों किसानों के लिए तो खैर वह रोल माडल हैं ही। सिंगापुर के बैरी बिल, चिली के डा. फार्बर्ड यूसुफ, ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी यूएसए के प्रो. डी पी एस वर्मा और नेपाल एग्रीकल्चर रिसर्च काउंसिल के महेंद्र जंग थापा ने दौलतपुर पहुंचकर जो चमत्कार देखा, उस पर भारतीय किसानों के हालात को लेकर प्रचलित धारणा के कारण विश्वास करना कठिन था। उनके विजिटर्स रजिस्टरों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान व महाराष्ट्र के कई हजार किसानों, यूपी के तमाम अधिकारियों, राजनीतिज्ञों, मीडियाकर्मियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा देश के शीर्ष कृषि शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों, आईआईएम लखनऊ केशिक्षकों व छात्रों तथा भारत सरकार के अधिकारियों के नाम भरे पड़े हैं। रजिस्टरों में दर्ज विशेषज्ञों की टिप्पणिया राम सरन के लिए उनके बैंक बैलेंस से कम अहमियत नहीं रखतीं।
उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक प्रो. चंद्रिका प्रसाद कहते हैं कि राम सरन की लगन व ललक प्रेरक है। वह कृषि के आर्थिक पहलू पर हमेशा नजर रखते हैं। यही वजह है कि पंद्रह वर्ष पहले जब बाराबंकी के किसानों पर मेंथा उत्पादन की भेड़चाल हावी थी, उस समय राम सरन ने केला, टमाटर व आलू की खेती का गैर-पारंपरिक फसल चक्र अपनाया। 1995 तक गेहूं-धान की परंपरागत खेती में खपकर बाकी किसानों की तरह तंगहाली झेलने वाले राम सरन ने इधर-उधर से गुर सीखकर पहले केला, फिर टमाटर, आलू, हरी खाद, गेहूं और केला की खेती का ऐसा करिश्माई तीन वर्षीय फसल चक्र विकसित किया, जिसने न सिर्फ उनकी, बल्कि आसपास के जिलों के करीब तीन हजार किसानों की जिंदगी का नक्शा ही बदल दिया। 90 एकड़ के फार्म में उनकी निजी जमीन सिर्फ छह एकड़ है, बाकी गाव के दूसरे किसानों की।
कृषि विज्ञान संस्थान, बीएचयू के वैज्ञानिक डा. हरिकेश बहादुर सिंह कहते हैं कि राम सरन आख मूंदकर किसी की राय नहीं मानते, भले ही राय देने वाला चोटी का वैज्ञानिक ही क्यों न हो। वह अपने खेतों में खुद प्रयोग करके निष्कर्ष पर पहुंचते हैं और उस अनुभव के आधार पर ही आगे बढ़ते हैं। राम सरन के पास सुख-सुविधा के सारे साधन हैं, पर उनकी ख्वाहिश है कि हर किसान उनकी तरह समृद्ध हो। सुबह से शाम तक शायद ही कोई वक्त होता है, जब उनके फार्म में आसपास या बाहर के दस-बीस किसान मौजूद नहीं होते। वह किसानों को खेती की बारीकिया सिखाते हैं। अपने फार्म पर ही वह बगैर सरकारी मदद कई बार किसान मेला आयोजित कर चके हैं, जिनमें हजारों किसान खेती के गुर सीख चुके हैं।
उनकी अपने फार्म पर ही एक ऐसा प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने की योजना है, जहा किसान एक-दो दिन ठहरकर खेती के व्यावहारिक तौर-तरीके अच्छी तरह से सीख सकें। एनबीआरआई लखनऊ के वैज्ञानिक डा. आर एस कटियार कहते हैं कि बेहतरी के लिए हर क्षण बदलाव की व्याकुलता राम सरन की खासियत है। इस मुकाम पर पहुंचने के बावजूद वह आज भी साधारण किसान की तरह खुद अपने खेतों में बेझिझक काम करते हैं, तो उन्हें आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है।

5 comments:

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत बढ़िया जानकारी ! हमारे देश में राम शरण जी जैसे किसानो की बहुत जरुरत है |

श्यामल सुमन said...

सार्थक जानकारी दी आपने। प्रेरक प्रसंग। लेकिन अपने देश की हालत तो यह है कि-

फर्क नहीं पड़ता शासन को जब किसान भूखे मरते
शेयर के बढ़ने घटने से सत्ता-खेल बिगड़ता है

संगीता पुरी said...

एक किसान अपने बलबूते पर इतना कर पा रहा है .. और हमारे इतने सारे कृषि वैज्ञानिक आंखे मूंदे बैठे हैं .. समझ में नहीं आता .. सरकारी नौकरियों में जाने के बाद प्रतिभा समाप्‍त क्‍यूं हो जाती है ?

Nirmla Kapila said...

बहुत बडिया जानकारी है और सब किसानों के लिये प्रेरणास्त्रोत आभार

राज भाटिय़ा said...

ऎसे मोती तो हमारे देश मै भरे पडे है, सलाम है इस वीर किसान को, ओर आप का धन्यवाद