Sunday, September 28, 2014

बिजनस बिजनस

प्रस्तुति - नवभारत टाइम्स

# Leader
# Creative


रुटीन लाइफ की नौकरी पर निकलते वक्त हमेशा आपको लगता है कि 'कुछ' अपना करता तो ज्यादा अच्छा होता। किसी आस-पड़ोस वाले या दोस्त को बिजनस के दम पर दशकों की दौड़ बरसों में पूरा करते देखने पर लगता है कि 'कुछ' अपना करता तो अच्छा होता। यह 'कुछ' करने का आइडिया आपको रात-दिन सोने नहीं दे रहा तो अब वक्त आ चुका है। आंत्रप्रेन्योरशिप की दुनिया में एंट्री मारने को बेताब लोगों को रोड मैप दे रहे हैं अमित मिश्रा:

स्टेप 1 - वॉट इज योर आइडिया
सर जी यह बात भले ही आप कई बार सुन चुके हों कि एक आइडिया आपकी दुनिया बदल सकता है लेकिन है यह सौ फीसदी सच। आप अपने आसपास नजर दौड़ाइए और देखिए किसी एक इंसान की आइडिए ने ही दुनिया बदल रखी है। वह चाहें आपके किचन में सीटी देने वाला कुकर(इसे 20वीं सदी का सबसे बड़ा अविष्कार माना गया है) हो या भारत समेत दुनिया भर में एक नई सोसाइटी खड़ी कर देने वाला फेसबुक, सभी की शुरुआत एक आइडिए से हुई। बरसों से संजोए अपने आइडिए को परवान चढ़ाने से पहले चंद सवाल खुद से पूछें

-क्या मेरी सर्विस या प्रॉडक्ट की वाकई में किसी को जरूरत है?
-क्या इस जरूरत को पूरा करने के लिए शुरू किए बिजनस से आपको फायदा होगा?
-क्या मेरे आइडिए पर पहले से कंपनियां काम कर रही हैं अगर हां तो आप उनसे कैसे बेहतर या अलग हैं।
-क्या आइडिए को जमीन पर लाना प्रैक्टिकल तरीके से संभव है?
-मेरा आइडिया कितना लीगल है?
-क्या यह सेफ है?
-मेरा आइडिया अच्छा तो है लेकिन क्या इसे लोगों तक पहुंचाना मुमकिन है?
-इसे बनाने और इसकी मार्केटिंग में आने वाला खर्च को जुटाना क्या मुमकिन है?
-बिजनस से मुनाफा मिलने की दर इतनी होगी कि मैं सफलता से अपने आइडिए की जमीन पर जमाए रख सकूं?
-अगर बेसिक आइडिया सफल हो गया तो क्या वक्त के हिसाब से इसके और वर्जन निकालना मुमकिन होगा?
-क्या मैं अपने आइडिया को कॉपीराइट या पेटेंट के जरिए सेफ करने की स्थिति में हैं?
-कहीं मेरे आइडिया किसी दूसरे के पेटेंट या कॉपीराइट का उल्लंघन तो नहीं है?
-क्या इसके लिए कच्चा माल और मैन पावर उपलब्ध है?

अगर आपका आइडिया इन कसौटियों पर खरा नहीं उतरता तो कोई गम नहीं मतलब साफ है इसे और रिफाइन करने का वक्त निकलना पड़ेगा। अगर आइडिया फिट है तो अगला स्टेप एक्सपरिएंस सर्वे का आता है।

स्टेप 2 : क्या है एक्सपीरिएंस सर्वे
इसका मतलब है आपने आइडिए से जुड़े प्रफेशनल्स से मिलना चाहिए और उनकी इनसाइट का फायदा उठाना चाहिए। ये लोग आपके लिए मददगार साबित हो सकते हैं।

इंजीनियर: यह वक्त तकनीक का है और आपके आइडिए से जुड़े इंजीनियर से बेहतर इसके बारे में कोई नहीं बता सकता। उससे बिजनस के तकनीकी पहलू पर राय ले सकते हैं।
सप्लायर: आपके बिजनस आइडिए में कच्चे माल या सर्विसेज में सप्लाई चेन की बड़ी भूमिका है। इसलिए इसकी उपलब्धता और रेट्स की जानकारी लेकर रखना जरूरी है।
एजेंट: कई बार आपके बिजनस आइडिए और उसके कस्टमर के बीच एजेंट की भूमिका अहम होती है। ऐसे में उससे बात करना होगा बेहतर आइडिया।
सरकारी अधिकारी/वकील: इनसे सेफ्टी लाइसेंस, पॉल्यूशन सर्टिफिकेट, लेबलिंग या डिस्क्लेमर से जुड़ी सलाह ले सकते हैं।

इस सबके अलावा आपका आइडिया चाहें जितना भी ओरिजनल क्यों न हो इस बात की गुंजाइश बनी रहती है कि कोई और भी इसे कर रहा हो। इसलिए जितना हो सके रिसर्च कर लें। इसमें इंटरनेट मददगार हो सकता है। मार्केट में कंपिटिशन के बारे में भी रिसर्च जरूरी है। बेहतर होगा कि उनकी प्राइसिंग, मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रॉफिट के बारे में अच्छी तरह से जान लें। ऐसा करने में इकॉनॉमिक अफेयर से जुड़े न्यूज पोर्टल, अखबार और मैगजीन आपके लिए मददगार साबित हो सकती हैं।

स्टेप 3 : कंपनी रजिस्ट्रेशन
भारत में किसी भी कंपनी को रजिस्टर्ड करने के लिए बाकायदा मिनस्ट्री ऑफ कार्पोरेट अफेयर काम करती है। भारत में कंपनियां दो स्वरूपों, सोल प्रोप्राइटरशिप और प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह रजिस्टर कराया जा सकता है।

- कंपनी लॉ के अनुसार किसी भी रजिस्टर्ड कंपनी के लिए कम से कम 2 पार्टनर और 2 शेयर होल्डर होना जरूरी है।
- शेयर होल्डर्स किसी भी हाल में 50 से ज्यादा नहीं हो सकते।
- किसी भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में आम पब्लिक शेयर नहीं खरीद सकती है।
- ऑनलाइन रडिस्ट्रेशन के लिए www.mca.gov.in/MCA21/RegisterNewComp.html पर जा सकते हैं।
- सोल प्रोप्राइटरशिप बिजनस करने के लिए किसी कंपनी लॉ के तहत रजिस्ट्रेशन नहीं कराना पड़ता।
- नई कंपनी खोलने का यह आसान और पुराना तरीका है।
- ऐसी कंपनी का बैंक अकाउंट तो कंपनी के नाम पर ही होता है लेकिन उसे ऑपरेट कंपनी का फाउंडर अपने सिग्नेचर से ही करता है।
- इसमें किसी भी तरह के कम से कम या अधिक से अधिक पैसे की लिमिट नहीं होती।
- ऐसी कंपनी की पहचान उसके ओनर से ही होती है और इसके अलावा उसकी कोई कानूनी वैधता नहीं होती।

स्टेप 4 : फंड का जुगाड़
इतना सब करने के बाद भी एक सचाई का सामना आपको करना पड़ेगा कि आपका बेहतरीन आइडिया अभी कागजों पर ही है। इसे जमीन पर लाने के लिए सबसे जरूरी चीज यानी 'कैपिटल' यानी पैसे। इसके इंतजाम के लिए अनुभवी बिजनसमैन तरीके बताते हैं:

1 - अपना पैसा लगा कर
2- बैंक से लोन लेकर
3 - किसी पार्टनर को फाइनैंसर बना कर या प्राइवेट इक्विटी (हिस्सेदारी) देकर
4 - VC (वेंचर कैपिटलिस्ट) के सहारे कैसे मिलेगा बैंक से लोन
- अपना बिजनस शुरू करने के लिए अगर आपको बैंक लोन लेना है तो कंपनी लॉ के तहत रजिस्ट्रेशन होना जरूरी है।
- इसके बाद कंपनी को मिनिस्ट्री ऑफ माइक्रो स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज से अप्रूवल लेना होगा। यह तब ही मिलेगा जब इस मिनिस्ट्री की गाइडलाइन पर आप खरे उतरेंगे। इसकी पूरी जानकारी के लिए आप dcmsme.gov.in पर जाकर ले सकते हैं।
- एक बार यहां से अप्रूव हो जाने के बाद बैंक 1 करोड़ तक का लोन बिना कुछ गिरवी रखे दे सकता है।
- बैंक लोन देते वक्त खाता खुलवाते वक्त की गई औपचारिकताओं के अलावा बिजनस की प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी मांगती है।
- अगर प्रोडक्शन से जुड़ा बिजनस शुरू करते हैं तो पॉल्यूशन और लेबर मिनिस्ट्री से मिलने वाली एनओसी भी देनी पड़ती है।
- अगर कंपनी सोल प्रोप्राइटरशिप (केवल एक इंसान द्वारा चलाई जा रही) वाली है या शुरू करने के लिए पैसा चाहती है तो उसे स्टेट लेवल पर चलने वाले डिपार्टमेंट ऑफ माइक्रो स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज से संपर्क करना होता है। हर स्टेट में इनके लिए अलग-अलग मापदंड रखे गए हैं।

प्राइवेट इक्विटी का जोर या वेंचर कैपिटलिस्ट की ओर किसी भी आइडिया को उड़ान देने के लिए जरूरी है कि फंडिंग के फंडे को पूरी तरह से समझा जाए। बैंक से लोन लेकर बिजनस करने का पारंपरिक तरीका अब यूथ को उतना पसंद नहीं आ रहा जितना प्राइवेट इक्विटी या वेंचर कैपिटलिस्ट के जरिए बिजनस शुरू करके आ रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि लोन लेकर बिजनस करने में सारा दरोमदार आप पर आ जाता है जबिक वेंचर कैपिटलिस्ट आइजिएशन से लेकर एक्सपर्ट एडवाइस तक देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। वैसे देखा जाए तो वेंचर कैपिटलिस्ट और प्राइवेट इक्विटी बिजनस के लिए पैसा जुटाने का मिलता जुलता ही तरीका है जिसमें आपके आइडिया के पीछे पैसा लगाने के बदले आपको प्रॉफिट शेयर करना होता है। लेकिन कुछ अंतर हैं तो प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटलिस्ट को अलग-अलग करते हैं।

प्राइवेट इक्विटी इन्वेस्टर

-यह अक्सर पहले से कमाई करने वाली कंपनी या घाटे में चल रही कंपनियों पर पैसा लगाना चाहते हैं।
-यह हर तरह की कंपनियों पर पैसा लगाती हैं और मुनाफा को ही महत्व देते हैं।
-ये बड़ी फंडिंग के लिए आराम से तैयार हो जाती हैं। बिजनस मॉडल और साइज के हिसाब से इन्वेस्मेंट की रकम तय करते हैं।
-कम से कम 6 से 10 साल तक में पूरी फंडिंग करती हैं।
-अक्सर कंपनी पर पूरा कंट्रोल रखती हैं और बड़े शेयर की डिमांड करते हैं।
-इन्वेस्ट कंपनी के रोजमर्रा के काम में ज्यादा एक्टिव नहीं रहते जब तक कि कंपनी पॉलिसी के लेवल पर कोई भारी बदलाव न करना चाहे। वेंचर कैपिटलिस्ट
-किसी आइडिया को बिजनस की शक्ल देने की शुरुआत में ही वेंचर कैपिटलिस्ट का बड़ा रोल होता है। कम पूंजी से शुरू किए गए बिजनस को अक्सर इनसे फायदा होता है।
-इस तरह की फंडिंग अक्सर हाई ग्रोथ सेक्टर वाले बिजनस जैसे आईटी, बायोमेडिकल और अल्टरनेच एनर्जी आदि सेक्टर में ज्यादा होती है।
-छोटे इन्वेस्टमेंट के लिए ही तैयार होती हैं। अक्सर वेंचर कैपिटलिस्ट 10 लाख रुपये तक की रकम ही फंड करते हैं।
-फंडिंग पीरियड 4 से लेकर 7 साल का होता है।
-वेंचर कैपिटलिस्ट कंपनी में अक्सर छोटे शेयर ही लेती हैं लेकिन शर्तें आइडिया देने वाले और कंपनी के बीच तय होती हैं।
-इन्वेस्टर हर मुकाम पर राय देते हैं और अपने कनेक्शन और डिस्ट्रिब्यूशन सर्कल का भी फायदा देते हैं।

स्टेप 5 - प्लान होना चाहिए दमदार
अपने बिजनस के जमीन पर लाने के लिए जरूरी है एक बिजनस प्लान। यह प्लान वह दस्तावेज है यह दिखाता है कि आप कितनी गहराई से अपने बिजनस को समझते हैं और यही इन्वेस्टर को आपकी ओर आकर्षित करेगा।

बिजनस प्लान के मुख्य फीचर्स होते हैं:
बिजनस डिटेल्स:
1-नाम
2-लोकेशन
3-प्रॉडक्ट
4-मार्केट और कॉम्पिटिशन
5-मैनेजमेंट का अनुभव (किसी भी तरह का)
-बिजनस से आप क्या पाना चाहते हैं और कैसे पाना चाहते हैं इसके बारे में भी एक नोट लिखें।
-कितने फंड की जरूरत है फंड के लिए एप्लीकेशन

मार्केट अनैलेसिस:
1-अपने प्रॉडक्ट से जुड़ी पूरी मार्केट का ब्योरा
2-इंडस्ट्री के ट्रेंड की जानकारी
3-टारगेट मार्केट क्या है?

प्रॉडक्ट या सर्विस:
1-प्रॉडक्ट या सर्विस लाइन का पूरा ब्यौरा
2-पेटेंट, कॉपीराइट और लीगल इश्यू

मैन्युफैक्चरिंग प्रॉसेस (अगर है तो):
1-मैटीरियल
2-कच्चे माल की सप्लाई का ब्यौरा
3-प्रॉडक्शन का तरीका

मार्केटिंग की रणनीति:
1-किन तरीकों से होगी मार्केटिंग
2-प्रॉडक्ट या सर्विस की कीमत कितनी होगी
3-प्रॉडक्ट या सर्विस बेचने का कौन सा तरीका आजमाएंगे

मैनेजमेंट प्लान:
1-किस तरह का ऑफिस ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर आपनाएंगे
2-बोर्ड ऑफ डायरेक्टर या ओनरशिप किसके पास होगी
3-कामों की जिम्मेदारी किस पर कौन सी होगी
4-स्टाफ प्लान या कितने कर्मचारी होंगे

5-अगले एक या दो साल तक बिजनस चलाने का ऑपरेशनल प्लान

इनक्यूबेटर और एसेलरेटर को भी समझें
बिजनस की शुरुआत करने वालों के लिए इन दो शब्दों के मायने जानना बहुत जरूरी हैं। इन्क्यूबेटर आपको अपने आइडिया के शुरुआती दौर में उसे प्रॉडक्ट के लेवल तक ले जाने में मदद करता है। इस दौरान वह एक्सपर्ट सलाह तो देता ही है साथ ही पूरे आइडिया को फाइन ट्यून करने का काम भी करता है। एसेलरेटर, जैसा कि नाम से ही पता चलता है आपके आइडिया को स्पीड देने का काम करता है। इनका रोल तब अधिक होता है जब एक बिजनस आइडिया चल तो निकला है लेकिन बड़ा बनने में कुछ कसर बाकी है। यह तय वक्त के लिए आपके बिजनस आइडिया को अपने सहारे ऊंची उड़ान दिलाने में मदद करते हैं। इन्क्यूबेटर और एसेलरेटर अमूमन नए बिजनस आइडिया को एक ऑफिस स्पेस के साथ ही एक्सपर्ट्स की मदद भी दिलाते हैं।ये दोनो ही बेहतरीन आइडिया को हर मुकाम पर पालने पोसने की जिम्मेदारी उठाते हैं ।

यहां से मिलेगी आपको मदद
हम कुछ ऐसे ठिकानों के बारे में दे रहे हैं जो आपके आइडिया को एक मुकाम देने का काम कर सकते हैं।

इंडियन एंजल नेटवर्क इनक्यूबेटर
दिल्ली भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉल्जी का चलाया गया यह बेहतरीन आंत्रप्रेन्योरशिप प्रोग्राम है जिसमें आइडिया को बेहतरीन तरीके से सपोर्ट किया जाता है। यहां किसी भी वेंचर को 18-24 महीने तक इनक्यूबेट किया जाता है। एक्सपर्ट्स का इनसे बढ़िया नेटवर्क फिलहाल भारत में मौजूद नहीं है।

टेक्नॉलजी बिजनस इन्क्यूबेटर
आईआईटी दिल्ली हालांकि यह केवल तकनीकी बिजनस को ही बढ़ाने में मदद करते हैं लेकिन इनके सहारे कई आईआईटी स्टूडेंट्स ने अपने आइडिया को बड़ा बनाया है। इसमें आईआईटी किसी भी अच्छे बिजनस आइडिया को वेंचर कैपिटलिस्ट की मदद से आगे बढ़ाती है। एक्सपर्ट्स के लिहाज से यह किसी भी आइडिया को शुरू करने के लिए अच्छी जगह साबित हो सकती है।

टीलैब्स
दिल्ली यह टाइम्स इंटरनेट लिमिटेड का एक एसेलेरेटर है जो 10 फीसदी हिस्सेदारी के बदले 10 लाख रुपये तक फंड करता है। 13 महीने का इस प्रोग्राम को बिजनस जगत की बड़ी हस्तियां मेंटर करती हैं। यह ऑफिस के लिए जगह भी देते हैं। प्रोग्राम की शुरुआत फरवरी और अगस्त में होती है।

सोसाइटी फॉर इनोवेशन ऐंड आंत्रप्रेन्योरशिप, आईआईटी मुंबई
साइंस और टेक्नॉलजी के क्षेत्र में एंटप्रेन्योरशिप के लेवल पर चलने वाली किसी भी रिसर्च या शुरुआत को आईआईटी मुंबई का यह हिस्सा बखूबी करता है। इसे भी सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉल्जी का सपोर्ट मिलता है। हालांकि यहां केवल आईआईटी मुंबई से जुड़े स्टूडेंट्स को ही मौका मिल पाता है।

अनलिमिटेड इंडिया (UnLtd) मुंबई
यह सोशल आंत्रप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने के लिहाज से बेहतरीन इनवेस्टर साबित हो सकता है। यहां एक्सपर्ट्स की देखरेख में बेहतरीन स्टार्टअप इनक्यूबेशन के साथ-साथ सीड फंडिंग (बिजनस शुरु करने के लिए पैसा) का जुगाड़ भी हो जाता है। 3 टियर की फंडिग में 80 हजार से 20 लाख तक की फंडिंग हो सकती है।

सिडबी इनोवेशन एंड इनक्यूबेशन सेंटर, आईआईटी कानपुर
छोटी इंडस्ट्रीज को मदद करने के लिहाज से आईआईटी कानपुर का यह प्रोग्राम काफी खास है जो स्मॉल इडस्ट्रीज डिवेलपमेंट डिपार्टमेंट के सहयोग से चल रहा है। यह न केवल टेक्नॉल्जी बेस आइडिया को सपोर्ट करता है बल्कि उन्हें बड़े बिजनस की शक्ल देने के लिहाज से सपोर्ट भी करता है। छोटे लेवल के बिजनस आइडिया के लिहाज से इस सेंटर को एक्सपर्ट माना जाता है।

Saturday, September 27, 2014

सॉफ्ट स्किल्स और बिहेवियर

प्रस्तुति - दैनिक भास्कर

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# Creative
# Progressive


बेशुमार पूंजी से ही करोड़ों के उद्यम खड़े किए जा सकते हैं, यह एक भ्रम है। आपके भीतर का हुनर भी ऐसा कर पाने में सक्षम है। स्वप्निल कामत ने अपनी प्रतिभा की बदौलत इस बात को साबित किया है। एक बेहतरीन वक्ता होने के बावजूद स्वप्निल को कुछ सालों पहले तक यह अंदाजा नहीं था कि एक दिन अपनी इस खूबी की बदौलत वे एक कामयाब उद्यमी बन पाएंगे।

कंपनी : वर्क बेटर
संस्थापक : स्वप्निल कामत
क्या खास : कॉर्पोरेट जगत के जूनियर और मिडिल लेवल कर्मचारियों को दिलचस्प तरीके से सॉफ्ट स्किल्स और बिहेवियर में ट्रेनिंग प्रदान करना। 
गोवा में पले-बढ़े स्वप्निल कामत ने गोवा के धेम्पे कॉलेज से बीकॉम किया। पढ़ाई के दौरान वह अपने पिता के हार्डवेयर बिजनेस में सेल्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर मदद किया करता था। बचपन में शर्मीले और कम बोलने वाले स्वप्निल ने इस काम की बदौलत अपने भीतर कुछ नई खूबियों को पोषित किया। सबसे महत्वपूर्ण खूबी जो उसने अपने आपमें विकसित की थी, वह थी संवाद कुशलता यानी बात करने की कला। टेक्निकल आईटी फीचर्स को वह ग्राहकों को बड़ी सरलता से समझा देता था। इसके साथ ही कॉलेज में उसने ईएनटी नामक ईवेंट कंपनी शुरू की, जो कॉलेज और यूथ ईवेंट्स आयोजित करती थी। 
इसी दौरान स्वप्निल यह समझ चुका था कि एंटरप्रिन्योरशिप में उसकी खासी दिलचस्पी थी जिसकी बारीकियां उसे इन कामों से सीखने को मिलीं। लेकिन अभी भी वह यह नहीं जान पाया था कि उसे किस दिशा में आगे बढ़ना है। पढ़ाई पूरी हुई तो स्वप्निल ने एमबीए करने का फैसला लिया और पुणे के सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट में एडमिशन ले लिया।
यंग एंटरप्रेन्योर : नया करने के हौसले ने बनाया करोड़पति कारोबारी

एमबीए पूरा करने के बाद उसने लॉरियल में ब्रांड मैनेजर के रूप में काम करना शुरू किया। एक सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी के बावजूद स्वप्निल एंटरप्रिन्योरशिप का आकर्षण छोड़ नहीं पाया था। कुछ ही दिनों में उसे लगने लगा कि उसे नौकरी के बजाय खुदका वेंचर शुरू करना चाहिए। आखिरकार स्वप्निल ने अपना जॉब छोड़कर 2006 में ट्रिप टू गोवा डॉट कॉम की शुरुआत की। पहले वर्ष में ही इस वेंचर को अच्छा रेस्पॉन्स मिला और खासा मुनाफा भी। इसी दौरान स्वप्निल को बैंक ऑफ अमेरिका के लिए एक ईवेंट आयोजित करने का मौका मिला।

नए प्रयोग करने की जरूरत ने बदला रास्ता 

यह मौका उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट था। यहां स्वप्निल ने सॉफ्ट स्किल्स की वर्कशॉप्स देखी। उन्होंने महसूस किया कि हिंदुस्तानी मिडिल व जूनियर एग्जीक्युटिव्स को इस ट्रेनिंग की जरूरत कुछ नए प्रयोगों के साथ थी। यही सब सोचते हुए स्वप्निल ने सॉफ्ट स्किल ट्रेनिंग को व्यवसाय में तब्दील करने के बारे में सोचा। उनका यह आइडिया अनोखा होने के साथ-साथ जोखिम भरा भी था। अनोखा इसलिए क्योंकि वे पारंपरिक कॉर्पोरेट ट्रेनिंग को एक नया और दिलचस्प रूप देना चाहते थे और जोखिम भरा इसलिए क्योंकि उन्हें कॉर्पोरेट ट्रेनिंग का अनुभव नहीं था। स्वप्निल ने इस जोखिम को एक अवसर के तौर पर देखा और एक कॉर्पोरेट ट्रेनिंग कंपनी खोलने का फैसला किया।


कम उम्र में ऊंचा मुकाम

स्वप्निल कामत की उम्र सिर्फ 32 वर्ष है लेकिन कॉर्पोरेट सॉफ्ट स्किल ट्रेनर के रूप में उन्होंने एक ऊंचा मुकाम हासिल किया है। एग्जीक्यूटिव ट्रेनिंग कंपनी वर्क बेटर के जरिए स्वप्निल कॉर्पोरेट कर्मचारियों को बिहेवियरल और सॉफ्ट स्किल्स में ट्रेनिंग प्रदान कर रहे हैं। अब तक वर्क बेटर देश भर में 75,000 से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग प्रदान कर चुकी है। अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के लिए वर्क बेटर की सेवाएं लेने वाले कॉर्पोरेट्स में एचडीएफसी बैंक, एनएसई, जॉनसन एंड जॉनसन और महिन्द्रा एंड महिन्द्रा जैसी नामी कंपनियों का नाम शामिल है।

रिसर्च के बाद की शुरुआत 
अनुभव हासिल करने के लिए स्वप्निल ने कॉर्पोरेट ट्रेनिंग सेशन्स में जाना शुरू किया, लेकिन ये उन्हें काफी नीरस और टेक्निकल लगे। ट्रेनिंग के पुराने और बोरिंग तरीकों को दिलचस्प बनाने के लिए उन्होंने रणनीति बनाना शुरू किया। काफी रिसर्च और अध्ययन के बाद एग्जीक्यूटिव ट्रेनिंग की प्रक्रिया में मूलभूत बदलाव करके प्रोफेशनल्स की मदद के लिए कुछ नए तरीके इजाद किए। इस तैयारी के बाद 2008 के अंत में अपनी बचत के 2.5 लाख रुपए से स्वप्निल ने अपनी कंपनी वर्क बेटर की नींव रखी।
मंजिल के रास्ते में मुश्किलें
मुंबई में एक छोटा ऑफिस किराए पर लेकर स्वप्निल ने काम शुरू किया। वर्क बेटर की स्थापना के बाद डेढ़ साल उनके लिए काफी मुश्किलों भरा था। इसके दो कारण थे, पहला यह कि वर्क बेटर का आइडिया नया था और दूसरा यह कि उन्हें इस फील्ड का ज्यादा अनुभव नहीं था। एक क्लाइंट से शुरुआत हुई और फिर धीरे-धीरे संख्या बढ़ती गई। नौ माह में वर्क बेटर ने 5.5 लाख रुपए कमाए। 500 एग्जीक्यूटिव्स की ट्रेनिंग से शुरुआत करने वाली वर्क बेटर वर्तमान में 18,000 एग्जीक्यूटिव्स को सालाना ट्रेनिंग दे रही है। साथ ही कंपनी का का टर्नओवर 2013-14 में 4.2 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है, जो पहले वर्ष में 15 लाख रुपए था। 
स्वप्निल ने इस वर्ष 50 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद के साथ मुंबई के बाद अब गोवा में भी अपनी कंपनी का बैक ऑफिस शुरू किया है। एंटरप्रिन्योर बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले युवाओं के लिए स्वप्निल कामत का संदेश है कि अपनी क्षमता, पसंद और लंबे समय तक फायदेमंद साबित होने वाले काम को पहचानिए। इन तीन चीजों का मेल आपको एक सफल करियर की मंजिल पर पहुंचा सकता है।

Saturday, September 20, 2014

रमेशभाई - मिनी ट्रैक्टर

प्रस्तुति - दैनिक भास्कर

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#creative
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आपने यह कहावत तो सुनी ही होगी..जहां चाह, वहां राह। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो इस कहावत को चरितार्थ करते हुए भी नजर आते हैं। इन्हीं में से एक हैं राजकोट जिले के बगथला गांव में रहने वाले रमेशभाई प्रभुभाई सरडवा। सिर्फ 7वीं कक्षा तक पढ़े रमेश पेशे से किसान हैं। रमेशभाई के पास 25 एकड़ जमीन है और वे बचपन से ही खेती-किसानी में लगे हुए हैं।

7वीं तक पढ़े किसान ने 60 हजार में बना लिया ‘जुगाड़’ ट्रैक्टर, देखे तस्वीरें... 
इसके साथ ही उनका एक और शौक था, वाहनों के पेंच-पुर्जो का तकनीकी ज्ञान लेने का। इसीलिए वे बचपन में अक्सर मैकैनिक की दुकान पर बैठे रहा करते थे। काफी हद तक काम सीख लेने के बाद उन्होंने गांव में ही एक ऑटो रिक्शा का गैरेज भी खोल लिया था। इसी बीच उनके मन में विचार आया कि क्यों न अपने खेतों को जोतने के लिए खुद ही कुछ बना लिया जाए। कुछ ऐसा, जो ट्रैक्टर का काम करे और ट्रैक्टर खरीदने में लगाई जाने वाली भारी-भरकम रकम भी बच जाए। फिर क्या था, रमेशभाई अपने इस मिशन में लग गए और अपनी सूझ-बूझ से खुद ही एक मिनी ट्रैक्टर बना लिया।

7वीं तक पढ़े किसान ने 60 हजार में बना लिया ‘जुगाड़’ ट्रैक्टर, देखे तस्वीरें...

इन चीजों का किया उपयोग:

- ऑटो का इंजन
- मारुतिवेन की गियर किट
- मारुति फ्रंट की व्हीलप्लेट
- मिनी ट्रैक्टर के टायर व कुछ अन्य सामान
रमेशभाई ने यह सब सामान भी पुराने वाहनों से जुगाड़े। इसमें 50-60 हजार रुपए का खर्च आया। निर्माण में उन्हें दो महीनों का समय लगा।

7वीं तक पढ़े किसान ने 60 हजार में बना लिया ‘जुगाड़’ ट्रैक्टर, देखे तस्वीरें...

पैसों की बचत और कमाई भी:
अगर ट्रैक्टर किराए का लिया जाए तो 3-4 हजार रुपए किराया देना पड़ता है। वहीं, ट्रैक्टर की बाजार कीमत 6 लाख रुपए से ऊपर होती है, जिसे खरीदना हरेक किसान के बस की बात नहीं। वहीं, रमेशभाई के मिनी ट्रैक्टर के प्रतिदिन का खर्च मुश्किल से 600 रुपए आता है। रमेशभाई अपने मिनी ट्रैक्टर से अन्य किसानों के खेत भी जोत चुके हैं, वह भी बड़े ट्रैक्टर की तुलना में बहुत कम पैसों में।

इस कारनामे से रमेशभाई न सिर्फ पैसों की बचत व कमाई भी कर पा रहे है, बल्कि अब वे आसपास के गांवों में भी फेमस हो चुके हैं। उनके यह मिनी ट्रैक्टर जहां से भी गुजरता है, लोग देखते ही रह जाते हैं।

Wednesday, August 20, 2014

गूगल ग्लास जैसी डिवाइस


प्रस्तुति - नवभारत टाइम्स

#leader
#creative
#progressive


भारतीय ने ओपन-सोर्स हार्डवेयर से बनाई 4500 रुपए में गूगल ग्लास जैसी डिवाइस



Arvind-Sanjeev
कोच्चि के अरविंद संजीव ने गूगल ग्लास जैसी डिवाइस एक महीने के अंदर केवल 4500 रुपए में बना दी।
वरुण अग्रवाल, बेंगलुरु
भले ही गूगल को गूगल ग्लास बनाने में एक साल का वक्त लगा और वह इसे करीब एक लाख रुपए में बेच रही है, लेकिन कोच्चि के अरविंद संजीव ने ऐसी ही एक डिवाइस एक महीने के अंदर केवल 4500 रुपए में बना दी। हालांकि यह चश्मे की शक्ल में न होकर एक टोपी जैसी है। इसके लिए उन्होंने ओपन-सोर्स हार्डवेयर की मदद ली।

अपने इस प्रॉडक्ट से पैसे कमाने की जगह उन्होंने समाज की भलाई के मकसद से एक ब्लॉग लिखा। ब्लॉग में उन्होंने बताया कि किस तरह कोई भी इस 'स्मार्टकैप' को बना सकता है और इसके लिए ओपनसोर्स हार्डवेयर जैसे रासबेरी पाई कंप्यूटर, आर्ड्यिनो बोर्ड और ऐंड्रॉयड सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर सकता है। इस स्मार्टकैप में विडियो शेयरिंग और रेकॉर्डिंग के लिए एक वेबकैम है, 2.5 इंच का डिस्प्ले है और हैंड्स-फ्री काम करने के लिए वॉइस रिकग्निशन सिस्टम भी है।

इस जैसे हार्डवेयर प्लैटफॉर्म्स और रेपरैप 3D प्रिंटर्स से इलेक्ट्रॉनिक्स की कम या कोई जानकारी न रखने वाले स्टूडेंट, इंजिनियर और उद्यमी हार्डवेयर प्रॉडक्ट्स बनाना शुरू कर सकते हैं।

23 साल के संजीव अपने इंजिनियरिंग कॉलेज में कंप्यूटर हार्डवेयर बनाने के बारे में कुछ भी नहीं सीख सके, तो उन्होंने फैसला किया कि वह अपने सभी प्रॉजेक्ट्स को सभी के लिए उपलब्ध करवाएंगे, ताकि जो चाहे उन्हें बना सके। उन्होंने कहा, 'कॉलेज में आर्ड्यिनो को जानने से पहले मुझे नहीं पता था कि कोई कैलकुलेटर कैसे काम करता है या मैं उसे कैसे बना सकता हूं।'

उन्होंने एक ऐसा प्लैटफॉर्म विकसित किया है, जो उनके मुताबिक आपकी कार को कंट्रोल कर सकता है। उन्होंने कहा, 'ओपन-सोर्स हार्डवेयर की मदद से मैंने एक प्लैटफॉर्म बनाया है, जिससे आप केवल एक मोबाइल ऐप से अपनी कार को पूरा कंट्रोल कर सकते हैं।' संजीव ने इसके पेटेंट का आवेदन किया है और उन्हें उम्मीद है कि वह इसे एक पीस के 9000 रुपए के हिसाब से बेच सकेंगे।

मुंबई के श्रीकांत ने भी आर्ड्यिनो कंप्यूटर बोर्ड के इस्तेमाल से डायबीटीज़ के मरीजों का ग्लूकोज़ लेवल चेक करने के लिए एक मेडिकल डिवाइस बनाई। वह अपने डायबिटो को ओपन सोर्स बनाकर ओपन-सोर्स हार्डवेयर कम्यूनिटी में सहयोग करना चाहते हैं। इस डिवाइस में ग्लोबल फार्मा कंपनियों ने रुचि दिखाई है। वह कहते हैं, 'ओपन-सोर्स हार्डवेयर की वजह से आप प्रोटोटाइपिंग और डिज़ाइन टाइम को बहुत कम कर सकते हैं। यहां आपको हर चरण पर बड़ा कम्यूनिटी सपॉर्ट मिलता है। '

अपने बोर्ड्स की भारत में तेजी से बढ़ रही मांग को देखते हुए पिछले साल आर्ड्यिनो ने भारत में अपना पहला ऑफिस बेंगलुरु में खोला था। बेंगलुरु में आर्ड्यिनो की मैनेजिंग डायरेक्टर प्रिया कुबेर ने कहा, 'हमारा बिज़नस भारत में बहुत तेजी से बढ़ रहा है। हम यहां की कंपनियों से बात कर रहे हैं ताकि अगले कुछ महीनों में हमारे बोर्ड्स भारत में बनने शुरू हो जाएं।' इसके बाद इसकी कीमत 1200 रुपए से घटकर 900 रुपए तक हो जाएगी।

एक और ओपन-सोर्स हार्डवेयर टूलकिट रेपरैप की मदद से कई भारतीय स्मार्टअप्स 3D प्रिंटर्स बना सके हैं, जो कमर्शली बेचे भी जा रहे हैं। बेंगलुरु में ब्रह्मा3 के को-फाउंडर निखिल कहते हैं, 'हमने अपना 3D प्रिंटर बनाने के लिए प्लैटफॉर्म के तौर पर रेपरैप और आर्ड्यिनो का इस्तेमाल किया।'

IIIT (इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इन्फॉर्मा इंस्टिट्यूट ऑफ इन्फर्मेशन टेक्नॉलजी) के प्रोफेसर एस सदगोपन ने कहा, 'बहुत जल्द स्कूल और कॉलेज में ओपन-सोर्स हार्डवेयर का इस्तेमाल होने लगेगा। इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की कीमत से हार्डवेयर महंगा हो जाता है। ओपन-सोर्स हार्डवेयर इस कीमत को कम करता है और इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर को सबकी पहुंच में लाता है।'

इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। केरल सरकार स्कूली छात्रों को 10 हजार रासबेरी पाई कंप्यूटर्स देने का फैसला पहले ही ले चुकी है।

कुछ उद्यमी भारत में हार्डवेयर प्रॉडक्ट बनाने को बढ़ावा देने के लिए अपना ओपन-सोर्स हार्डवेयर बना रहे हैं। इसका एक उदाहरण मेरठ की इलेक्ट्रॉब्रिक्स है। यह कंपनी 2000 रुपए का बेसिक किट बेचती है, जिससे बच्चे और रुचि रखने वाले लोग कई तरह के हार्डवेयर प्रॉडक्ट्स बना सकते हैं।

Monday, May 19, 2014

कड़ी मेहनत - series - 03

प्रस्तुति - दैनिक भास्कर

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#creative
#progressive

लाखों का पैकेज छोड़ करने लगे खेती और बदल दी गांव की सूरत

पटना. नाम यदुवेंद्र किशोर सिंह, पिता अवध किशोर सिंह। उम्र 29 वर्ष। विक्टोरिया बॉयज स्कूल, दार्जिलिंग से वर्ष 2002 में मैट्रिक। एयरफोर्स स्कूल, नई दिल्ली से इंटरमीडिएट (2004। क्राइस कॉलेज बेंगलुरु से स्नातक (2007) और ईडीआई, अहमदाबाद से 2008 में पोस्ट ग्रेजुएट डिघ्लोमा इन बिजनेस इंटरप्रन्योर मैनेजमेंट की पढ़ाई की। मल्टीनेशनल कंपनियों में लाखों रुपए का ऑफर ठुकरा कर आज समेकित खेती कर रहे हैं।  
मधुबनी जिले के फूलपसरास प्रखंड के खुटौना गांव में यदुवेंद्र ने 7.5 एकड़ में पांच तालाब बनवाया है। जलजमाव वाले इस क्षेत्र में कुछ नए तालाब भी बनवाए, जबकि कुछ पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार भी करवाया है। इस वर्ष तालाब में इंडियन कार्प मछली का बीज डाला है। साथ ही 100 आम के पौधे लगाए। 10 गाय रखे हैं। धान, गेहूं, सरसो और अरहर की खेती भी कर रहे हैं। इस प्रकार समेकित खेती की शुरुआत की है।

लोगों ने माना लोहा
प्रबंधन की पढ़ाई के बाद नौकरी ठुकरा खेती करने जब गांव आए, तो लोग हंस रहे थे। कई लोगों ने कहा- दिमाग फिर गया है। अब लोग समेकित खेती में इनके कुशल प्रबंधन का लोहा मानने लगे हैं। मछलीपालन, बागवानी, पशुपालन और सामान्य खेती से प्रतिवर्ष कम से कम 25 लाख रुपए शुद्ध मुनाफा होने की उम्मीद है। 

लाखों का पैकेज छोड़ करने लगे खेती और बदल दी गांव की सूरत

आत्म संतुष्टि के लिए कर रहे खेती
यदुवेंद्र की योजना है कि समेकित खेती में राज्य का यह महत्वपूर्ण मॉडल बने। इसे किसानों के समेकित खेती का प्रशिक्षण केंद्र बनाने का लक्ष्य है। मधुबनी सहित राज्य के किसानों को कम खर्च में अधिक लाभ के लिए समेकित खेती का मॉडल अपनाने के लिए प्रेरित करना भी उनका लक्ष्य है। धान और गेहूं की खेती के लिए श्रीविधि तकनीक को अपनाने के लिए किसानों को वे प्रेरित करते हैं। 

Thursday, May 1, 2014

कड़ी मेहनत - series - 02

प्रस्तुति - दैनिक भास्कर

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25 पैसे रोज की मजदूरी से शुरू किया काम, अब हैं फैक्ट्री मालिक
कोलकाता. कोलकाता के एनवीआर ग्रुप के सीएमडी संजय सिंह राठौर लोगों को सत्तू पिला कर करोड़पति बने हैं।
उन्होंने पारंपरिक सत्तू में औषधि मिलाकर उसे नये रूप में बाजार में उतारा, जो जंक फूड के आदी लोगों के लिए बेहतर पौष्टिक विकल्प बना। आज लाखों लोग उनकी चक्की का सत्तू पीकर दिन की शुरुआत करते हैं।
संजय ने अपने कारोबार की शुरुआत महज एक लाख रुपए से की थी। आज उनका व्यापार 10 करोड़ रुपए का हो गया है।
मूल रूप से बिहार के होने के कारण संजय को सत्तू के साथ हमेशा ही लगाव रहा। वह सोचते थे कि सत्तू को कैसे ऊपरी तबके में लोकप्रिय बनाया जाये। वह एनवीआर रेडीमिक्स प्रीमियम सत्तू लेकर बाजार में आए।
हावड़ा के बजरंगबली में उन्होंने एक यूनिट बनाया। इसमें सत्तू की पिसाई से लेकर पैकेजिंग तक की जाती है। बाजार से श्रेष्ठ क्वालिटी का चना खरीदकर उसमें आयुर्वेदिक हर्ब मिलाया जाता है। छोटे पाउच में इसे बाजार में उतारा गया। देखते ही देखते यह उत्पाद पसंद किया जाने लगा।

कड़ी मेहनत - series - 01

प्रस्तुति - दैनिक भास्कर

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25 पैसे रोज की मजदूरी से शुरू किया काम, अब हैं फैक्ट्री मालिक

खंडवा. आर्थिक समस्या से मजबूर होकर मात्र 13 साल की उम्र में मजदूरी से करियर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में लक्कड़ बाजार में एक फर्नीचर व्यापारी के यहां मात्र 25 पैसे प्रतिदिन पर मजदूर कर रंदा चलाया। दिन-रात कड़ी मेहनत की। यह सिलसिला 15 साल तक चला। 
मन में आगे बढ़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण थोड़ी बहुत बचत की। इससे छोटे-मोटे ठेके लिए और 28 साल की आयु तक पहुंचने पर लक्कड़ बाजार में छोटी सी दुकान खोल ली। फिर कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। यह कहना है शहर के प्रतिष्ठित फर्नीचर व्यवसायी कंछेदीलाल विश्वकर्मा का। 
आज वह मजदूरों के लिए आदर्श बन गए। कड़ी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने लाल चौकी क्षेत्र में फर्नीचर का बड़ा शोरूम खोला है, जिसे बेटे अनिल विश्वकर्मा संचालित कर रहे हैं। उम्र 74 साल हो गई, लेकिन कारखाने में काम करने वाले मजदूरों को आज भी वे मार्गदर्शन दे रहे हैं।
दो बेटे कर रहे ठेकेदारी एक संभाल रहा शोरूम
श्री विश्वकर्मा की कड़ी मेहनत के कारण ही आज उनके बेटे प्रवीण कुमार और अशोक कुमार सरकारी विभागों के साथ ही बिल्डिंग निर्माण के ठेके ले रहे हैं। वहीं छोटे बेटे अनिल विश्वकर्मा लालचौकी क्षेत्र में शहर का भव्य फर्नीचर शोरूम संचालित कर रहे हैं। 
बच्चों को छोड़कर दिन-रात किया काम
वे बताते हैं कि उन्होंने एक व्यापारी के यहां 25 पैसे रोज पर मजदूरी से रंदा चलाया। युवा होने पर कारीगर बन गया फिर भी मजदूरी 3 रुपए रोज ही मिलती थी। 1953 से 1968 तक मजदूरी की। थोड़ी बहुत बचत करने के साथ ही परिचितों के सहयोग से 1969 में बिल्डिंग के फर्नीचर संबंधी काम के छोटे ठेके लेना शुरू किए। एक साल बाद छोटी सी दुकान शुरू की। छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर दिन-रात काम में लगा रहा। बच्चे बढ़े हुए तो उन्होंने भी काम में सहयोग किया।
फोटो- कारखाने में कारीगरों को डिजाइन बनाने के लिए समझाइश देते कंछेदीलाल विश्वकर्मा।