Tuesday, October 21, 2008

संघर्ष और जीवट की कहानी






घरों में बरतन धोने और झाड़ू पोछा करने वाली एक महिला अब एक ताक़तवर बहुराष्ट्रीय कंपनी के ख़िलाफ़ आंदोलन का नेतृत्व कर रही है.
दयामणि बरला झारखंड में खरबपति लक्ष्मी मित्तल की कंपनी आर्सेलर मित्तल के ख़िलाफ़ चल रहे आदिवासियों के आंदोलन में शामिल हैं.
आदिवासी अपनी ज़मीन नहीं देना चाहतेइस आंदोलन में उनकी भागीदारी और नेतृत्वकारी भूमिका को देखते हुए हाल ही में उन्हें स्वीडन में यूरोपीय सामाजिक मंच की एक कार्यशाला में आमंत्रित किया गया.
इस कार्यशाला में दुनिया भर में आदिवासी समाज के अधिकारों पर बातचीत की जाएगी.
इस सम्मेलन में दुनिया के अलग अलग कोनों से आ रहे तेईस वक्ताओं में दयामणि बरला शामिल हैं जो मूल निवासियों के संघर्षों के बारे में जानकारी देंगे.
संघर्ष की कहानी
दयामणि बरला के जीवन की कहानी संघर्षों और मुश्किलों की कहानी है. साथ ही ये उनके जीवट की कहानी भी है.
अपने संघर्षों के दौरान मेहनत मज़दूरी करते हुए उन्होंने कई बार रेलवे स्टेशनों पर सो कर रातें काटी हैं.
मेहनत की कमाई से पैसे बचा बचाकर उन्होंने अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी की.
इन्हीं हालात में उन्होंने एमए की परीक्षा पास की और फिर पत्रकारिता शुरू की.
दयामणि झारखंड की पहली महिला पत्रकार हैं और उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं.
लेकिन आज भी वो राँची शहर में एक चाय की दुकान चलाती हैं और ये दुकान ही उनकी आय का प्रमुख साधन है.
दयामणि कहती हैं कि “जनता की आवाज़ सुनने के लिए इससे बेहतर कोई जगह नहीं है.”
स्वीडन में हुए सम्मेलन में उन्होंने उन चालीस गाँव के लोगों की दास्तान सुनाई जिनकी ज़मीन इस्पात कारख़ाना लगाने के लिए आर्सेलर मित्तल कंपनी को दी जा रही है.
लक्ष्मी मित्तल इस इलाक़े में क़रीब नौ अरब डॉलर की लागत से दुनिया का सबसे बड़ा इस्पात कारख़ाना लगाना चाहते हैं.
इसका नाम ग्रीनफ़ील्ड इस्पात परियोजना है और इसके लिए बारह हज़ार एकड़ ज़मीन चाहिए.
ये ज़मीन आदिवासियों से ली जानी है.
‘बरबादी और विस्थापन’
लेकिन दयामणि बरला के संगठन आदिवासी, मूलवासी अस्तित्त्व रक्षा मंच का कहना है कि इस परियोजना से भारी संख्या में लोग बेघर हो जाएँगे.
हम अपनी ज़िंदगी क़ुरबान कर देंगे लेकिन अपने पुरखों की ज़मीन का एक इंच भी नहीं देंगे. मित्तल को हम अपनी धरती पर क़ब्ज़ा नहीं करने देंगे
आंदोलन चला रहे लोगों का ये भी कहना है कि इस परियोजना से पानी और दूसरे प्राकृ़तिक संसाधन बरबाद हो जाएँगे जिसका सीधा असर आदिवासियों पर पड़ेगा जो परंपरागत रूप से प्रकृति पर आश्रित रहते हैं.
दयामणि बरला का कहना है कि “आदिवासी अपनी ज़मीन का एक इंच भी नहीं देंगे.”
उन्होंने कहा, “हम अपनी ज़िंदगी क़ुरबान कर देंगे लेकिन अपने पुरखों की ज़मीन का एक इंच भी नहीं देंगे. मित्तल को हम अपनी धरती पर क़ब्ज़ा नहीं करने देंगे.”
आर्सेलर मित्तल के विजय भटनागर ने बीबीसी से कहा है कि उनकी कंपनी किसी की ज़मीन पर क़ब्ज़ा नहीं कर रही है.
उन्होंने कहा कि वो इस मामले को सुलझाने के लिए इंतज़ार करने को तैयार हैं.
भटनागर ने कहा, “हम गाँव वालों से बातचीत की कोशिश कर रहे हैं. उनकी आशंकाएं यथार्थ हो सकती हैं पर हम उन्हें ये समझाने में कामयाब हो जाएंगे कि राज्य सरकार की पुनर्वास की नीतियों को पूरी तरह लागू किया जाएगा.”
काँग्रेस की स्थानीय सांसद सुशीला करकेटा का भी मानना है कि आख़िरकार गाँव वालों को समझा ही लिया जाएगा.
विकास का वादा
उन्होंने कहा कि वो इस परियोजना से होने वाले फ़ायदे लोगों को बता रही हैं.
सुशीला करकेटा का कहना है कि “आर्सेलर मित्तल जैसी कंपनियाँ अगर यहाँ कारख़ाने लगाएँगी तो बेरोज़गारी की समस्या ख़ुद दूर हो जाएगी.”
धरतीमित्र नाम के संगठन से जुड़े विले वेइको हिरवेला ने कहा कि आदिवासियों के लिए ज़मीन ख़रीदने बेचने वाला माल नहीं होता. वो ख़ुद को ज़मीन का मालिक नहीं बल्कि संरक्षक मानते हैं. ये ज़मीन आने वाली पीढ़ी के लिए हिफ़ाज़त से रखी जाती है.
दयामणि बरला का कहना है, “औद्योगिक घराने आदिवासी समाज के आर्थिक व्यवहार से अनजान हैं. वो नहीं जानते ही आदिवासी खेती और जंगल की उपज पर निर्भर रहते हैं.”
उन्होंने कहा अगर आदिवासियों को उनके प्राकृतिक स्रोतों से अलग कर दिया जाएगा तो वो जीवित नहीं बच पाएँगे।

मेरे विचार
१। क्या सिर्फ उद्योगपति ही विकास कर सकतें हैं ?
२। क्या आदिवासी असभ्य हैं ?
३। क्या हमारे पूर्वजों का कोई सम्बन्ध आदिवासियों से है ?
४। क्या शहरों का गाँव, वनों और आदिवासियों से कोई नाता है ?
५। क्या शहर प्रकृति के करीब हैं ?

4 comments:

makrand said...

realy today we need to look the cause u describe
regards

CHINMAY said...

sirf karkhano ke bal per vikas ho ye jaruri nahi hai. karodo-arbon rupye kamane wale har cheez ko paise se hi khareedna chahte hai. duniya aadiwasiyo ko pichhada manati hai, kyon? isliye ki ham angreji tareeke se shikshit huye hai, isliye hame unka khane, rahne ka tareeka bekar lagta hai. yahi cheez wo hamare bare me soch sakte hai, lekin hamne unhe sochane se bachane ke liye apni siksha paddhati ke jariye brainwashing kar di hai. ye khatarnaak hai, ek padha likha aadiwasi apne paramparik reetiriwajo se ghrana karne lagta hai, use wo sab dakiyanoosi lagata hai.

Gyandutt Pandey said...

यह दुखद है; पर मुझे लगता है कि आदिवासी एक हारने वाली लड़ाई लड़ रहे हैं।

रंजना said...

आपके सभी प्रश्न अपने आप में बहुत बड़ा उत्तर समेटे हुए हैं,जिसे आप भी जानते हैं और हम भी.

आज भारत में अप्रत्यक्ष रूप से एक मुहिम सा छिड़ा हुआ है,जो यदि ऐसे ही चलता रहा तो इसके तहत दो ही वर्ग समाज में बच जायेंगे......... एक बड़े बड़े औद्योगिक घराने जो जीवनोपयोगी हर चीज बेचेंगे और दूसरे इन उद्योगों में कार्यरत कर्मचारी.एक नौकरी देने वाला मालिक दूसरा नौकरी करने वाला किसी भी लेबल का नौकर.पूरी प्रकृति सारे संसाधन इन बड़े लोगों के कब्जे में होगा और बाकि बचे नौकरिपेषाओं का क्या है,सारे दिहारी मजदूर जैसे होंगे,जिसे जब चाहा काम पर रखा जब चाहा निकाल दिया..
लघु कुटीर उद्योग नेस्तनाबूद हो जायेंगे.साड़ी चोटी मछलिया बड़ी मछलियों के पेट में होंगी.