Tuesday, October 21, 2008

कार्टून न्यूज़ पेपर से और मुट्ठी भर चावल








भास्कर से (भाई लोग दिल पर मत लेना)
हिंद देश के सभी निवासी एक हैं। राष्ट्र रूप रंग भाषा सारे अनेक हैं।

सुदूर उत्तर पूर्व राज्य मिजोरम के एक छोटे से समुदाय ने एक मिसाल कायम कर यह सिद्ध कर दिया है कि मानव-एकता संकल्प और अथक प्रयास से क्या कुछ नहीं किया जा सकता। भले ही यह मामला केवल एक मुट्ठी भर चावल से खाद्य बैंक बनाने का ही क्यों न हो। इस पहल की शुरूआत वैसे तो ब्रिटिश शासनकाल में शुरू की गई थी लेकिन अपने सकारात्मक प्रभाव और लोकप्रियता के कारण आज मिजोरम में इस सामुदायिक खाद्य बैंक के अभियान का नाम दिया गया है।

संयुक्त राष्ट्र नशा और अपराध कार्यालय के इस अभियान से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसके इतिहास की जानकारी देते हुए बताया कि बात वर्ष 1914 की है जब राज्य में महिलाओं के एक समूह ने चर्च की सामाजिक सेवा में चंदा देने की अपनी असमर्थता को दूर करने के लिए एक अनूठी सूझबूझ दिखाई और अपने समूह के सभी सदस्यों से एक-एक मुट्ठी चावल एकत्र करना शुरू कर दिया। इस प्रकार से जो चावल एकत्र हुआ उसे स्थानीय बाजार में बेच दिया गया और जो कमाई हुई उसे चर्च में दान कर दिया।

वर्ष 1914 में इस प्रकार से एकत्रित किए गए चावलों को बेच कर केवल 80 रुपये इकट्ठा हुए थे और उसके 89 साल के बाद वर्ष 2003 के दौरान इसी प्रकार से एकत्र किए गए चावलों को बेचने पर चार लाख रुपये मिले। इस अभियान ने यह बात साबित कर दी कि एकता संकल्प और अथक प्रयास से बहुत कुछ किया जा सकता है। अधिकारी ने बताया कि इस अभियान की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि आज मिजोरम के सभी परिवारों में से करीबन 86 प्रतिशत लोग इस अभियान में भाग ले रहे हैं और इसे कामयाब और यादगार बनाने में लगे हुए हैं।

आज हर परिवार के पास एक दान पात्र है जिसमें एक-एक मुट्ठी चावल एकत्र किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र नशा और अपराध कार्यालय ने इस अभियान में सामुदायिक भागीदारी से प्रभावित होकर सप्ताह में एक बार मुट्ठी भर चावल एकत्रित करने की योजना बनाई और इस चावल की बिक्री से जमा की गई धनराशि से नशीली दवाओं के सेवन की आदी महिलाओं की सहायता की जाएगी। यह कार्यक्रम मिजोरम के अजवाल कोलासिन और चंफाई जिलों में संयुक्त राष्ट्र नशा और अपराध कार्यालय की क्षमता निर्माण और चेतना की समन्वित एचआईवी-एड्स अनुक्रिया की परियोजना है जो आज शहरी और देहाती दोनों इलाकों में चलायी जा रही है।

इस योजना के विस्तार कार्यक्रम के तहत अब तक 279 युवा महिलाओं को इस तरह से प्रशिक्षित किया गया है कि वे आगे चलकर लोगों को प्रशिक्षित कर सकें और सामुदायिक खाद्य बैंक के बारे में चेतना का प्रसार कर सकें। इसके परिणाम स्वरूप 70 गांवों से 147 क्विंटल चावल एकत्र किया गया और इसे बेचकर सभी कार्यकर्ताओं से मिलाकर कुल दो लाख रुपये की राशि जमा की गई। यह पूरी धनराशि अकाल के दौरान राहत का कार्य चलाने के लिए मिजोरम सरकार को भेंट की गई।

5 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

सामुदायिक खाद्य बैंक - आइडिया अच्छा है.

Gyandutt Pandey said...

नित्य मुठ्ठी भर अन्न निकाल रखने का संकल्प अच्छा है। रोज एक समाज के प्रति जिम्मेदारी का अहसास होगा।
जैसे अग्रासन दिया जाता था, वैसे हम रोज एक मुठ्ठी अन्न जरूरतमन्दों के लिये अलग रखें - यह बड़ी बात होगी।

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

संकल्प अच्छा है....

Udan Tashtari said...

साधुवाद!!!

रंजना said...

वाह ! आनंद आ गया पढ़कर.आपका साधुवाद.
एक मुट्ठी एकेला चावल भले महत्वहीन लगे पर जब सैकड़ों मुट्ठी एकसाथ एकत्रित हो जाए तो क्या कुछ नही हो सकता.ऐसे ही सब मिल जायें तो एक ऐसी ताकत बन जाते हैं कि उसके सामने सबको झुकना पड़ता है.

पुराने ज़माने में घरों में रोज इसी तरह एक मुट्ठी अन्न दान हेतु निकाल कर रख देने का प्रचालन था.