Sunday, November 1, 2009

छोटी सी उम्र में रद्दी की बदल दी तकदीर

प्रस्तुति - दैनिक भास्कर

रायगढ़. रद्दी कागजों को गला कर फिर से नए कलेवर में सजाया जाता है। इसके बाद रंग-रोगन कर बनाए जाते हैं, घरेलू उपयोग में आने वाले ढेरों बर्तन। इन रद्दी कागजों को इस तरह आकार देकर महज आठ साल की ऋषिका श्रीवास्तव आर्टीफिशियल गमले, ट्रे, कपड़े रखने की टोकरियां, सहित ढेरों सजावट के सामान बनाती है।



कागज से बनी ये कलाकृतियां व सामान घर में न केवल सजावट के सामानों रूप में घरों की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि पालीथीन व प्लास्टिक जैसे नष्ट न होने वाले पदाथोर्ं के सामने रिसायकलिंग कागज अच्छा सब्टीटच्यूट साबित हो रहे हैं। वहीं मार्डन स्कूल में क्लास फोर की छात्रा ऋषिका इस कला के लिए अपने पिता को प्रेरणा स्त्रोत मानती है। जिनके मार्गदर्शन में पढ़ाई के साथ वह इस कला को डेवलप कर रहीं हैं।

नहीं बेचना चाहते हैं कला

ऋषिका के पिता प्रतुल श्रीवास्तव ने बताया कि वह रद्दी कागजों से उपयोगी सामान बनाने की यह कला बहुत ही आसान है। इससे घरेलू उपयोग में आने वाली बहुतेरी सामग्रियां बनाई जाती हैं। उनका मकसद इस कला को घर-घर तक पहुंचाना है लेकिन वे इस कला को बेच इसे रोजगार का तरीका नहीं बनाना चाहते। उनका कहना है कि लोग पालीथीन व प्लास्टिक जैसे पदार्थों का प्रयोग बंद कर, इसे आसानी से अपना सकते हैं।

बिन लागत बनते हैं बर्तन

कागज के बर्तन बनाने वाली ऋषिका ने बर्तन व सामान बनाने की विधि को बहुत सरल बताती हैं। जिसके लिए पहले रद्दी कागजों का चूरा बना कर पानी में भिगो दिया जाता है। छह घंटो बाद गले हुए कागजों की लेई बना कर किसी भी सांचे में डाल कर छोड़ दिया जाता है। छह दिनों बाद सूख जाने पर बर्तन खुद ही ढाले गए पात्र से बहर निकल जाता है। जिसके बाद इसे रंग-रोगन कर सुन्दर कलाकृति में तब्दील कर लिया जाता है।

1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत रोचक पोस्ट है।आभार।