Monday, November 2, 2009

आरटीआई की मदद से अफसर बनी नेत्रहीन रंजू

स्रोत - जागरण

सूचना का अधिकार यानी आरटीआई यानी राइट टू इनफारमेशन महज जानकारी प्राप्त करने का जरिया नहीं, बल्कि यह किसी के जीवन में सौभाग्य का दरवाजा भी खोल सकता है। शर्त सिर्फ यह कि व्यक्ति में लक्ष्य हासिल करने का जज्बा हो और इसी जज्बे को दिखाया है जमशेदपुर में पली-बढ़ी रंजू कुमारी ने।

आरटीआई का उपयोग कर रंजू झारखंड सरकार में वाणिज्य कर अधिकारी बनने में कामयाब हुई है और अपने जज्बा का झंडा गाड़ा। सोने पर सुहागा यह कि उसने यह कार्य नेत्रहीन होने के बावजूद किया। कामयाबी का कदम छूने में विकलांगता बाधक नहीं बन सकी। डालटेनगंज के मूल निवासी और झारखंड सरकार में इंजीनियर अपने पिता राजेन्द्र प्रसाद और घरेलू महिला माता से 'सुन-सुन कर' शिक्षा-दीक्षा हासिल करने वाली रंजू कभी स्कूल नहीं गई।

प्राइवेट छात्रा के रूप में पढ़ाई करती गई और बीएड करने के बाद राजनीति विज्ञान में एमए की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की। इसके बाद ही आया उसके जीवन में नया मोड़। झारखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षा में वह बैठी, इस उम्मीद के साथ कि शारीरिक विकलांग लोगों के तीन प्रतिशत आरक्षण का लाभ शायद उसे भी मिल जाए। लिखित परीक्षा उसने निकाल ली। पर इंटरव्यू के लिए बुलावा नहीं आया। उसके जेहन में यह सवाल बना रहा कि आखिर कौन-कौन लोग इंटरव्यू के बुलाए गए और कितने प्रतिशत अंक मिले थे। सवाल का जवाब कहीं से नहीं मिल रहा था। घटना 2007 की है। इसी बीच सूचना का अधिकार कानून बन चुका था। इसी बीच झारखंड विकलांग मंच की मदद से उसने सूचना के अधिकार के तहत जेपीएससी से जानकारी मांगी कि उक्त परीक्षा में तीन प्रतिशत आरक्षण का लाभ किन-किन अभ्यर्थियों को मिला।

पहले तो जानकारी देने में जेपीएससी ने काफी आनाकानी की, लेकिन रंजू ने हिम्मत नहीं हारी। राज्य सूचना आयोग तक वह गयी। सूचना आयुक्त बैजनाथ मिश्र का पूरा सहयोग मिला। बाध्य होकर जेपीएससी ने यह सूचना दी कि तीन प्रतिशत आरक्षण के तहत किसी अभ्यर्थी का चयन नहीं हुआ। रंजू ने फिर आरटीआई का सहारा लिया। पूछा कि संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन क्यों और कैसे हो गया? तब जेपीएससी को अपने चूक का अहसास हुआ। आनन-फानन में विकलांग कोटे से 15 अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। संयोग से इनमें रंजू भी एक थी। इसके भाग्य ने यहां फिर साथ दिया। उसका चयन हो गया। आज वह जमशेदपुर में वाणिज्य कर अधिकारी के रूप में कार्यरत है। आरटीआई के तहत एक साल की लड़ाई के बाद उसे सफलता मिली।

रंजू के मुताबिक समाज से उसे कोई शिकायत नहीं, लोगों से कोई गिला नहीं। विकलांगता को वह अभिशाप नहीं मानती। उसका स्पष्ट मानना है कि यदि इरादा पक्का हो तो कोई काम मुश्किल नहीं। उसके मुताबिक आरटीआई ने नारी सशक्तीकरण को नया जोश दिया है। वह बताती है कि हर किसी को आरटीआई का उपयोग करना चाहिये। इस कानून में असीम शक्ति है। इसका दायरा इतना विस्तृत है कि उसे बयां नहीं किया जा सकता। रंजू के मुताबिक उसे जब और जहां मौका मिलता है आरटीआई को लेकर जागरूकता अभियान चलाती है।

झारखंड आरटीआई फोरम और सिटीजन क्लब ने आरटीआई की चौथी वर्षगांठ पर रंजू के जज्बे को सलाम करते हुए उसे सम्मानित किया। रंजू राज्य उन चुनिंदा 50 लोगों में शामिल थी। जिन्हें आरटीआई अवार्ड प्रदान किया गया। रंजू के मामा और रांची मारवाड़ी कालेज में भौतिकी के प्रोफेसर डा. जेएल अग्रवाल रंजू को मिले सम्मान को बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं। उनके मुताबिक समाज के लिए यह एक उदाहरण है। डा. अग्रवाल के अनुसार रंजू ने एक नई रहा दिखाई है। जिस पर चलकर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में नया आयाम जोड़ सकता है।

2 comments:

Suresh Chiplunkar said...

रंजू को मेरा सलाम और बधाईयाँ… ऐसी जागरुकता की आवश्यकता है…

राज भाटिय़ा said...

रंजू को मेरा भी सलाम, काश हम सब मै ऎसी ही लगन हो. आप का धन्यवाद