Saturday, June 20, 2009

रोज बोलेंगे- गर्व है, मैं भारतीय हूं

प्रस्तुति - दैनिक भास्कर
जयपुर. राजस्थान में राज्य मानवाधिकार आयोग की अनूठी पहल के तहत प्रदेश के करीब 8 लाख अधिकारियों-कर्मचारियों को अब दफ्तरों में अपना कामकाज शुरू करने से पहले राष्ट्रीय कर्तव्य दोहराने को कहा गया है। कुछ सरकारी दफ्तरों और कर्मचारी संगठनों ने इस पर अमल भी शुरू कर दिया है।
अभियान के तहत हर कर्मचारी-अधिकारी को ‘मुझे गर्व है, मैं भारतीय हूं और कर्तव्यनिष्ठा से अपना हर काम करूंगा..’ जैसे संकल्प के साथ राष्ट्रीय भावना की अलख जगाई जाएगी।
ये है आयोग का दैनिक संकल्प
संविधान, राष्ट्रध्वज व राष्ट्रगान का आदर करूंगा।
राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो का पालन करूंगा।
देश की एकता-अखंडता और प्रभुता की एवं वन, झील, नदी और वन्य जीव की रक्षा करूंगा।
राष्ट्र की सेवा करूंगा।
स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का एवं धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग के आधार पर भेदभाव का त्याग करूंगा।
प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखूंगा।
हिंसा से दूर रहूंगा।
सार्वजनिक संपत्ति की संरक्षा करूंगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का, मानववाद का, सुधार की भावना का विकास करूंगा।
भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करूंगा।
व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों के क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का प्रयास करूंगा।

Thursday, June 18, 2009

युवाओं ने दी मंदी को मात


प्रस्तुति - दैनिक भास्कर
इंदौर. दुनियाभर में मंदी का माहौल है। कुछ क्षेत्रों में स्टूडेंट्स को नए जॉब नहीं मिल पा रहे हैं। कई जगह कर्मचारियों की संख्या कम की गई है तो कुछ स्थानों पर सैलेरी कम कर दी गई है। ऐसी परिस्थिति में शहर के युवाओं ने काबिलियत के बल पर कामयाबी की नई इबारत लिखी है। इनके जुनून के आगे मंदी भी हार गई।
मंदी की वजह से आईटी सहित कुछ क्षेत्रों में जॉब हासिल करने में अभी भी थोड़ी परेशानी आ रही है। देश में हालत तेजी से सुधर रहे हैं लेकिन आउट सोर्सिग में कमी आने से परेशानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हालांकि शहर के युवा इससे हताश नहीं हुए बल्कि मेहनत के बूते अपनी तकदीर खुद लिखने का फैसला किया, जिसमें ज्यादातर सफल रहे।
शौक को बनाया सफलता का जरिया- एमबीए पूरा हो चुका था। पढाई के बाद कई इंस्टिट्यूट में जॉब के लिए ट्राय किया लेकिन बात नहीं बनी। मैंने घर के बिजनेस और अपने शौक को डेवलप किया। पढ़ाने का शौक था इसलिए एक इंस्टिट्यूट में पीडी व मैनेजमेंट की क्लास लेने लगा।
फार्मा कम्पनी से जुड़े रोहित सृजन कहते हैं मार्केटिंग का नॉलेज था इसलिए खुद की फर्म में प्रोडक्शन से मार्केटिंग तक का सारा काम किया। एक रिटेल आउटलेट में भी काम कर रहा हूं। अब मैं सुबह 5 से रात 10 बजे तक फ्री नहीं रह पाता। इंदौर में फार्मा का मार्केटिंग ऑफिस खोला है, जहां से हम मुंबई, दिल्ली, राजस्थान आदि जगहों पर वैल्यू पैड पार्सल के जरिये सप्लाय कर रहे हैं।
दोगुना सैलेरी में जॉब मिला- कॉलेज के साथ ही मेरा जॉब एक प्राइवेट बैंक में लग गया था मुझे मार्केटिंग पसंद थी इसलिए मैने भी पढ़ाई के साथ नौकरी पसंद की। कनाडिया रोड निवासी अनिल पांडे बताते हैं मेरे पास एमफिल की डिग्री है। मंदी के दौर में बैंक भी घाटे में जाने लगी मेरे साथ जितने लोगों की भर्ती हुई थी, सभी की एक साथ नौकरी छीन गई। कुछ दिनों तक बुरा लगा लेकिन इस फैसले के पीछे मेरी तरक्की ही छिपी थी। नौकरी जाने के दो महीने में ही एक कॉलेज में लेक्चरार का जॉब दोगुना सैलेरी में मिल गया। अब मैं स्टूडेंट्स को भी यही सीख देता हूं कि मंदी को तरक्की में बाधक न बनने दें।
काबिलियत के दम पर मिली मंजिल - पढ़ाई के साथ मैं जॉब भी करना चाहता था। दो साल आईटी कंपनी में बतौर ट्रेनी काम किया। मन नहीं लगा तो जॉब छोड़ दिया। कॉलेज में क्लेरिकल जॉब की। रिसेशन के दौर में कुछ क्रिएटिव करना था। कम्प्यूटर का टेक्निकल नॉलेज था इसलिए खुद की फर्म खोल ली। मनीष मित्तल कहते हैं मैंने हार नहीं मानी और पूरे जोश के साथ काम करना शुरूकिया। कम समय में ही अच्छा मुकाम हासिल कर लिया है। मेरी फर्म सफलतापूर्वक चल रही है।
खुद की राह तलाशें- अमित लोनावत कहते हैं एमबीए के बाद दोस्तों के साथ कुछ क्रिएटिव करने का सोचा। नौकरी में बेस्ट परफॉर्म करने के बाद भी टिक पाना मुश्किल है जबकि मंदी का बिजनेस पर कोई असर नहीं पड़ता। मेरे कुछ दोस्त जो नौकरी कर रहे थे उनके जॉब चले गए। इसके बाद निर्णय लिया कि खुद का बिजनेस करना अच्छा है। किसी कम्पनी को फायदा पहुंचाने से अच्छा है कि अपनी क्षमताओं का उपयोग करूं। मेरे इस निर्णय के कारण आज मैं फार्मा कम्पनी में डिस्ट्रीब्यूटर हूं। मेरा मानना है कि युवाओं को खुद कोई राह निकालना चाहिए। कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मंजिल जरुर मिलती है।

Wednesday, June 17, 2009

कौन हैं ज्यां द्रेज?



बेल्जियम में जनमें ज्यां द्रेज 1979 से भारत में हैं। 2002 में इन्हें भारत की नागरिकता मिली। इकोनॉमिक्स के विद्यार्थी ज्यां ने इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिच्यूट (नई दिल्ली) से पीएचडी किया। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स सहित दुनिया के कई ख्यात विश्वविद्यालयों में वह पिछले कई दशक से विजिटिंग लेक्चरर के तौर पर काम करते रहे हैं। अर्थशास्‍त्र पर डा ज्यां द्रेज की 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के साथ मिलकर कई पुस्तकें लिखीं। ज्यां द्वारा तैयार डेढ सौ से अधिक एकैडमिक पेपर्स, रिव्यू और अर्थशास्त्र पर लेख इकोनॉमिक्स के छात्रों, शोधकर्ताओं और सरकारी नीति निर्धारकों की पसंदीदा माने जाते हैं।

आदिम जनजातियों की विनाशलीला का मूक गवाह बनते झारखंड में ज्यां द्रेज की बातें अब तो यहां के शासकों को नागवार नहीं लगनी चाहिए। सरल-शालीन लहजे में द्रेज ने उस जमीनी हकीकत की बानगी भर दी है, जिसे कलतक आम लोगों का शिगुफा बताकर अफसर-नेता कन्नी काटते रहे। राज्य में नरेगा की बदहाली के पीछे अफसर-नेता-बिचौलियों की भ्रष्ट तिकडी की फजीहत करने की बजाय, महज उनका हवाला देकर इस अर्थशास्त्री ने विकास के धंसे पहियों को गति देनेवाली चुनौतियां बताने की कोशिश की। वैसे भी पुते चेहरों पर और कालिख कोई क्यों खर्चे! लेकिन आम और खास में शायद यही अंतर होता है.. झारखंड की बदहाली ही नहीं, डा ज्यां द्रेज ने समाधान भी सुझाये हैं। नोबेल विजेता अमर्त्य सेन के साथ दर्जन भर पुस्तकों की रचना करनेवाले, लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स सहित विश्व के कई ख्यात विश्वविद्यालयों में आख्यान देते रहे आर्थिक विकास विशेषज्ञ डा ज्यां द्रेज ने प्रशासनिक सुधार से लेकर कठोर राजनीतिक निर्णय तक की अनिवार्यता बतायी। सवालों का जवाब देते हुए ज्यां कहते हैं: एक राज्य जो भ्रष्टाचार और हिंसा पर सवारी कर रहा हो, जैसा झारखंड, उसके लिये ये कठिन राजनीतिक चुनौतियां हैं।
हिंदी राज्यों में नरेगा फेल हो जाने के सवाल पर डा ज्यां अफसरशाही के आचरण को चिह्नित करते हैं। वह नक्सलियों को बाधा नहीं मानते। वह कहते हैं कि नक्सली-उपद्रव के बहाने सरकारी अफसर सुदूर आबादी की उपेक्षा करते हैं। और इधर, कानून के वही रखवाले भ्रष्टाचार और हिंसा में लिप्त पाये जा रहे हैं। शायद यही कारण है कि गांवों में अबतक शासन का ‘दमनकारी’ चेहरा ही काबिज है। ज्यां कहते हैं कि भ्रष्टाचार को परास्त करना है तो राजस्थान से सीखो!
नरेगा के आर्किटेक्‍ट कहे जाने वाले ज्यां द्रेज ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की मनमानी और राज्य में नरेगा काउंसिल की अकर्मण्यता पर बेबाक टिप्पणी की है। ज्यां स्वयं केंद्रीय नरेगा काउंसिल के सदस्य भी हैं। उन्होंने मीडिया के एक खास वर्ग को भी चिह्नित किया और यह सलाह देने से नहीं चूके कि उन्हें गहराई में जाकर खोजपरक रिपोर्टिंग करके ही निष्कर्ष प्रकाशित करना चाहिए, वही होगा समाज हित।


Jean Dreze
Jean Drèze, born in Belgium in 1959, has lived in India since 1979 and became an Indian citizen in 2002. He studied Mathematical Economics at the University of Essex and did his PhD (Economics) at the Indian Statistical Institute, New Delhi. He has taught at the London School of Economics and the Delhi School of Economics, and is currently Visiting Professor at the G.B. Pant Social Science Institute, Allahabad. He has made wide-ranging contributions to development economics and public economics, with special reference to India.

Jean DrezeJean Drèze has also made regular contributions to public debates in the mainstream media. His writings cover many aspects of economic and social development, such as elementary education, rural employment, child nutrition, health care and social security. In these writings he has attempted to combine scholarly analysis with personal insights from extensive travel, field work and social action. His experience of field work includes spending a year in a village of Moradabad district (U.P.), making frequent visits to drought-affected areas, and conducting regular field surveys with students from the Delhi School of Economics.
Jean Drèze is also an active member of the Right to Food Campaign, the National Campaign for the People’s Right to Information, and the world-wide movement for peace and disarmament.

Monday, June 8, 2009

जिनीवा की एलिजाबेथ

प्रस्तुति - नवभारत टाइम्स

स्विट्जरलैंड की यह भक्त आजकल रामेश्वरम (तमिलनाडु) के मंदिरों में चर्चा का विषय बनी हुई है। इसका नाम एलिजाबेथ िगलेर है। जिनीवा की एलिजाबेथ यहां के रामनाथस्वामी मंदिर में हर साल 4-5 लाख रुपए दान करती है। मंदिर ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष भानुमति नाचिआर ने बताया: अक्टूबर 2004 में एलिजाबेथ ने एक फैक्स भेजकर मंदिर को दान देने की बात कही थी। तब किसी ने उस पत्र का जवाब नहीं दिया।

भानुमति ने कहा जब मैं 2006 में ट्रस्टी बोर्ड का अध्यक्ष बना तो मैंने उसके पत्र को फाइलों में पड़ा देखा। मैंने उसे जवाब दिया और फिर उसने उसी साल हमारे द्वारा बताए गए एकाउंट नंबर में चार लाख भेज दिए। उसके बाद से हर साल यह सिलसिला जारी है।

भानुमति ने बताया: हमें अफसोस है कि हममें से किसी ने भी उसे देखा नहीं है। अगर वह कभी यहां आई भी है तो भगवान रामनाथस्वामी और देवी पर्वतवर्धनी के चुपचाप दर्शन कर के ही निकल गई।

इस साल इस भक्तिन ने कमाल ही कर दिया। उसने फैक्स करके इच्छा जताई कि वह एक बड़ी रकम भेजना चाहती है। भानुमति ने कहा: हमें उम्मीद नहीं थी कि यह इतनी बड़ी रकम होगी। उसने 2 करोड़ आठ लाख की रकम मंदिर के खाते में ट्रांसफर कर दी है। यह रकम इस साल 19 फरवरी को मंदिर के खाते में आई।

एलिजाबेथ ने इस रकम को खर्च करने के लिए जो निर्देश दिए थे वह हर साल की ही तरह थे। उसने कहा था: यह रकम डेली पूजा के अलावा रकम महाशिवरात्रि और रूद्र पूजा समारोह पर खर्च की जाए। हर साल 11 दिसंबर को 101 गरीब लोगों को भोजन भी कराया जाए। भानुमति ने बताया: हम उससे मिले नहीं हैं। साथ ही हम उसकी जिन्दगी में 11 दिसंबर का क्या महत्व है को भी नहीं जानते, पर उसकी इच्छा का सम्मान जरूर करते हैं।

Sunday, June 7, 2009

अमूल

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। गुजरात को- आपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन [जीसीएमएमएफ] ने 'मिशन 2020' के तहत अगले 11 सालों में अपने टर्नओवर को बढ़ाकर 27 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने की योजना बनाई है। देश की यह सबसे बड़ी सहकारी डेयरी अमूल ब्रांड के नाम से दुग्ध उत्पाद बनाती है।

लगातार तीसरे साल 6700 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल जीसीएमएमएफ ने न केवल मंदी को मात दी है, बल्कि साबित किया है कि सहकारी संस्थाएं प्रतिकूल हालात में भी लोगों की रोजी-रोटी को सुरक्षित रख सकती हैं। मिशन 2020 के लिए जीसीएमएमएफ ने दुग्ध उत्पादन क्षमता में वृद्धि कर उसे एक करोड़, 95 लाख लीटर दैनिक करने का संकल्प लिया है।

अमूल ने यह असाधारण कार्यकुशलता ऐसे समय दर्शाई है जब मंदी के कारण दुनिया भर में दूध एवं दुग्ध उत्पादों की मांग में जबरदस्त कमी देखने को मिल रही है। हाल के महीनों में सभी प्रमुख डेयरी उत्पादकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में अच्छी खासी कमी की है। इसके बावजूद अमूल ने घरेलू भारतीय बाजार में अपने आपको अच्छी तरह जमाए रखा है और किसानों को विश्वव्यापी मंदी के प्रभाव से बेअसर रखने में कामयाब हुआ है। इस तरह भारत में आर्थिक मंदी के प्रतिकूल प्रभाव को निष्प्रभावी करने में डेयरी को-आपरेटिव क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका साबित हुई है और अमूल इसका का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रहा है।

मंदी से मुकाबले के साथ अमूल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विविधीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसने शहरों में निर्माण क्षेत्र से विस्थापित होकर वापस गांव लौटे हजारों हताश-निराश मजदूरों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराकर उनमें आशा का संचार किया है। अब ये मजदूर अपने गांवों में डेयरी को-आपरेटिव सोसाइटी को दूध बेचकर अपना तथा अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। इस तरह अमूल ने जनसंख्या के सबसे संवेदनशील तथा उपेक्षित वर्ग को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की है।

इस बीच उपभोक्ताओं तक सीधी पहुंच और ब्रांड अमूल की ज्यादा से ज्यादा दृश्यता एवं उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जीसीएमएमएफ ने अमूल पार्लरों का व्यापक नेटवर्क देश के विभिन्न शहरों तथा कस्बों में बिछाया है। इस तरह के चार हजार से ज्यादा पार्लर अब तक खोले जा चुके हैं। पचास अमूल पार्लर तथा इससे भी ज्यादा अमूल आइसक्रीम स्कूपिंग पार्लर प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर खोले गए हैं। और तो और अमूल पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। पिछले दो सालों में अमूल के सदस्यों ने गुजरात में 71.65 लाख से ज्यादा वृक्ष लगाए हैं।